लगातार गर्म हो रहा धरती का ये हिस्सा, वैज्ञानिकों ने बताया- 'दुनिया के लिए खतरनाक संकेत'
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस क्षेत्र में लंबे समय से जो गर्म मौसम बना हुआ है, वो पूरी दुनिया के लिए एक खतरनाक संकेत है...
नई दिल्ली। कोरोना वायरस की महामारी के बीच ग्लोबल वॉर्मिंग पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए चिंता का एक बड़ा कारण बना हुआ है। पिछले दिनों कई देशों में लगाए गए लॉकडाउन के चलते पर्यावरण में कुछ सुधार देखने को मिला, लेकिन लॉकडाउन हटने के बाद हालात फिर से पहले जैसे ही होते नजर आ रहे हैं। इस बीच वैज्ञानिकों ने मौसम को लेकर एक और बड़ी चेतावनी दी है। जलवायु परिवर्तन पर अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि साइबेरिया में लंबे समय से जो असामान्य रूप से गर्म मौसम बना हुआ है, वो पूरी दुनिया के लिए एक खतरनाक संकेत है।

1979 के बाद मई का सबसे गर्म महीना
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, साइबेरिया में पिछले महीने सतह का तापमान औसत तापमान से 10 डिग्री सेल्सियस (18 डिग्री फारेनहाइट) अधिक दर्ज किया गया था। 'कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस' की रिसर्च के मुताबिक इस विशाल रूसी क्षेत्र में 1979 के बाद यह मई का सबसे गर्म महीना बन गया है। 'कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस' के वैज्ञानिकों का कहना है कि साइबेरिया के इस गर्म मौसम के चलते ही पूरी दुनिया में मई का मौसम बेहद गर्म रहा।

'अगर यह क्लामेट चेंज नहीं है तो फिर...'
क्लाइमेंट चेंज को लेकर रिसर्च से जुड़ीं वैज्ञानिक मार्टिन स्टेंडेल के मुताबिक, 'उत्तर पश्चिमी साइबेरिया के तापमान में पिछले महीने जो बदलाव और भिन्नता दर्ज की गई, अगर वो जलवायु परिवर्त के कारण नहीं हो रहा है, तो ऐसा केवल एक लाख सालों में एक बार होता है। लेकिन, साइबेरिया में यह सामान्य नहीं है। यहां केवल मई में ही औसत से ज्यादा तापमान दर्ज नहीं किया गया, बल्कि इस इलाके में सर्दियों और बसंत ऋतु के दौरान भी औसत के मुकाबले ज्यादा गर्म तापमान रहा। खासतौर पर जनवरी में, जब इस महीने में भी बढ़ा हुआ तापमान दर्ज किया गया।'

'ये एक खतरनाक संकेत'
'कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस' की सीनियर वैज्ञानिक फ्रेजा वंबर्ग का कहना है, 'इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ये एक खतरनाक संकेत है। साइबेरिया के तापमान में लगातार हर महीने और लगातार हर साल बदलाव देखने को मिले रहे हैं और पिछले कुछ सालों में ऐसे महीने रिकॉर्ड किए गए हैं, जब तापमान औसत से काफी ज्यादा रहा। लेकिन, लगातार लंबी अवधि तक औसत से ज्यादा तापमान का बने रहना पूरी तरह असामान्य है। हालांकि पूरी धरती पर ही तापमान बढ़ रहा है, लेकिन इसके हर हिस्से के तापमान में बढ़ोत्तरी समान रूप से नहीं होती।'

पर्यावरण में सुधार की असल तस्वीर पूरी तरह अलग
आपको बता दें कि हाल ही में मौसम को लेकर एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें बताया गया था कि लॉकडाउन के चलते पर्यावरण में जो सुधार देखने को मिल रहा है, असल तस्वीर उससे पूरी तरह अलग है। 'द वेदर चैनल' में छपी श्रीधर बालसुब्रमण्यन की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का स्तर लगातार बढ़ रहा है और मौजूदा साल यानी 2020 में भी इस कार्बन डाइऑक्साइ की मात्रा काफी ऊंचे स्तर पर है। रिपोर्ट में बताया गया कि लॉकडाउन के चलते कार्बन उत्सर्जन में तो कमी आई, लेकिन साथ ही कूलिंग इफेक्ट में भी कम हुआ है, जो मौसम में गर्मी बढ़ाएगा।

तापमान बढ़ने का ये परिणाम भी दिखेगा
रिपोर्ट के मुताबिक, कूलिंग इफेक्ट कम होने के बाद तापमान बढ़ने का एक और परिणाम सामने आएगा, और वो है धरती की सतह का पहले की अपेक्षा ज्यादा गर्म होना। धरती की सतह ज्यादा गर्म होगी तो एक बढ़ा हुआ संवहन भी दिखेगा। जिसका नतीजा ये होगा कि वायुमंडल में विशाल क्यूमुलोनिंबस बादल (घने शक्तिशाली खड़े बादल) बन सकते हैं और इसके चलते भारी आंधी-तूफान की आशंका भी बनेगी।












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