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जानिए, दुनिया भर में लॉकडाउन से धरती को क्या हो रहा बड़ा फायदा

Advantage of worldwide lockdown, now our earth trembles less than beforeदुनिया भर में लॉकडाउन का फायदा, अब हमारी धरती में पहले से बहुत कम कंपन हो रहा हैं। भूवैज्ञानिकों ने इसकी जांच की जिसमें ये पाया गया हैं।

बेंगलुरु।कोरोना वायरस के कारण दुनिया के अधिकांश देशों में लॉकडाउन चल रहा है। इस लॉकडाउन के चलते सड़कें खाली पड़ी हैं, हर दिन धुंआ उगलने वाली फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं जिसका सकारात्मक परिणाम धरती पर अब साफ नजर आने लगा हैं। लॉकडाउन के चलते हमरी धरती में पहले से बहुत कम कंपन हो रहा हैं इन दिनों हमारी धरती पहले से कहीं अधिक स्थिर हो गई हैं। वै‍ज्ञानिकों के अनुसार अब धरती में उतनी नहीं कांप रही जितनी लॉकडाउन से पहले कांपती थी। ये एक बेहद खुशी की बात है।

कंपन कम होने से ये हो रहा फायदा

कंपन कम होने से ये हो रहा फायदा

ऐसा बदलाव इसलिए हुआ है क्योंकि लॉकडान के दौरान धरती पर 24 घंटे होने वाली गतिविधियां बंद पड़ी हैं। पूरी दुनिया इस समय ठहरी हुई है। भूकंप वैज्ञानिकों की कहना है कि इस समय दुनिया भर में कम हुए ध्वनि प्रदूषण के चलते वे बहुत छोटे छोटे भूकंप को भी मांपने में सफल साबित हो रहे हैं, जबकि इससे पहले ये भी बड़ी मुश्किल से संभव हो पाता था । दुनिया भर के भूकंपविज्ञानी एक ही प्रभाव देख रहे हैं। इंपीरियल कॉलेज लंदन में पृथ्वी विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग में एक संकाय सदस्य स्टीफन हिक्स ने ट्विटर पर एक पोस्ट किया, जिसमें यूनाइटेड किंगडम में लॉकडान के बाद औसत भूकंपीय शोर स्तर दिखाने वाला एक ग्राफ दिखाया गया है।

जियोलॉजिकल सर्वे ने लगाया ये पता

जियोलॉजिकल सर्वे ने लगाया ये पता

ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे ने दुनिया के कुछ देशों के भूगर्भ वैज्ञानिकों के साथ मिलकर कुछ अहम जानकारी जुटाई है। सामने आया है कि कोरोना वायरस की वजह से पूरी दुनिया में लगाए गए लॉकडाउन की वजह से ध्वनि प्रदूषण कम हुआ है। इसकी जांच लंदन, पेरिस, लॉस एंजिलिस, बेल्जियम और न्यूजीलैंड में थॉमस लेकॉक के यंत्रों और तकनीक से की गई। इस जांच से पता चला है कि लॉकडाउन की वजह से हमारी धरती कंपन कम हो गया है। इन सभी जगहों पर ऐसी ही रीडिंग मिली है।

इस यंत्र के जरिए किया गया ये अध्‍ययन

इस यंत्र के जरिए किया गया ये अध्‍ययन

बता दें बेल्जियम के रॉयल ऑब्जर्वेटरी के भूगर्भ विज्ञानी थॉमस लेकॉक ने एक ऐसा यंत्र विकसित किया है जो धरती की कंपन और आवाजों में हो रहे बदलावों का अध्ययन किया जाता है। साथ ही दोनों के बीच के अंतर को दिखाता है। इस समय पूरी दुनिया में धरती की कंपकंपी नापने के लिए थॉमस लेकॉक की ही तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। ताकि पता किया जा सके कि क्या वाकई में सभी जगह ऐसा ही है।

इस कारण धरती में होता हैं कंपन

इस कारण धरती में होता हैं कंपन

ये तो इंसानी फितरत है कि हम जहा भी रहते वहां शोर मचाते है विभिन्‍न माध्‍यमों और जरुरतों के कारण इतनी आवाजें निकालते हैं कि वातावरण में ध्‍वनि प्रदूषण होता हैं। इसमें गाड़ियों का, फैक्ट्रियों का, हॉर्न, तोड़फोड़ और निर्माण समेत अन्‍य संसाधनों से निकलने वाली आवाजें धरती के कंपन को बढ़ा देती हैं। जब करोड़ों की संख्‍या में जब भी इंसान धरती पर चलते हैं, यातयात चलता हैं, हवाईजहाज, पानी के जहाज समेत अन्‍य संसाधनों के कारण ध्‍वनि बढ़ जाती हैं। जिसका असर पृथ्‍वी पर होता है पृथ्‍ची ज्यादा कांपती है। लॉकडाउन के दौरान पूरी दुनिया में इतनी कम आवाज है कि धरती ही नहीं प्रकृति पर असर साफ दिख रहा हैं।

वैज्ञानिकों को हो रही ये आसानी

वैज्ञानिकों को हो रही ये आसानी

थॉमस लेकॉक बताते हैं कि आम दिनों में इंसानों द्वारा इतना शोर होता है कि हम धरती के मामूली कंपन को भी नहीं जांच पाते थे। हमारे यंत्रों में हल्का कंपन भी पता नहीं चलता था। लेकिन अब लॉकडाउन के समय हम धरती की हल्की कंपकंपी को भी नोट कर पा रहे हैं। भूगर्भ विज्ञानी स्टीफन हिक्स ने बताया कि आमदिनों में धरती की कंपकंपी दिन में बढ़ जाती थी। रात में कम रहती थी। लेकिन आजकल रात से कम कंपकंपी के आंकड़े दिन में आ रहे हैं। हिक्स ने बताया कि पहले हमें धरती के भूकंप, ध्वनि और कंपकंपी को नापने के लिए इंसानों द्वारा पैदा की जाने वाली आवाजों को हमारे यंत्रों से हटाना पड़ता था। लेकिन इन दिनों हमें ये मेहनत नहीं करनी पड़ रही है। धरती की हल्की आवाजें और कंपकंपी भी रिकॉर्ड हो रही हैं।

इसलिए ये समय भूवैज्ञानिक के लिए बन सकता है वरदान

धरती का कंपन कम होने के कारण वैज्ञानिकों को पृथ्वी की सतह पर प्राकृतिक गतिविधि का बेहतर अध्ययन करने का ये बेहतरीन मौका है इसके दौरान भू वैज्ञानिक ज्वालामुखी के व्यवहार की भविष्यवाणी करने और भूकंप के उपकेंद्र के स्थान को त्रिभुजित करने के लिए जिम्मेदार समुद्र की लहरों के प्रभाव का उपयोग करने वालों सहित अन्‍य शोध आसानी से कर सकेंगे। शोधकर्ता अधिक मिनट के परिवर्तनों का पता लगाने और अधिक सटीक डेटा इकट्ठा करने में सक्षम हो सकेगे । ये समय भूवैज्ञानिक के शोध के लिए एक वरदान साबित हो रहा हैं।

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