एक इस्लाम का शरिया कानून है और एक तालिबान का शरिया कानून है...जानिए दोनों में अंतर
तालिबान के शरिया कानून में महिलाओं का घर की बालकनी में जाना भी गुनाह माना गया है, वहीं नेल पॉलिस लगाने पर ऊंगलियों के पोर को काटने का प्रावधान है।
काबुल, अगस्त 20: आज अफगानिस्तान की एक सरकारी न्यूज चैनल में काम करने वाली महिला एंकर शबनम डारवार ने कहा है कि काबुल में तालिबान के लोगों ने उन्हें दफ्तर जाने से रोक दिया। महिला एंकर कहती हैं कि तालिबान ने उन्हें चैनल के गेट पर ही रोक दिया और कहा कि आप एक महिला हैं और आप काम नहीं कर सकती हैं। यानि, तालिबान ने दो दिन पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं के जिस अधिकार की बात शरिया कानून के मद्देनजर की थी, वो उसपर से पीछे हट चुका है। यानि, तालिबान जिस शरिया कानून को मानता है, उसके मुताबिक, महिलाओं को कमरे के अंदर से निकलने पर भी पाबंदी है। आईये जानते हैं कि इस्लाम के मुताबिक शरिया कानून और तालिबान के शरिया कानून में क्या अंतर है?

क्या है शरिया कानून ?
शरिया कानून इस्लाम की कानूनी प्रणाली है, जो कुरान और इस्लामी विद्वानों के फैसलों पर आधारित है, और मुसलमानों की दिनचर्या के लिए एक आचार संहिता के रूप में कार्य करता है। ये कानून यह सुनिश्चित करता है कि वे (मुसलमान) जीवन के सभी क्षेत्रों में दैनिक दिनचर्या से लेकर व्यक्तिगत तक खुदा की इच्छाओं का पालन करते हैं। अरबी में शरीयत का अर्थ वास्तव में "रास्ता" है और यह कानून के एक निकाय का उल्लेख नहीं करता है। शरिया कानून मूल रूप से कुरान और सुन्ना की शिक्षाओं पर निर्भर करता है, जिसमें पैगंबर मोहम्मद की बातें, शिक्षाएं और अभ्यास के बारे में लिखा है। शरिया कानून मुसलमानों के जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर सकता है, लेकिन, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका कितनी सख्ती से पालन किया जाता है।

शरिया की अलग अलग व्याख्या
काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशंस के स्टीवन ए कुक के मुताबिक, "शरिया का वास्तव में क्या मतलब है, इसकी कई अलग-अलग व्याख्याएं हैं कि कुछ जगहों पर इसे अपेक्षाकृत आसानी से राजनीतिक प्रणालियों में इसे शामिल किया गया है।" कुछ संगठनों ने शरिया कानून के तहत 'अंग-भंग और पत्थरबाजी' को भी सही ठहराया है और इस कानून के तहत क्रूर सजाओं के साथ-साथ विरासत, पहनावा और महिलाओं से सारी स्वतंत्रता छीन लेने को भी जायज ठहराया है। इसकी व्याख्या और लागू करने का तरीका अलग अलग मुस्लिम देशों में अलग अलग तरीकों से किया गया है। वहीं, पाकिस्तान जैसे मुस्लिम राष्ट्र में शरिया कानून लागू नहीं है। शरिया कानून के तहत किसी अपराध के लिए तीन तरह की सजा के बारे में लिखा गया है।

तालिबान का अपना शरिया कानून
1996 से 2001 तक अपने शासन के दौरान शरिया कानून के अत्ंयत सख्त नियम को लागू करने के लिए तालिबान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की गई, जिसमें सार्वजनिक पत्थरबाजी, कोड़े मारना, फांसी देकर किसी को बीच बाजार लटका देना तक शामिल था। शरिया कानून के तहत तालिबान ने देश में किसी भी प्रकार की गीत-संगीत को बैन कर दिया था। इस बार भी कंधार रेडियो स्टेशन पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने गीत बजाने पर पाबंदी लगा दी है। वहीं, पिछली बार चोरी करने वालों के हाथ काट लिए जाते थे। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, शरिया कानून का हवाला देकर तालिबान ने अफगानिस्तान में बड़े नरसंहार किए। वहीं, करीब एक लाख 60 हजार लोगों को भूखा रखने के लिए उनका अनाज जला दिया गया औऱ उनके खेतों में आग लगा दी गई थी। तालिबान के शासन के तहत, पेंटिंग, फोटोग्राफी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, वहीं किसी भी तरह की फिल्म पर भी प्रतिबंध था।
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महिलाओं पर तालिबान शासन का प्रभाव
तालिबान के शासन के तहत महिलाओं को प्रभावी रूप से नजरबंद कर दिया गया था और उनकी पढ़ाई-लिखाई पर पाबंदी लगा दी गई थी। वहीं, आठ साल की उम्र से ऊपर की सभी लड़कियों के लिए बुर्का पहनना अनिवार्य था और वो अकेले घर से बाहर नहीं निकल सकती थीं। इस बार भी तालिबान ने इसी नियम को लागू किया है। महिलाओं के लिए हाई-हिल्स सैंडल या जूते पहनने पर पाबंदी थी। तालिबान का मानना है कि हाई हिल्स जूतों से पुरूषों के मन में गलत ख्याल आते हैं। इसके साथ ही महिलाओं और लड़कियों के लिए खिड़की से देखना मना था और वो घर की बालकनी में भी नहीं आ सकती थी।

महिलाओं की तस्वीर छापने पर मनाही
तालिबान के पिछले शासनकाल के दौरान अखबारों को सख्त हिदायत दी गई थी कि वो महिलाओं की तस्वीर नहीं छाप सकते हैं। वहीं दुकानों में भी महिलाओं की तस्वीर लगाना प्रतिबंधित था। इसके साथ ही जिन दुकानों के नाम में 'महिला' शब्द आ रहा था, उन दुकानों से ऐसे शब्द हटा दिए गये थे। तालिबान के पिछले शासनकाल में महिलाओं का सड़क पर निकलना, रेडियो पर बोलना और टीवी पर दिखना सख्त तौर पर प्रतिबंधित था। इसके साथ ही महिलाएं सार्वजनिक कार्यक्रम में भी हिस्सा नहीं ले सकतीं थीं। अगर कोई महिला को इन नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया जाता था, तो फिर उन्हें भीड़ बुलाकर, स्टेडियम में या फिर शहर के टाउन हॉल में कोड़े से पिटाई की जाती थी।

नेल पॉलिस लगाने पर सजा
तालिबान के पिछले शासनकाल के दौरान महिलाओं के लिए नेल पॉलिस का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित था। अगर कोई महिला ने नेल पॉलिस लगा लिया तो उसके अंगूठे के सिरे को काट दिया जाता था। इसके अलावा अफगानिस्तान के लोगों के लिए तालिबान की बफादारी साबित करनी होती थी। अगर कोई तालिबान के खिलाफ जाता था तो फिर उसे पत्थर से मारा जाता था। नियम तोड़ने वालों को तालिबान की धार्मिक पुलिस सार्वजनिक तौर पर पिटाई करती थी या फिर उसे फांसी की सजा दी जाती थी।

अफगान महिलाओं का डर
तालिबान ने हाल के सालों में खुद को अधिक उदारवादी ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश की है। उसने महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने, उनके खिलाफ लड़ने वालों को माफ करने और अफगानिस्तान को आतंकी हमलों के लिए आधार के रूप में इस्तेमाल करने से रोकने का वादा किया है। इस आतंकवादी समूह ने कहा है, कि वह चाहता है कि "दुनिया हम पर भरोसा करे" और देश का नियंत्रण हासिल करने के बाद अफगानिस्तान में तालिबान किसी से 'बदला' नहीं लेगा। तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने स्काई न्यूज को बताया कि अफगानिस्तान में महिलाओं को काम करने और विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षित होने का अधिकार होगा। हालांकि, तालिबान ने वादे जरूर किए हैं, लेकिन अफगानिस्तान के लोगों का मानना है कि तालिबान झूठे वादे कर रहा है और अफगानिस्तान से विदेशी मीडिया के निकलने के बाद फिर से पुरानी स्थिति होगी।












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