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Artificial Blood: जापान ने रचा इतिहास! बना लिया आर्टिफिशियल खून, कब से होगा इस्तेमाल शुरू?

Artificial Blood: मानव शरीर में खून का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। खून न केवल शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाता है, बल्कि यह वाइरस से लड़ने, तापमान नियंत्रित रखने और चोट लगने पर खून बहने से रोकने जैसे कार्य भी करता है। लेकिन मेडिकल इमरजेंसी या दुर्घटनाओं के समय, जब मरीजों को तुरंत खून की जरूरत होती है, तो अक्सर खून की कमी एक गंभीर समस्या बन जाती है। खासकर सही ब्लड ग्रुप न मिल पाने की स्थिति में मरीज की जान पर बन आती है।

क्या है जापान का आर्टिफिशियल ब्लड की कहानी?

मॉडर्न मेडिकल साइंस में रोज़ नए आविष्कार हो रहे हैं, ये मानव जीवन को सुरक्षित और बेहतर बनाने में मदद कर रहे हैं। ऐसा ही एक चमत्कारी काम जापान के वैज्ञानिकों ने भी कर दिखाया है। उन्होंने एक ऐसा कृत्रिम खून (आर्टिफिशियल ब्लड) तैयार किया है, जो इंसानी खून की तरह ही काम करता है। यह आर्टिफिशियल ब्लड शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने और खून बहने को रोकने जैसे जरूरी काम को बखूबी निभाता है। सबसे खास बात यह है कि इसे किसी भी ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति को दिया जा सकता है।

Artificial Blood

2030 तक इस्तेमाल में आएगा

यह खून लंबे समय तक स्टोर भी किया जा सकता है। यह खोज विज्ञान के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी उपलब्धि मानी जा रही है, जिससे भविष्य में लाखों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। यदि क्लिनिकल ट्रायल सफल साबित होते हैं, तो जापान 2030 तक दुनिया की मेडिकल केयर के लिए आर्टिफिशियल ब्लड का इस्तेमाल करने वाला पहला देश बन सकता है।

कैसे बना है?

जापान की नारा मेडिकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हिरोमी साकाई ने इस इसे बनाने की जिम्मेदारी उठाई है। जिससे स्थिर, वायरस-मुक्त आर्टिफिशियल रेड ब्लड सेल्स बनाई गई हैं। जो खून के अलग अलग प्रकार के मिलान की जरूरत को पूरा करती हैं। जापान टाइम्स के अनुसार, दान किए गए रक्त से हीमोग्लोबिन (जो ऑक्सीजन ले जाता है) को निकालकर और इसे आर्टफिशियल लिपिड मेम्ब्रेन से लपेटकर कृत्रिम लाल रक्त कोशिकाएं बनाई जाती हैं। आर्टिफिशियल सेल का रंग बैंगनी होता है, जो रक्त के सामान लाल रंग से अलग होता है। क्योंकि इसे इस तरह से बनाया जाता है कि इसके इस्तेमाल किए जाने तक इसका ऑक्सीकरण नहीं होता है।

कितने दिनों तक कर सकते हैं स्टोर?

आर्टिफिशियल ब्लड टेक्नोलॉजी हीमोग्लोबिन वेसिकल पर केन्द्रित है। यह छोटी आर्टिफिशियल ब्लड सेल हैं, जो ऑक्सीजन ले जाने वाले अणु हीमोग्लोबिन को ख़त्म करने के बाद खून से निकालती हैं और उसे प्रोटेक्टिव कोटिंग में बंद कर देती हैं।आर्टिफिशियल ब्लड पारंपरिक रक्तदान की तुलना में कई तरह के लाभ देता है। इसे कमरे के तापमान पर दो साल तक संग्रहित किया जा सकता है, जो दान किए गए रक्त से कहीं अधिक है।

जानिए टेस्ट करने का डिजाइन

यह टेस्ट शुरू में बड़े प्रदर्शन और लक्ष्यों को प्राप्त करने से पहले सेफ्टी टेस्ट पर काम करेगा। इसमें वालंटियर्स को 100 से 400 मिली लीटर आर्टिफिशियल ब्लड दिया जाएगा। यह रिसर्च जापान के आर्टिफिशियल ब्लड डेवलपमेंट प्रोग्राम की तेजी से विकास करने की प्रगति को दर्शाता है। यह प्रोग्राम छोटे पैमाने से शुरू हुआ, जिसमें दिखाया गया कि ये छोटी कृत्रिम कोशिकाएं सामान्य रक्त कोशिकाओं की तरह सुरक्षित रूप से ऑक्सीजन पहुंचा सकती हैं।

अब क्या बाकी है?

इतनी तेजी से आगे बढने के बाद भी अभी भी कुछ अड़चने बीच में आ रही हैं, इन चुनौतियों पर काबू पाना भी बहुत जरूरी है।

- राष्ट्रीय और वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन में बढ़ोत्तरी करना जरूरी होगा।
- इसके बाद काम्प्लेक्स रेगुलेटरी अप्रूवल प्रोसेस को शुरू करना होगा।
- यह सुनिश्चित करने के लिए कि कमर्शियलाइजेशन के बाद भी उत्पाद सस्ता और सुलभ बना रहे।
- उच्च तनाव वाले, विश्व चिकित्सा वातावरण में इसका प्रभावी होने का टेस्ट भी बाकि है।

जापान का दुनिया को वरदान

जैसे-जैसे इस टेस्ट के नतीजे सामने आ रहे हैं और जैसे हम 2030 के करीब पहुंच रहे हैं यह बात सच लगने लगी है कि मेडिकल क्षेत्र का भविष्य दान पर नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में तैयार लाल रक्त कोशिकाओं पर चलेगा। यह खोज न केवल मेडिकल की दुनिया के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यह मानवता के लिए भी एक वरदान साबित हो सकती है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में बताएं।

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