Oppenheimer: परमाणु बम बनाने वाले वैज्ञानिक की कहानी, जिन्होंने गीता पढ़कर कहा, अब मैं मृत्यु बन गया हूं...
Oppenheimer: क्रिस्टोफर नोलन की बहुप्रतीक्षित फिल्म ओपेनहाइमर 21 जुलाई को रिलीज होने वाली है और यह फिल्म अमेरिकी भौतिक विज्ञानी जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर के जीवन पर आधारित है, जिन्हें फादर ऑफ एटम बम कहा जाता है।
लेकिन, वैज्ञानिक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर के बारे में आपको जो एक बाद शायद ही पता होगी, कि उन्होंने भगवत गीता पढ़ने के लिए संस्कृत सिखी थी। आखिर उन्हें संस्कृत सीखने की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर उन्होंने भगवत गीता क्यों पढ़ी थी, और वो अकसर क्यों कहते रहते थे, कि 'मैं अब मृत्यु बन चुका हूं।' आइये महान वैज्ञानिक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर के जीवन के इस राज को समझते हैं।

कौन थे जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर?
न्यू मैक्सिको में लॉस एलामोस प्रयोगशाला के डायरेक्टर के रूप में, ओपेनहाइमर ने 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट' का नेतृत्व किया था, जिसका काम था परमाणु बम बनाना। इस प्रोजेक्ट में कई महान वैज्ञानिक जुड़े हुए थे, जिनका मकसद था, नाजी जर्मनी से पहले परमाणु बम का निर्माण कर लेना।
इस प्रोजेक्ट की शुरूआत महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के कहने पर शुरू की गई थी, क्योंकि उनका मानना था, कि अगर जर्मनी ने परमाणु बम पहले बना लिया, तो मानवता का विनाश हो जाएगा। लिहाजा, परमाणु बम बनाने की जिम्मेदारी, महान भौतिकी विज्ञानिक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर को सौंपी गई, जो परमाणु को लेकर रिसर्च कर रहे थे।
हालांकि, परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता को प्रत्यक्ष रूप से देखने के बाद, ओपेनहाइमर परमाणु हथियारों की रेस के खिलाफ सबसे मजबूत आवाजों में से एक बन गए। यह कहानी है उस महान परमाणु वैज्ञानिक की, जिन्हें 'परमाणु बम का जनक' कहा जाता है, लेकिन जो बाद में खुद परमाणु बम के सबसे विरोधी बन गये और जीवन भर पश्चाताप करते रहे, कि उन्होंने परमाणु बम क्यों बनाया?
परमाणु युग की शुरुआत
इतिहास ने 16 जुलाई 1945 को एक नाटकीय और महत्वपूर्ण मोड़ लिया था, जब पहले परमाणु बम का परीक्षण लॉस एलामोस से लगभग 340 किमी दक्षिण में किया गया था। इसे 'ट्रिनिटी टेस्ट' के रूप में जाना जाता है।
इस परमाणु बम परीक्षण के एक महीने से भी कम समय के बाद, अमेरिका ने जापानी शहरों हिरोशिमा पर, 6 अगस्त को - और नागासाकी पर 9 अगस्त को दो परमाणु बम गिराए थे। परमाणु बमों ने विनाशकारी तबाही मचाई, दोनों शहर तबाह हो गए। इसमें आधिकारिक तौर पर 2 लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे और परमाणु बम का असर आज भी इन शहरों के लोगों पर दिखता है।
इस बमबारी ने पूर्वी क्षेत्र में द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त कर दिया और जापान के सम्राट हिरोहितो ने 15 अगस्त को जापान के आत्मसमर्पण की घोषणा कर दी।
हिरोशिमा और नागासाकी की बमबारी एकमात्र ऐसा मौका है, जब सैन्य संघर्ष में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन, इस घटना ने दुनिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू कर दी, जिसने वैश्विक भू-राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।
इसके बाद तत्कालीन सोवियत संघ ने अपने पहले परमाणु बम का परीक्षण 1949 में किया और उसके बाद ब्रिटेन ने 1952 में, फ्रांसीसियों ने 1960 में और चीनियों ने 1964 में परमाणु बम का परीक्षण कर लिया। समय के साथ परमाणु बमों की क्षमता और बढ़ती गई और ये बम और भी विनाशकारी होते चले गये।
वैज्ञानिक ओपेनहाइमर और भगवद गीता
अपने विध्वंसक काम के बावजूद, वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर को हमेशा "मानवता को उसके विनाश के लिए संभावित साधन प्रदान करने" को लेकर अफसोस होता रहा। ट्रिनिटी टेस्ट देखने के बाद, उनका संदेह और भी कई गुना बढ़ गया। और कई अन्य वैज्ञानिकों की तरफ, उन्होंने भी भगवद गीता के दर्शन में अपने कार्यों का अर्थ खोजा।
साल 1965 में, परमाणु बम के पहले विस्फोट पर बोलते हुए, उन्होंने गीता का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था, कि "विष्णु (कृष्ण) राजकुमार (अर्जुन) को मनाने की कोशिश कर रहे हैं, कि उन्हें अपना कर्तव्य निभाना चाहिए और उस दौरान भगवान श्रीकृष्ण विराट रूप का धारण करते हैं और अर्जुन से कहते हैं, कि अब, मैं मृत्यु बन गया हूं। अब मैं दुनिया का विनाशक बन गया हूं।"
वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने आगे कहा, कि "आज मैं मौत बन गया हूं।" वो अकसर इस लाइन को दोहराते रहते थे, और इस लाइन के जरिए वो परमाणु हथियारों की भयानक और विनाशकारी क्षमता के बारे में बताते रहते थे।
अमेरिकी इतिहासकार जेम्स ए हिजिया ने अपने पेपर 'द गीता ऑफ जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर' (प्रोसीडिंग्स ऑफ द अमेरिकन फिलॉसॉफिकल सोसाइटी, 2000) में लिखा है, कि ओपेनहाइमर ने भगवद गीता का इस्तेमाल "मानवता की पीड़ा के लिए एक दर्दनिवारक दवा के रूप में" किया था।
हिजिया ने लिखा, कि "ओपेनहाइमर जैसे अनिश्चित सैनिक के लिए, जो घबराकर अपना परमाणु 'तीर' बना रहा है, वो अर्जुन का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।" वो कहते हैं, कि "यदि राज्य की विरासत को लेकर झगड़े में अर्जुन के लिए अपने ही दोस्तों और रिश्तेदारों को मारना उचित था, तो ओपेनहाइमर के लिए जर्मन और जापानियों को मारने के लिए हथियार बनाना कैसे गलत हो सकता है, जिनकी सरकारें दुनिया को जीतने की कोशिश कर रही थीं?"
वैज्ञानिक ओपेनहाइमर गीता के जरिए ये जानने की कोशिश कर रहे थे, कि क्या उनका परमाणु बम बनाने का फैसला सही था?
परमाणु हथियारों के खिलाफ किया काम
अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने जापान पर परमाणु बम गिराने का फैसला किया था, जिसको लेकर ओपेनहाइमर बहुत परेशान थे। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने राष्ट्रपति ट्रूमैन से यहां तक कहा, कि उनके और राष्ट्रपति, दोनों के "हाथ खून से सने हुए हैं।"
1946 में प्रकाशित एक पेपर में, ओपेनहाइमर ने परमाणु बम को "हमलावरों के लिए एक हथियार" के रूप में वर्णित किया था, जिसमें "आश्चर्य और आतंक के तत्व ... शामिल" थे। उन्होंने लिखा था, कि "इसे जानना काफी सामान्य है, कि परमाणु हथियार दुनिया के लिए विनाशकारी खतरा है और इसकी पहचान के लिए जरूरी है, कि परमाणु हथियार जिम्मेदार हाथों में रहे।"
यह परमाणु हथियारों और उनके अनियंत्रित प्रसार के प्रति वैज्ञानिक ओपेनहाइमर के सक्रिय विरोध की शुरुआत थी।
द्वितीय युद्ध के खत्म होने के फौरन बाद, ओपेनहाइमर नव निर्मित संयुक्त राज्य परमाणु ऊर्जा आयोग की सामान्य सलाहकार समिति के अध्यक्ष बने। अपनी अध्यक्षता के दौरान, उन्होंने अमेरिका में परमाणु हथियारों के प्रसार को कम करने की दिशा में कड़ी मेहनत की। 1949 में, अमेरिका के पास उस वक्त भी करीब 30 परमाणु बम थे।
हालांकि, उनकी लाख कोशिशों के बाद भी दुनिया से परमाणु हथियार खत्म नहीं हो पाए, लेकिन उन्होंने दुनिया को परमाणु हथियारों को लेकर सावधान जरूर किया और जीवन भर इस अफसोस में रहे, कि उन्हें परमाणु बम का निर्माण नहीं करना चाहिए था, लेकिन उन्हें इस बात से संतोष मिलती थी, कि अगर वो परमाणु बम नहीं बनाते, तो हिटलर के वैज्ञानिक परमाणु बम का निर्माण कर लेते, जो शायद पूरी मानवता के लिए प्रलय समान होता और यहीं आकर उन्हें गीता से दर्शन प्राप्त होता था, कि उन्होंने समाज की भलाई के लिए एक भयंकर लड़ाई का अंत किया है, जैसा की अर्जुन को कृष्ण ने समझाया था।
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