भारत के तीन जिगरी दोस्तों ने ज्वाइंट फाइटर जेट प्रोजेक्ट किया लांच, चीन का पसीना निकलना तय!
जापान अपनी खराब एयर डिफेंस सिस्टम से काफी परेशान है और उसने चीन की तरफ दिशा करके 1000 मिसाइलों की तैनाती करने की भी योजना बनाई है। वहीं, जापान उत्तर कोरिया से मिल रही धमकियों से भी परेशान है।

Italy Japan UK Fighter Jet Project: भारत के तीन दोस्त साथ मिलकर ब्रह्मांड के सबसे खतरनाक फाइटर जेटों का निर्माण करेंगे और इसके लिए प्रोजेक्ट को लॉंच कर दिया गया है। अलजजीरा ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है, कि इटली और जापान के साथ मिलकर यूनाइटेड किंगडम ने फाइटर जेट्स के निर्माण को लेकर एक प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया है। फाइटर जेट्स के निर्माण को लेकर चीन काफी तेजी से आगे निकल रहा है और दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक में आने वाले दिनों में चीन दुनिया के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बनने वाला है, ये तय है। लिहाजा, पिछले साल आई एक अमेरिकी रिपोर्ट में चीन को सबसे बड़ा खतरा बताते हुए अमेरिका को अपनी सैन्य क्षमता का विकास करने का सुझाव दिया गया था। चूंकी, चीन विश्व की सबसे विशालकाय नेवी का निर्माण कर चुका है, लिहाजा अमेरिका के अलावा उसके ये सहयोगी भी अब पूरी ताकत के साथ नेक्स्ट जेनरेशन फाइटर जेट के प्रोजेक्ट में जुट गया है।

इटली-जापान और यूएस का प्रोजेक्ट
यूनाइटेड किंगडम, इटली और जापान ने एक साथ मिलकर फाइटर जेट्स के निर्माण को लेकर एक प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा तक दी है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ये पहला मौका है, जब संयुक्त राज्य अमेरिका के अलावा जापान ने किसी तीसरे देश के साथ औद्योगिक रक्षा सहयोग को लेकर समझौता किया है। इन तीनों देशों की तरह से जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया है कि, इस सौदे का लक्ष्य 2035 तक यूके के नेतृत्व वाली फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम प्रोजेक्ट, जिसे टेम्पेस्ट के नाम से भी जाना जाता है, उसे जापान के एफ-एक्स कार्यक्रम के साथ मिलाकर एक एडवांस फ्रंट-लाइन फाइटर जेट का निर्माण करना है और उसे ऑपरेशन में लाना है। यानि, फाइटर जेट को लेकर ये प्रोजेक्ट की रफ्तार कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है, कि महज 13 सालों के अंदर फाइटर जेट को ऑपरेशन में ले आना है। तीनों देशों के बीच हुए इस संयुक्त समझौते को ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (CCAP) नाम दिया गया है।

क्या है सीसीएपी प्रोजेक्ट?
यूनाइटेड किंगडम, जापान और इटली की तरफ से जारी किए गये संयुक्त बयान में कहा गया है, कि 'हम एक नियम आधारित, मुक्त और खुली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं और ऐसे वक्त में हमारा ये संकल्क अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस सिद्धांत का विरोध किया जा रहा है और विरोध के साथ खतरा और आक्रामकता बढ़ रही है।' टेक्नोलॉजी के मामले में अव्वल रहने वाले इन तीनों देशों के बीच ये समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब चीन, ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियां काफी तेज कर चुका है और पूरी संभावना है, कि आने वाले कुछ ही सालों में ताइवान पर हमला होने वाला है। वहीं, विवादित दक्षिण चीन सागर पर चीन का दावा दिनों दिन और तेज होता जा रहा है और दक्षिण चीन सागर किनारे बसे इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलिपींस और ब्रूनेई जैसे देशों को धमकाकर चीन ने किनारे कर रखा है। इसके साथ ही इंडो-पैसिफिक में भी चीन की दखलअंदाजी बढ़ती जा रही है।

उत्तर कोरिया भी पैदा कर रहा चिंता
चीन के अलावा उत्तर कोरिया ने भी अमेरिका को दो उत्तर-पूर्वी सहयोगियों की नाक में दम कर रखा है और जापान के साथ साथ दक्षिण कोरिया लगातार किंम जोंग उन की आक्रामकता को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर है। उत्तर कोरिया लगातार मिसाइलों का परीक्षण कर रहा है और उसने जापान और दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका को भी धमकियां दी हैं। लिहाजा, पूर्वोत्तर एशिया में भी सुरक्षा का बड़ा खतरा है। अब तक शांति के रास्ते पर बढ़ने वाले जापान ने अब अपने रक्षा बजट में विस्तार करने की घोषणा तक दी है और जापान ने कहा है, कि वो अगले पांच सालों में अपने रक्षा बजट में अपनी कुल जीटीपी का 2 प्रतिशत खर्च करेगा। इसके साथ ही जापान में लगे एयर डिफेंस सिस्टम भी काफी कमजोर हैं और इसी साल आई एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि जापान के एयर डिफेंस सिस्टम दुश्मन के हमले का पहला वेग भी बर्दाश्त करने लायक नहीं हैं, लिहाजा जापान को एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने के साथ साथ अटैक फाइटर जेट्स भी चाहिए।

मुसीबत में फंसा है जापान
साल 2008 से लेकर अब तक जापान के एयर डिफेंस क्षेत्र में कम से कम 200 बार रूसी विमानों ने घुसने की कोशिश की, जिसे जापानी एयरफोर्स ने खदेड़ दिया, लेकिन अब जापान के लिए टेंशन इस बात को लेकर है, कि अब चीनी जहाजों ने जापान के हवाई क्षेत्रों में घुसपैठ करना शुरू कर दिया है। इसके साथ ही जापान के हवाई क्षेत्र के बेहद पास चीन और रूस की सेना ने एक साथ सैन्य अभ्यास करना शुरू कर दिया और रूसी जहाजों ने 2016 में विवादित सेनकाकू (दियाओयू) द्वीपों के आसपास के पानी को पार कर लिया और साल 2019 में रूसी विमान एक संयुक्त चीनी-रूसी अभ्यास के वक्त ताकेशिमा द्वीप समूह के हवाई क्षेत्र में प्रवेश कर गया। यह वो क्षेत्र है, जो दक्षिण कोरिया और जापान के बीच विवादित है। दो अमेरिकी सहयोगियों के बीच तनाव को बढ़ाने का यह जानबूझकर किया गया एक प्रयास था। इसके साथ ही रूस और चीन ने जापान सागर के ऊपर वार्षिक संयुक्त परमाणु बमवर्षक अभ्यास भी शुरू किया। ये अभ्यास हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की यात्रा के दौरान टोक्यो में क्वाड समिट के दौरान किए गए थे। लिहाजा, अब जापान के लिए वक्त आ गया है, जब वो अपनी सुरक्षा में कोई वक्त बर्बाद ना करे।

अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाएगा जापान
जापान में अब सवाल पूछे जा रहे हैं, कि अगर रूस यूक्रेन पर हमला कर सकता है, तो फिर चीन क्यों नहीं आगे जाकर जापान पर हमला करेगा? और अपने आक्रमण को सही ठहराने के लिए वैकल्पिक रूसी इतिहास का पुतिन का दावा भी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के चीन के क्षेत्रीय दावों के आख्यान के समानांतर है। लिहाजा अब जापान अपनी सैन्य क्षमताओं में बहुत अधिक निवेश करेगा और इस बात की जांच करेगा कि पड़ोसियों के बढ़ते शत्रुतापूर्ण समूह के खिलाफ कैसे जवाबी कार्रवाई की जाए। जापान के सिर पर यह एक बड़ा जोखिम था और अब इस जोखिम को काउंटर करने के लिए जापान ने एक साथ कई रणनीति पर काम करने का फैसला किया है, जिसमें चीन से लगती सीमा पर सैकड़ों मिसाइलों को भी तैनात किया जाएगा और जापान ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम को भी मजबूत करने का प्लान तैयार किया है, जो अभी तक कमजोर है। वहीं, जापान की शक्ति बढ़ना भारत के लिए एक अच्छी खबर है, क्योंकि इससे चीन पर एक और तरफ से प्रेशर आएगा और वो देश भारत का दोस्त और क्वाड का एक मजबूत पार्टनर है।
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