सिंगापुर के सात सैटेलाइट्स को ISRO ने ऑर्बिट में किया फिट, जानिए कैसे स्पेस डिप्लोमेसी का उस्ताद बन रहा भारत?
ISRO PSLV launch: दुनिया में शक्तिशाली देश बनने के लिए अपनी डिप्लोमसी को धार देनी पड़ती है और आज के जमाने में सॉफ्ट पॉवर बनने में डिप्लोमेसी कई प्लेटफॉर्म के जरिए अपनी भूमिका निभाता है और स्पेस डिप्लोमेसी का इसमें बड़ा योगदान है।
भारत की स्पेस एजेंस, इसरो, यानि इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन... जिसने हाल ही में चंद्रयान-3 को लॉन्च किया है, वो भारत की स्पेस डिप्लोमोकी को एक ऑर्बिट में फिट कर रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पीएसएलवी रॉकेट ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफल प्रक्षेपण के बाद सभी सात सिंगापुरी उपग्रहों को निकट-भूमध्यरेखीय कक्षा (एनईओ) में स्थापित कर दिया है और भारत की स्पेस डिप्लोमेसी के लिए, ये एक नया स्टेप है।

सिंगापुर के सात सैटेलाइट ऑर्बिट में किए फिट
सिंगापुर के सात सैटेलाइट्स को ऑर्बिट में भेजने के बाद इसरो की तरफ से जारी बयान में कहा गया, कि उड़ान भरने के करीब 23 मिनट बाद, रॉकेट, उपग्रहों से अलग हो गया और 535 किमी की दूरी तय करने के बाद, उन्हें उनकी कक्षाओं में स्थापित कर दिया गया।
डीएस-एसएआर सैटेलाइट को सिंगापुर सरकार की रक्षा विज्ञान और प्रौद्योगिकी एजेंसी और एसटी इंजीनियरिंग की साझेदारी में विकसित किया गया था। इसे 535 किमी की ऊंचाई पर 5 डिग्री झुकाव पर नजदीकी-भूमध्यरेखीय कक्षा (NEO) में लॉन्च किया गया है।
इसरो के मुताबिक, एक बार इन सैटेलाइट्स की तैनात होने और उनके चालू हो जाने के बाद, डीएस-एसएआर उपग्रह का इस्तेमाल, सिंगापुर सरकार के भीतर विभिन्न एजेंसियों की उपग्रह इमेजरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जा सकेगा।
इसरो की ये कामयाबी, वर्ल्ड स्पेस सेक्टर में उसकी प्रतिष्ठा को और बढ़ाता है और विश्वसनीयता की उस श्रेणी में खड़ा करता है, जहां दुनिया के देशों ने अपनी सैटेलाइट्स को काफी कम खर्च पर ऑर्बिट में लॉन्च करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की तरफ देखना शुरू कर दिया है।
सिंगापुर के सात सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में कामयाबी के साथ भेजकर इसरो ने जता दिया है, कि वो सैटेलाइट्स को लॉन्च करने में उस्ताद बन चुका है।
इसरो की कॉमर्शियल उड़ान
आपको बता दें, कि पीएसएलवी-सी56 न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड का मिशन है, जो इसरो की कॉमर्शियल ब्रांच है, जो अलग अलग देशों के सैटेलाइट्स को लॉन्च करता है।
PSLV-C56 अपने साथ 6 को-सैटेलाइट्स भी ले जाता है। ये 6 को-सैटेलाइट्स
VELOX-AM है, जो एक 23 किलोग्राम का टेक्नोलॉजिकल माइक्रोसैटेलाइट है
आर्केड एटमॉस्फेरिक कपलिंग एंड डायनेमिक्स एक्सप्लोरर (आर्केड) प्रायोगिक सैटेलाइट SCOOB-II
NuSpace का NuLIoN सैटेलाइट, जो एक 3U नैनो सैटेलाइट है, जो एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शक पेलोड उड़ा रहा है
एक एटवांस 3U नैनोसैटेलाइट जो शहरी और दूरस्थ दोनों स्थानों में निर्बाध IoT कनेक्टिविटी को सक्षम करता है
गैलासिया-2, जो एक 3यू नैनो उपग्रह है, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में परिक्रमा करेगा
और ORB-12 STRIDER, उपग्रह एक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के तहत विकसित किया गया है।
इसरो का इस साल का तीसरा कॉमर्शियल उड़ान है और भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने इसस पहले, इसी साल मार्च महीने में LVM-3 रॉकेट को लॉन्च किया था। इस रॉकेट लॉन्च से ब्रिटेन के वन-वेव (ONE-WAVE) से जुड़े 36 सैटेलाइट्स को एक साथ लॉन्च किया गया था।
वहीं, अप्रैल महीने में इसरो ने पीएसएलवी रॉकेट सिंगापुर के ही 2 सैटेलाइट्स को लॉन्च किया था।
आपको बता दें, कि पीएसएलवी, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी की सबसे विश्वसनीय रॉकेट बन गया है और इसने इस बार अपनी 58वीं उड़ान भरी है। वहीं, इसकी 'कोर अलोन कॉन्फिगरेशन' के साथ इसकी 17वीं उड़ान थी। इसरो का ये विशाल रॉकेट, पृथ्वी की निचली कक्षाओं में कामयाबी के साथ सैटेलाइट्स को लॉन्च कर रहा है।
इसरो की स्पेस डिप्लोमेसी
कॉमर्शियल सैटेलाइट्स के जरिए इसरो अपनी कमाई करता है और उन पैसों को आगे के रिसर्च में इस्तेमाल करता है।
इसरो की स्पेस सेक्टर में विश्वसनीयता किस कदर बढ़ती जा रही है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं. कि साल 2022 में इसरो ने अपने लॉन्च व्हीकल से 44 विदेशी सैटेलाइट्स लॉन्च किए थे। वहीं, इस साल मार्च महीने तक इसरो ने 37 विदेशी सैटेलाइट्स लॉन्च किए थे।
इसरो की ये कामयाबी कोई मजाक नहीं है, क्योंकि अब इसरो अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक के सैटेलाइट्स को लॉन्च करने लगा है।
दरअसल, दुनिया के उंगली पर गिने देश हैं, जिनके पास सैटेलाइट्स लॉन्च करने की क्षमता है। हालांकि, अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस, चीन और जापान के बाद उत्तर कोरिया और ईरान के पास सैटेलाइट्स लॉन्च करने की क्षमता है, लेकिन इनकी क्षमता पहली बात तो भारत जैसी है नहीं, और दूसरी बात ये, कि ये राजनीतिक तौर पर काफी अछूत भी हैं।
वहीं, अमेरिका से सैटेलाइट्स लॉन्च करने में खर्च इतना ज्यादा है, कि ज्यादातर देश उस खर्च को उठाने में सक्षम नहीं होते हैं।
वहीं, यूरोपीय संघ देशों के लिए एक प्रभावी विकल्प बनता है, जिसे भारत तगड़ी चुनौती दे रहा है।
मंगलयान और चंद्रयान जैसे मिशनों ने इसरो की प्रतिष्ठा को काफी बढ़ा दिया है, लिहाजा अब भारत जब किसी देश के साथ कूटनीतिक स्तर पर बात करता है, तो उसमें स्पेस टेक्नोलॉजी जुड़ी होती है।
भारत ने हाल में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और फ्रांस के साथ स्पेस सेक्टर में समझौते किए हैं।
वहीं, बात लागत की करें, तो हाल ही में नीति आयोग के सदस्य और डिफेंस साइंटिस्ट ने जानकारी दी है, कि भारत आज के समय में 30 से 40 हजार डॉलर प्रति किलोग्राम पेलोड की लागत के साथ स्पेस में सैटेलाइट्स को लॉंच कर रहा है, वहीं इसरो ने निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ भागीदारी करनी भी शुरू कर दी है, लिहाजा आने वाले वक्त में ये लागत काफी कम हो जाएगी, जिससे भारत काफी कम पैसों में गरीब देशों के सैटेलाइट्स लॉन्च कर सकेगा और ये ना सिर्फ भारत के स्पेस सेक्टर को पंख लगाएगा, बल्कि भारत की स्पेस डिप्लोमेसी को और मजबूत करेगा।












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