Israel US Relations : अगर अमेरिका छोड़ दे साथ तो इजरायल का क्या होगा?
Israel US Relations : 'ज़रा सोचिए... अगर दुनिया की सबसे ताक़तवर ताक़त - अमेरिका... अचानक इज़रायल का साथ छोड़ दे... तो क्या होगा? वो इज़रायल, जो गाज़ा की मासूम आबादी पर बम बरसाता है... जिसके पीछे हमेशा वॉशिंगटन का हाथ रहा है... अगर उसी हाथ ने अपनी पकड़ ढीली कर दी... तो क्या इज़रायल टिक पाएगा?
या फिर फ़िलिस्तीन के हक़ में पूरी दुनिया खड़ी हो जाएगी? आज हम आपको दिखाएंगे वो सच... जिसे इज़रायल कभी मानना नहीं चाहता...और अमेरिका कभी दिखाना नहीं चाहता....नमस्कार मैं हूं आसिफ इकबाल और आप देख रहे हैं वन इंडिया...

पश्चिम एशिया के एक छोटे से देश इजरायल को दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्कों में से एक बताया जाता है...लेकिन क्या इजरायल वाकई इतना ताकतवर है या फिर वो किसी दूसरे देश के बल पर इतने घमंड में हैं...जी हाँ सच्चाई यही है कि इजरायल अमेरिका के बगैर कुछ भी.... अमेरिका हर साल इज़रायल को लगभग 3.8 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता देता है।
इस मदद से इज़रायल के पास है दुनिया का सबसे मज़बूत मिसाइल डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम'। अगर मदद बंद हो गई...तो इज़रायल को न सिर्फ़ हथियारों की कमी होगी बल्कि तकनीकी बढ़त भी खोनी पड़ेगी। हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती विद्रोहियों के हमलों से निपटना और मुश्किल हो जाएगा। फिलहाल इजरायल हूती लड़ाकों के साथ नई जंग में है..हूती लगातार ड्रोन और क्रूज़ मिसाइल इस्तेमाल कर रहे हैं, जो यमन से सैकड़ों किलोमीटर दूर तक वार कर सकती हैं। अगर अमेरिका की नौसेना मदद न करे तो इज़रायल के समुद्री रास्ते, बंदरगाह और तेल आपूर्ति पर सीधा खतरा। इज़रायल की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्तों पर निर्भर है।
इससे इज़रायल शायद ज्यादा से ज्यादा एक साल तक गाज़ा पर अपनी जंग जारी रख पाएगा, लेकिन उसकी प्राथमिकताएँ बदल जाएंगी क्योंकि वह कहीं ज़्यादा असुरक्षित हो जाएगा। मिसाल के तौर पर उन्हें यह बहुत गहराई से समझ आ जाएगा कि गाज़ा और यमन में इस्तेमाल की गई हर गोली या बम उन्हें उनके अपने बचाव से कम कर देगा। अमेरिका के बिना इजरायल वाणिज्यिक उपग्रहों को ब्लॉक नहीं कर पाएंगे जिन पर इज़रायल अपनी ज़मीन छुपाने के लिए निर्भर करता है। इसका मतलब होगा कि उसके दुश्मन तुरंत उनके इलाकों को देख पाएंगे। उन्हें आयरन डोम और एरो सिस्टम जैसे रक्षा तंत्र भी खोने पड़ेंगे, जिनकी आंशिक फंडिंग अमेरिका करता है, और इससे वे हमलों के लिए कहीं ज़्यादा खुले हो जाएंगे। अमेरिका के बिना इज़रायल को दूसरी सैन्य आपूर्तिकर्ता ढूंढनी होंगी, सबसे ज्यादा संभावना है नाटो देशों से है। लेकिन यूरोप पहले से ही रूस से ख़तरे को लेकर हथियारों की कमी का सामना कर रहा है, इसलिए यह जल्दी मुमकिन नहीं है। यूरोप इज़रायल से हथियारों के पैसे भी वसूलेगा, जबकि मौजूदा अमेरिकी सैन्य सहायता कार्यक्रम के तहत ऐसा नहीं होता। इसलिए अगर कोई और देश आगे भी आता है, तो भी इज़रायल उतने बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने की हैसियत नहीं रख पाएगा, जितनी अभी अमेरिकी मदद से रखता है....
अमेरिका सिर्फ़ हथियार ही नहीं, बल्कि इज़रायल का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार भी है। अगर यह मदद रुक गई, तो स्टार्ट-अप नेशन कहलाने वाला इज़रायल...आर्थिक दबाव में आ जाएगा। विदेशी निवेश घटेंगे, बेरोज़गारी बढ़ेगी और टेक्नोलॉजी सेक्टर पर सीधा असर पड़ेगा। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र से लेकर सुरक्षा परिषद तक...अमेरिका हमेशा इज़रायल की ढाल बनकर खड़ा रहा है। लेकिन अमेरिका के हटते ही इज़रायल को दुनिया भर से आलोचना झेलनी पड़ेगी। कई देश फ़िलिस्तीन के पक्ष में खुलकर आ सकते हैं और इज़रायल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ जाएगा।
अगर अमेरिका पीछे हट गया, तो ईरान और तुर्की जैसे देश ताक़तवर हो जाएंगे। सऊदी अरब और खाड़ी देश भी अपनी रणनीति बदल सकते हैं। मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा...और इज़रायल अपने पड़ोसियों के बीच अकेला पड़ सकता है। हूती लड़ाके, हमास और हिज़्बुल्लाह जैसे संगठन लंबे समय से इज़रायल के लिए चुनौती बने हुए हैं। अमेरिकी मदद रुकते ही इनका मनोबल और बढ़ जाएगा। सीमा पर हमले तेज होंगे और इज़रायल को चौतरफ़ा मोर्चों पर जूझना पड़ेगा। इज़रायल के भीतर भी असर साफ़ दिखाई देगा। जनता सरकार से सवाल पूछेगी...सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ेगी...और राजनीतिक अस्थिरता गहराएगी। यानी साफ़ है...अगर अमेरिका इज़रायल की मदद बंद कर दे...तो हालात सिर्फ़ इज़रायल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और दुनिया की राजनीति के लिए बदल जाएंगे। दुनिया के सबसे पुराने और सबसे मज़बूत गठबंधन में दरार पड़ जाएगी...और यह दरार...भविष्य की जंगों का रास्ता भी खोल सकती है....
लेकिन सवाल ये उठता है कि अमेरिका बेकाबू इजरायल की मदद क्यों करता है...उसका क्या फायदा है?
वैसे तो अमेरिका और इजरायल के संबंधों की कहानी काफी बड़ी है..लेकिन अमेरिका को इजरायल से क्या फायदे हैं इसे संक्षेप में समझते हैं... इज़रायल मध्य पूर्व में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साथी है। अमेरिका के पास अरब देशों तक सीधी पहुँच नहीं है, लेकिन इज़रायल के ज़रिए वह ईरान और खाड़ी देशों पर नज़र रखता है। इज़रायल की साइबर टेक्नोलॉजी और खुफिया तंत्र यानी Mossad जैसी एजेंसियां अमेरिका के लिए बहुत काम आते हैं। आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में इज़रायली टेक्नोलॉजी और US की ताक़त मिलकर काम करती हैं। मोसाद अमेरिका के लिए दुनियाभर के देशों में जासूसी करता है...इसके अलावा अमेरिका की बड़ी ईसाई और यहूदी आबादी इज़रायल का समर्थन करती है। अमेरिकी राजनीति में यह बड़ा वोट बैंक है। अमेरिकी चुनावों में Israel-friendly नीतियाँ अपनाना नेताओं के लिए फ़ायदेमंद होता है। अमेरिका जो 3.8 बिलियन डॉलर की मदद देता है, उसका बड़ा हिस्सा इज़रायल सिर्फ़ अमेरिकी हथियार खरीदने में खर्च करता है। F-35 फाइटर जेट्स, मिसाइल सिस्टम यानी अमेरिकी कंपनियों को सीधा मुनाफ़ा। अमेरिका इज़रायल के ज़रिए मध्य पूर्व की राजनीति कंट्रोल करता है। अगर अमेरिका पीछे हटे तो रूस और चीन वहाँ पैठ बना सकते हैं। यानी अमेरिका को इज़रायल की मदद से सैन्य बढ़त, आर्थिक मुनाफ़ा, राजनीतिक सपोर्ट और भू-राजनीतिक कंट्रोल सब मिलता है।
यानी तस्वीर साफ़ है... अगर अमेरिका ने अपनी मदद रोक दी... तो इज़रायल न सिर्फ़ अपने दुश्मनों के बीच अकेला पड़ जाएगा... बल्कि उसके पैर तले की ज़मीन भी खिसक जाएगी। हक़ीक़त ये है कि उसकी असली ताक़त अमेरिका के डॉलर और हथियार हैं... अगर ये सहारा टूट गया... तो फ़िलिस्तीन की लड़ाई और मज़बूत हो जाएगी...फिलहाल के लिए इतना ही देखते और पढ़ते रहिए वन इंडिया..
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