Israel Iran War: महिलाओं का दमन करने वाले मौलवी अली खामेनेई कैसे बने ईरान के सुप्रीम लीडर?
Israel Iran War: दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी, एक ओर जहां विश्व के शक्तिशाली देशों में महाशक्ति बनने की होड़ लगी हुई थी वहीं दूसरी ओर कुछ देश आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे. इसी बीच ईरान भी एक मजबूत देश के रूप में उभरने लगा उस वक्त ईरान के शासक शाह पहलवी थे। इन्हीं दिनों ईरान के मशहद इलाके में सैयद जावेद खामेनेई और हजीह आगा खानम के घर 19 अप्रैल, 1939 को अयातुल्लाह अली खामेनेई का जन्म हुआ। अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई , अपने पिता के दूसरे बेटे थे. खामेनेई बचपन से ही इस्लामी शिक्षा और धार्मिक वातावरण में पले-बढ़े।
बचपन से ही हासिल की धार्मिक शिक्षा
चार साल की उम्र में सैयद अली और उनके बड़े भाई मोहम्मद को धार्मिक शिक्षा के लिए मकतब जो कि उस समय का पारंपरिक प्राथमिक विद्यालय था उसमें भेजा गया। बाद में, उन्हें अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए एक नए स्थापित इस्लामी स्कूल में भर्ती कर दिया गया। उन्होंने कम उम्र में ही कुरान और इस्लामी सिद्धांतों की पढ़ाई की। प्रारंभिक शिक्षा की बात करें तो उन्हें मशहद के हौजाओं यानी कि धार्मिक विद्यालयों डाला गया, जहां उन्होंने फ़िक़्ह यानी कि इस्लामी कानून, अरबी व्याकरण, तफसीर और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में पढ़ाई की। खामेनेई ने मशहद, क़ुम और नजफ़ जैसे प्रसिद्ध धार्मिक विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की।

खुमैनी के भी छात्र रहे खामेनेई
उन्होंने अयातुल्ला बुरुजुर्दी समेत तमाम इस्लामी उलेमाओं से शिक्षा। इन्हीं में से एक उलेमा अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी भी और इन्होंने भी अली खामेनेई को पढ़ाया। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक शिक्षा और इस्लामी क्रांति की विचारधारा को समझने और फैलाने में लगाया। इसके अलावा वे साहित्य और कविता में गहरी रुचि रखते हैं, विशेष रूप से फ़ारसी और अरबी कविता में। उन्होंने कई धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन किया है और कई धार्मिक किताबें भी लिखीं।
क्रांति में अली खामेनेई की एंट्री
1950 और 60 के दशक में अली ख़ामेनेई ने ईरान के तत्कालीन शासक मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी की सरकार के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाई। 1962 में ईरान के कोम में ही अली खामेनेई क्रांतिकारी के रूप में पहचाने जाने लगे। जिन्होंने शाह के शासन की अमेरिका समर्थक और कथित इस्लाम विरोधी नीतियों का विरोध किया। आयतुल्लाह रुहोल्ला खोमैनी के नेतृत्व में चल रहे इस्लामी क्रांति के आंदोलन में भी अली सक्रिय हो गए। उनका मानना था कि शाह की सरकार इस्लामी मूल्यों को बर्बद कर रही है और पश्चिमी शक्तियों, विशेष रूप से अमेरिका, के इशारों पर काम कर रही है।
रजा पहलवी का विरोध और जेल
1963 से वे राजशाही के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में और अधिक सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाने लगे, राजनीतिक सक्रियता के चलते उन्हें ईरान की सुरक्षा सेवाओं द्वारा कई बार जेल में डाला गया। बावजूद इसके, उन्होंने आंदोलन जारी रखा और खोमैनी के विचारों को प्रसारित करते रहे। वे भाषणों, लेख और दूसरे माध्यमों से जनता को इस्लामी क्रांति के लिए प्रेरित करते रहे और इसका एक अहम चेहरा बनकर उभरे। इससे हुआ ये कि अली खामेनेई निर्वासित चल रहे रुहोल्ला खुमैनी के बेहद करीब आ गए। अली खामेनेई शुरू से ही नए गणराज्य की राजनीति में डूबे हुए थे। वे अयातुल्लाह खोमैनी के सबसे प्रबल और वफादार समर्थक माने जाने लगे।
1979 की क्रांति और महिलाओं दमन
1979 में जैसे ही मोहम्मद रजा शाह पहलवी के शासन का पतन शुरू हुआ और रुहोल्ला खुमैनी वापस आए तो ईरान में इस्लामिक गणराज्य की स्थापना हुई। 1979 के पहले का ईरान में जहां महिलाओं के अधिकार थे, आधुनिक था, विज्ञान और कई जरूरी विषयों की पढ़ाई-लिखाई होती थी और रिसर्च पर जोर था। 1979 के बाद वहां का मंज़र ही बदल गया। अब ईरान एक कट्टर इस्लामिक मुल्क बन चुका था। ईरान एक शरिया कानून पर चलने वाला देश था, जो धार्मिक मान्यताओं का पालन पूरी कट्टरता से करता था। आयतुल्लाह खोमैनी ने अली ख़ामेनेई जैसे विश्वासपात्र लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया।
बम धमाके में बची जान, बने राष्ट्रपति
अली ख़ामेनेई ने ईरानी संसद जिसे वहां मजलिस कहा जाता है उसमें सदस्य के रूप में काम किया और 1980-88 तक चले ईरान-इराक युद्ध के दौरान सरकार के प्रमुख प्रवक्ताओं में भी शामिल रहे। उनका कद इतना बड़ा हो चुका था कि 1981 में वे आतंकवादियों के निशाने पर आ गए थे लेकिन किस्मत अच्छी रही जो बम विस्फोट में भी बच गए। लेकिन ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अली राजाई और इस्लामिक रिपब्लिकन पार्टी (आईआरपी) के महासचिव की किस्मत उतनी अच्छी नहीं थी। अगले साल हुए धमाके में उनकी मौत हो गई। पद खाली हुआ तो अली खामेनेई को आईआरपी का महासचिव नियुक्त किया गया। कुछ ही हफ़्तों में वे राष्ट्रपति पद के लिए इस्लामिक रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार भी बन गए, यह एक ऐसा पद था जो पहले मौलाना के लिए वर्जित होता था. बावजूद इसके उन्होंने चुनाव लड़ा और इसमें बड़ी जीत हासिल की और 1981 से 1989 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे। वे अब तक के एकमात्र मौलवी हैं जिन्होंने यह पद संभाला है।
अली खामेनेई ईरान के नए सुप्रीम लीडर
3 जून 1989 को अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी के निधन के बाद, विशेषज्ञों की विधानसभा ने अली खामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता घोषित किया। हालांकि उस समय वे 'मरजा-ए-तक़लीद' यानी कि उच्च धार्मिक अधिकार वाले नहीं थे, फिर भी उन्हें व्यापक समर्थन मिला और वे सर्वोच्च नेता बनाए गए। ईरान में सर्वोच्च नेता का पद सबसे अधिक प्रभावशाली होता है। खामेनेई की भूमिका धार्मिक, सैन्य, न्यायिक और मीडिया से लेकर विदेश नीति तक फैली हुई है। अली खामेनेई ने 1989 में ईरान के दूसरे सर्वोच्च नेता के रूप में पद ग्रहण किया।
मीडिया, शिक्षा और समाज पर कसी लगाम
सुप्रीम लीडर बनते ही अली खामेनेई ने सरकार के उच्च पदों पर अपनी नियुक्तियों के जरिए इस्लामी गणराज्य की विचारधारा को मजबूत किया और कट्टरपंथी तत्वों को आगे लाया। विदेश नीति में, खामेनेई ने पश्चिम के प्रति सख्त रुख अपनाया। अमेरिका को 'महान शैतान' कहा और परमाणु कार्यक्रम को तेज़ी से आगे बढ़ाया, ताकि ईरान की वैश्विक ताकत के रूप में स्थिति मजबूत हो सके। उन्होंने मीडिया, शिक्षा और समाज पर भी लगाम लगाए रखी, ताकि इस्लामी क्रांति के कथित आदर्श कायम रहें। मौजूदा समय में ख़ामेनेई ईरान की सशस्त्र सेनाओं, न्यायपालिका के प्रमुख की नियुक्ति, संसद के प्रस्तावों को मंजूरी या अस्वीकृति, विदेशी मामलों की नीतियों का निर्धारण, गार्जियन काउंसिल और विशेषज्ञों की सभा के सदस्यों के प्रमुख है।
महिला अधिकारों के विरोधी खामेनेई
अली खामेनेई पारंपरिक इस्लामी नियमों के कड़े समर्थक हैं, जो महिलाओं की भूमिका को परिवार और समाज में सीमित कर महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करती है। खामेनेई महिलाओं के लिए इस्लामी हिजाब के पक्षधर हैं। वे सार्वजनिक जीवन में पश्चिमी सभ्यता से अलग एक नैतिक और धार्मिक पहनावे का पालन करना अनिवार्य मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि महिलाओं के कार्य इस्लामी मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं के अनुरूप होनी चाहिए। राजनीतिक या सैन्य क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका सीमित होनी चाहिए, और नेतृत्व और सार्वजनिक सत्ता में पुरुषों की अधिक प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी विचारधारा के कारण खामेनेई की विचारधारा को महिलाओं के अधिकारों के पक्षधर समूहों और पश्चिमी देशों में आलोचना का सामना करना पड़ता है, जिन्हें यह सोच लैंगिक समानता के विरोधी और महिलाओं की स्वतंत्रता का दमन करने वाला माना जाता है।
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