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Expert Opinion: IRGC और रेजा के बीच में झूल रहा ईरानियों का भविष्य? एक्सपर्ट से समझें आगे क्या होगा

Expert Opinion: अमेरिका और इजरायल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या ने मिडिल-ईस्ट की राजनीति भूचाल ला दिया है। इस घटना ने न सिर्फ ईरान की आंतरिक राजनीति को हिला दिया है, बल्कि पूरे क्षेत्र की शक्ति-संतुलन (पावर डायनेमिक्स) को भी बदलने की आशंका पैदा कर दी है। यह सिर्फ एक नेता की मौत नहीं, बल्कि एक पूरे सिस्टम के भविष्य पर बड़ा सवाल है।

टॉप लीडरशिप भी साफ

इस हमले में सिर्फ खामेनेई ही नहीं, बल्कि ईरान के कई बड़े सैन्य अधिकारी भी मारे गए। इनमें चीफ ऑफ स्टाफ सय्यद अब्दुलरहीम मुसावी, रक्षा मंत्री अज़ीज़ नसीरज़ादेह, रक्षा परिषद के सचिव रियर एडमिरल अली शमखानी और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर मोहम्मद पाकपूर शामिल थे। यानी ईरान के पावर स्ट्रक्चर की पूरी टॉप लेयर एक साथ खत्म हो गई, जो देश की सुरक्षा और रणनीति संभाल रही थी।

Expert Opinion

क्यों ईरान, वेनेजुएला जैसा नहीं है?

मिडिल ईस्ट को करीब से जानने वाले और भारत के जाने-माने डिफेंस एक्सपर्ट्स कमरा आग़ा (Qamar Agha) बताते हैं कि 'ईरान का केस वेनेजुएला से कहीं ज्यादा जटिल है। यहां सत्ता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक और सैन्य ढांचे पर टिकी है।'

कमर आग़ा के मुताबिक, 'भले ही अली खामेनेई की मौत हो चुकी हो, लेकिन ये सरकार कहीं नहीं जाएगी। इनके पास अपना एक सेटअप है, जिसमें वो 80 लोग शामिल है, जो नए नेता को चुनने की शक्ति रखते हैं। वहीं IRGC काफी मजबूत स्थिति में है जो इस रिजीम के गार्डियन के तौर पर खुद को पेश करती है। वह किसी भी सूरत में अमेरका के सामने हथियार नहीं डालने वाली और न ही कोई समझौता अमेरिका से करेगी। शिया थ्योलॉजी (Shia Theology) में बादशाहत के लिए कोई जगह नहीं है। साथ ही, शिया थ्योलॉजी यह भी कहती है कि- जुल्म करने वालों से समझौता मत करो और गरीबों के पक्ष में रहो। मौजूदा रिजीमी, शिया थ्योलॉजी को गंभीरता से मानती है और इसका पालन करती है। लिहाजा वे किसी भी सूरत में अमेरिका से कोई समझौता नहीं करेंगे।'

बिना फौज इराक को 8 सालों तक ईरान ने दी टक्कर

कमर आग़ा कहते हैं कि- 'ईरान एक अकेला पर्शियन राज है जो अपने आप को मजबूत स्थिति में आज भी रखे हुए है। यहां के लोग खुद को आर्यन्स मानते हैं। इनका अपना 2500 साल से भी ज्यादा पुराना इतिहास है। जब 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद शाह वंश द्वारा तैयार की गई आर्मी को हटाया गया और उसके कुछ साल बाद 1980 में इराक ने ईरान पर हमला किया। तब ईरान के पास कोई सैन्य व्यवस्था नहीं थी, बावजूद इसके ईरान खुद को बचाने में न सिर्फ कामयाब रहा बल्कि इस युद्ध को 8 सालों तक खींचा और खुद को एक मजबूत प्रतिद्वंदी के रूप स्थापित किया।'

रेजा पहलवी के लौटने की क्या संभावना?

रेजा पहलवी के लौटने की संभावना पर कमर आग़ा ने कहा- ' रेजा पहलवी को ईरानी लोग अमेरिका की कठपुतली मानते हैं। उनकी लोकप्रियता है लेकिन अमेरिका और यूरोप में रह रहे उन ईरानियों के मन में जो मोहम्मद रेजा पहलवी के जाते ही ईरान से जा चुके थे। एक और छोटा धड़ा है जिसमें ईरान के शहरी और अमीर लोग हैं, जो चाहते हैं कि ईरान में लोकतांत्रिक और लिबरल सरकार आए, वो भी रेजा पहलवी के समर्थक हैं। लेकिन इनकी संख्या इतनी नहीं है कि वो रेजा को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा सकें।'

ईरान का भविष्य आने वाले सालों में क्या है?

इस सवाल के जवाब में कमर आग़ा कहते हैं कि- 'ये एक बहुत ही दूरदर्शी सवाल है जिसका जवाब अभी नहीं दिया जा सकता। ईरान में जबरदस्त इकोनॉमिक क्राइसिस है। बावजूद इसके न तो ईरान पर सेंक्शन कम होंगे और न जंग रुकती हुई दिख रही है। हालांकि ईरानियों का एक एजेंडा है कि अमेरिका के सामने घुटने नहीं टेकेंगे। ईरान के पास वर्तमान में इतने हथियार हैं कि वह एक महीने के लगभग आराम से जंग लड़ सकता है। इसलिए ईरान के लिए आने वाले दिन युद्ध वाले होंगे लेकिन स्थिरता दोनों तरफ से नहीं दिख रही है।'

IRGC का विवादित चेहरा

8-9 जनवरी की कार्रवाई के दौरान कई प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी, जिसका आदेश खामेनेई ने दिया था और उसे लागू IRGC ने किया। आलोचकों का आरोप है कि IRGC की विदेश नीति ईरानी जनता के बजाय अपने प्रभुत्व को मजबूत करने पर केंद्रित रही है।

पड़ोसियों को क्यों बनाया निशाना?

इसके बाद ईरान ने फारसी खाड़ी के कई अरब देशों-बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)-पर मिसाइलें दागीं। इससे साफ है कि ईरानी शासन इसे सिर्फ एक हमला नहीं, बल्कि अपनी 'अस्तित्व की लड़ाई' मान रहा है। हालांकि आगे क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना अभी लगभग नामुमकिन है। इसके पीछे वजह बताई जा रही है कि, इनमें से ज्यादातर देशों में अमरेका के मिलिट्री/ नेवल बेस थे। लेकिन अब फ्रेंच और ब्रिटश सैन्य ठिकानों को भी निशाना, जिससे युद्ध का दायरा और व्यापक हो गया है।

अतीत की स्वीकार्यता और भविष्य की नींव

आखिर में, ईरान के लिए सिर्फ लोकतंत्र हासिल करना काफी नहीं होगा। जरूरी यह है कि वह अपने कठिन और हिंसक अतीत को स्वीकार करे। एक न्यायपूर्ण और स्थिर भविष्य की मजबूत नींव तभी रखी जा सकती है, जब देश अपने इतिहास से ईमानदारी से सामना करे।

इस एनालिसिस पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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