मिडिल ईस्ट में पावर बैलेंस बदलना चाहता है इजराइल, लेकिन इतिहास दे रहा चेतावनी, सबक सीखेंगे बेंजामिन नेतन्याहू?
Israel-Hezbollah Conflict: इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शनिवार को घोषणा की है, कि हिज्बुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह की हत्या "आने वाले वर्षों के लिए क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदलने की दिशा में एक कदम है।"
नसरल्लाह की मौत के बाद इजराइल के नेता मध्य पूर्व में सत्ता के पुनर्गठन के लिए एक अवसर को खुलता हुआ देख रहे हैं और वे मान सकते हैं, कि हिज्बुल्लाह घातक रूप से घायल हो गया है।

लेकिन, इजराइल की पूर्ण विजय मायावी है, और जो लोग अपनी मनचाही चीज पा लेते हैं, वे अक्सर पछताते रहते हैं। 17 सितंबर के बाद से, इजराइल ने लेबनान में ईरान समर्थित आतंकवादी समूह को एक के बाद एक कई झटके दिए हैं - पहले पेजर और वॉकी टॉकी विस्फोट, फिर दक्षिणी बेरूत पर एक बड़ा हवाई हमला, जिसमें वरिष्ठ कमांडर इब्राहिम अकील (कम से कम दो दर्जन नागरिकों के साथ) मारा गया, इसके तीन दिन बाद एक और बमबारी अभियान शुरू हुआ।
शुक्रवार शाम को, जब नसरल्लाह बमबारी में मारा गया, जिसमें कई इमारतें ध्वस्त हो गईं, तो हिज्बुल्लाह का वरिष्ठ नेतृत्व लगभग पूरी तरह से खत्म हो चुका था।
इजराइल को सबक सिखाता इतिहास
फिर भी हालिया इतिहास इजराइली नेताओं को कड़वे सबक ही देता है, जो लेबनान और सामान्य रूप से मध्य पूर्व में भूगर्भीय परिवर्तनों की महान महत्वाकांक्षा रखते हैं। जून 1982 में, इजराइल ने फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को कुचलने के लक्ष्य के साथ लेबनान पर आक्रमण किया था। इसके अलावा, इसकी उम्मीद बेरूत में एक लचीली ईसाई-प्रभुत्व वाली सरकार स्थापित करने और सीरियाई सेना को देश से बाहर निकालने की थी। लेकिन, ये तीनों मिशन फेल रहा था।
हां, लेबनान में फिलिस्तीनी सशस्त्र समूहों को एक अमेरिकी-मध्यस्थ सौदे के तहत देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था, जिसने उन्हें ट्यूनीशिया, यमन और अन्य जगहों पर निर्वासन में भेज दिया था। लेकिन पीएलओ के साथ फिलिस्तीनी राष्ट्रीय आकांक्षाओं को कुचलने का लक्ष्य नाकाम हो गया। पांच साल बाद, पहला फिलिस्तीनी इंतिफादा (विद्रोह), गाजा में शुरू हुआ और पश्चिमी तट तक फैल गया। आज फिलिस्तीनी लोग इजराइली कब्जे को खारिज करने में उतने ही अडिग और बेचैन हैं, जितने वे पहले कभी थे।
आक्रमण के समय लेबनान में इजराइल का मुख्य सहयोगी बशीर अल-गेमायल थे, जो एक मैरोनाइट ईसाई मिलिशिया नेता थे, जिसे संसद ने चुना था, लेकिन पदभार ग्रहण करने से पहले पूर्वी बेरूत में एक बड़े विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई। उनके भाई, अमीन ने उसकी जगह ली, और उसके नेतृत्व में और सक्रिय अमेरिकी भागीदारी और प्रोत्साहन के साथ मई 1983 में लेबनान और इजराइल ने सामान्य द्विपक्षीय संबंधों की स्थापना के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। लेकिन तीव्र विरोध के कारण, अगले फरवरी में सरकार गिर गई और जल्द ही समझौते को रद्द कर दिया गया।

अमेरिका, जिसने सितंबर 1982 के सबरा-शतीला नरसंहार के बाद बेरूत में सैनिकों को तैनात किया था, वो अक्टूबर 1983 में अपने दूतावास पर दो बार बमबारी के बाद वापस चला गया, साथ ही अमेरिकी मरीन और फ्रांसीसी सेना बैरकों पर भी हमला किया गया। जिसमें 250 से ज्यादा अमेरिकी जवान मारे गये थे।
लेबनान का गृह युद्ध फिर से भड़क उठा और 6 साल से ज्यादा समय तक चला।
सीरियाई सेना, जो अरब लीग के आदेश के तहत 1976 में एक "निवारक बल" के रूप में लेबनान में प्रवेश कर गई थी, पूर्व प्रधानमंत्री रफीक अल-हरीरी की हत्या के बाद 2005 तक वहां से नहीं लौटी।
लेकिन शायद 1982 के इजराइली आक्रमण का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम हिज्बुल्लाह का जन्म था, जिसने एक लगातार गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया, जिसने इजराइल को दक्षिण लेबनान से एकतरफा वापसी करने के लिए मजबूर कर दिया - महत्वपूर्ण रूप से यह पहली और एकमात्र बार था जब किसी अरब सैन्य बल ने इजरायल को अरब भूमि से पीछे हटने के लिए सफलतापूर्वक धकेला। ईरान की मदद से यह नया समूह, इजराइल द्वारा सफलतापूर्वक खदेड़े गए फिलिस्तीनी उग्रवादियों की तुलना में कहीं ज्यादा घातक और प्रभावी साबित हुआ।
हिज्बुल्लाह ने 2006 के युद्ध में इजराइल के खिलाफ लड़ाई लड़ी और बाद के वर्षों में महत्वपूर्ण ईरानी मदद से और भी मजबूत हुआ।
आज हिजबुल्लाह अपंग और अव्यवस्थित है, और इसमें कोई शक नहीं, कि हिज्बुल्लाह के अंदर इजराइली खुफिया एजेंसी शामिल हो चुकी है, लेकिन इसके बाद भी हिज्बुल्लाह को खत्म मानना जल्दबाजी होगी।

लेबनान और इजराइल से परे, 2003 में इराक पर अमेरिका के नेतृत्व में आक्रमण का उदाहरण है, जो बेलगाम अहंकार की कीमत का सबक है। जब इराकी सेना बिखर गई और अमेरिकी सैनिक बगदाद की ओर दौड़ पड़े, तो जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने कल्पना की थी, कि सद्दाम हुसैन के पतन से तेहरान और दमिश्क में शासन खत्म हो जाएगा और पूरे क्षेत्र में उदार लोकतंत्र पनपने लगेंगे, लेकिन वो सपना, सपना ही रह गया।
इसके बजाय इराक पर अमेरिकी कब्जे ने सांप्रदायिक हिंसा के खूनी जंग में तब्दील कर दिया, जिसमें अमेरिका को खून और पैसे की भारी कीमत चुकानी पड़ी, इराक के लोगों को और भी ज्यादा । सद्दाम हुसैन की हत्या ने ईरान को बगदाद में राजनीतिक प्रतिष्ठान के दिल तक अपना प्रभाव फैलाने का रास्ता खोल दिया। अफगानिस्तान पर अमेरिकी नेतृत्व वाले आक्रमण से बिखरा अल-कायदा, इराक के सुन्नी त्रिकोण में फिर से पैदा हुआ और आखिरकार सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट में बदल गया।
और एक बार फिर, आज जब बेरूत के दक्षिणी उपनगरों से धुआं उठता हुआ दिखाई दे रहा है और तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस के शब्द याद आ रहे हैं, जिन्होंने 2006 के इजराइल-हिज़्बुल्लाह युद्ध के दौरान कहा था, कि "हम जो भी खून-खराबा और विनाश देख रहे हैं, वह "नए मध्य पूर्व के जन्म की पीड़ा" है।"












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