Iran Vs Iran: 10 प्वॉइंट में समझें, ईरान पर हमला करेगा अमेरिका या नहीं! ओबामा से लेकर ट्रंप तक सारे आंकड़े
Iran Vs Iran: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर तेजी से बढ़ रहा है। कई संकेत ऐसे हैं जो बताते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप जल्द ही कोई बड़ा फैसला सकते हैं। वहीं मीडिया में जिस तरह की खबरें आ रही हैं उन्हें पढ़ें तो ऐसा लगता है कि किसी भी वक्त ये हमला हो सकता है। लेकिन असलियत इससे काफी दूर है। क्योंक जब से ट्रंप लौटे है, तब से वह ईरान के साथ न्यूक्लयर डील करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बात नहीं बन सकी है। इसी वजह से हमले की आशंका ज्यादा है।
अगर युद्ध हुआ तो कितना बड़ा होगा?
एक्सियोस के पत्रकार बराक रविद की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर युद्ध हुआ तो वह वेनेजुएला में हुए सीमित ऑपरेशन जैसा छोटा कदम नहीं होगा, बल्कि एक फुल-स्केल यानी बड़े स्तर का मिलिट्री ऑपरेशन हो सकता है। इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ट्रंप के राष्ट्रपति पद के बचे हुए तीन सालों पर भी पड़ेगा। हालांकि अभी भी यह संभावना है कि कूटनीति काम कर जाए और हालात संभल जाएं।

1. न्यूक्लियर विवाद: सालों से अटका मुद्दा
अमेरिका और ईरान महीनों से रुक-रुक कर न्यूक्लियर डील पर बातचीत कर रहे हैं। अमेरिका की हर सरकार ने यह साफ कहा है कि वह ईरान को न्यूक्लियर हथियार हासिल नहीं करने देगा। 2015 में पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने एक न्यूक्लियर समझौता किया था, लेकिन ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इसे खत्म कर 'अधिकतम दबाव' की नीति अपनाई।
बाइडेन की कोशिशों पर ट्रंप ने फेरा पानी
पूर्व राष्ट्रपति बाइडेन कोई नया समझौता नहीं कर पाए। ट्रंप जब दोबारा सत्ता में आए तो उन्होंने भी नया समझौता करने की इच्छा जताई। जून में ट्रंप ने ईरान को 60 दिनों की समय-सीमा दी थी कि वह नया समझौता करे। यह समय सीमा खत्म होते ही इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया।
कुछ ही दिनों बाद अमेरिका भी इजरायल के साथ लड़ाई में शामिल हो गया और ईरान की अंडरग्राउंड न्यूक्लियर फेसिलिटी पर बमबारी की। इसके बावजूद ट्रंप ने बाद में फिर से ईरान पर समझौता करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने कई बार कहा है कि वह तेहरान के साथ नई न्यूक्लियर डील चाहते हैं।
क्या टारगेट सिर्फ न्यूक्लियर ठिकाने हैं?
हालांकि ट्रंप और उनके सहयोगियों ने कई बार यह भी इशारा किया है कि वे ईरान में 'शासन परिवर्तन' देखना चाहते हैं। अगर ऐसा हुआ तो कोई भी सैन्य कार्रवाई सिर्फ न्यूक्लियर ठिकानों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इससे कहीं ज्यादा व्यापक हो सकती है।
2. प्रदर्शनकारियों की हत्याएं और बढ़ता गुस्सा
पिछले जनवरी की शुरुआत में ईरान में आर्थिक असंतोष को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन प्रदर्शनों को कुचलने के दौरान हजारों लोगों की मौत हुई। कुछ प्रदर्शनकारी तो खुले तौर पर शासन परिवर्तन की मांग कर रहे थे। ट्रंप ने धमकी दी थी कि अगर ईरान प्रदर्शनकारियों को मारता है तो अमेरिका हमला करेगा।
ट्रंप की चेतावनी और सैन्य तैयारी
उस समय ट्रंप ने कहा था, 'हम पूरी तरह तैयार हैं और कार्रवाई के लिए तैयार बैठे हैं।' ईरानी सुरक्षा बलों ने विरोध प्रदर्शनों को सख्ती से दबाया। कई रिपोर्टों में मृतकों की संख्या हजारों बताई गई। सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं और हवाई क्षेत्र भी बंद कर दिया।
क्यों टला था पिछला हमला?
ट्रंप ने उस समय हमला करने का फैसला टाल दिया। इसकी एक वजह यह थी कि उस क्षेत्र में अमेरिका के पास उतनी सैन्य ताकत मौजूद नहीं थी जितनी बाद में 12 दिनों तक चले युद्ध के दौरान थी। हालांकि इसके बाद उन्होंने खाड़ी क्षेत्र में युद्धपोत और लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ा दी और साथ ही न्यूक्लियर वार्ता भी दोबारा शुरू कर दी।
3. दो वॉरशिप: बड़ा संकेत?
ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सख्त बयान देने के साथ-साथ क्षेत्र में दो विमानवाहक पोत भी भेज दिए हैं। इससे दुनिया भर में यह संदेश गया कि अगर समझौता नहीं हुआ तो हमला हो सकता है। अभी तक डील के करीब पहुंचने का कोई साफ संकेत नहीं मिला है, लेकिन युद्ध की तैयारी जैसे पूरे संकेत अमेरिका दे रहा है।
4. 'चेखव की बंदूक' जैसा हाल
इसे कुछ विश्लेषक 'चेखव की बंदूक' सिद्धांत से जोड़कर देख रहे हैं। यानी अगर आपने मंच पर बंदूक रखी है तो उसके चलने की संभावना पूरी होती है। इसी तरह, दो विमानवाहक पोत और सैकड़ों विमान सिर्फ दिखावे के लिए नहीं भेजे जाते। इन तैयारियों से लगता है कि हमला हो सकता है।
5. इजरायल का बढ़ता दबाव
इजरायल की सरकार भी युद्ध की तैयारी कर रही है। वह जनवरी में सोचे गए सीमित हमलों से आगे बढ़कर एक बड़े मिलिट्री ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए पूरी तरह उकसा रहा है। ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने न्यूक्लियर बातचीत के दौरान करीब से तालमेल रखा था।
दोनों देशों के अधिकारी पिछले जून की तुलना में कहीं बड़े अमेरिकी-इजरायली अभियान की तैयारी की संभावनाएं देख रहे हैं। इसमें ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल कार्यक्रमों को तबाह करने के साथ-साथ शासन को हटाने के लक्ष्य भी शामिल हो सकते हैं।
6. तेल बाजार: रणनीतिक मौका?
मौजूदा तेल बाजार की स्थिति भी इस फैसले को प्रभावित कर सकती है। एक्सियोस के बेन गेमन के मुताबिक, इस समय बाजार में तेल की आपूर्ति ज्यादा है, कीमतें कम हैं और मांग में बढ़ोतरी सीमित है। ईरान की प्रॉक्सी कैपेसिटी भी कमजोर हुई हैं।
7. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का महत्व
अगर युद्ध हुआ तो तेल की कीमतें जरूर बढ़ेंगी। लेकिन अगर केवल ईरान के इम्पोर्ट पर असर पड़ा और बड़े स्तर पर तेल आपूर्ति बाधित नहीं हुई, तो यह बढ़ोतरी कुछ हद तक सीमित हो सकती है, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से पूरी दुनिया के तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। ईरान ने 1980 के दशक से इसे बंद करने की धमकी दी है, लेकिन अब तक ऐसा नहीं किया। अगर ऐसा होता है तो कई सारे देशों का एक साथ नुकसान होगा।
8. ईरान की कमजोरी और दुखती रग
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों और पिछले साल के हमलों के बाद ईरानी शासन कमजोर दिख रहा है। इससे ट्रंप को लग सकता है कि अभी हमला करने का सही मौका है।
9. जवाबी कार्रवाई और बढ़ता जोखिम
ईरान निश्चित रूप से जवाब देगा। लेकिन अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों को लग सकता है कि अभी उसकी जवाबी क्षमता कुछ महीनों या सालों बाद की तुलना में कम है। पिछले दो सालों में इजरायल ने ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को काफी कमजोर किया है। हूथी विद्रोहियों और लेबनान पर हमला उन्हीं में से एक है।
10. क्या यह अस्तित्व की लड़ाई बन सकती है?
हालांकि यह भी सच है कि मौजूदा हालात ईरानी शासन के लिए अस्तित्व का सवाल बन सकते हैं। अगर उसे लगे कि सत्ता खतरे में है, तो संघर्ष और ज्यादा बढ़ सकता है। यही वजह है कि यह संभावित युद्ध सिर्फ दो देशों का टकराव नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।
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