Iran Vs America: अकेला पड़ा अमेरिका? 10 सबसे बड़े सहयोगी ने ट्रंप को दिखाया ठेंगा, कहा- जंग में साथ नहीं देंगे
Iran America War 2026: ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ा युद्ध दुनिया के समीकरण बदल रहा है। हैरानी की बात यह है कि अमेरिका के सबसे करीबी और पुराने सहयोगी देशों ने इस जंग से दूरी बना ली है। नाटो (NATO) के सदस्य होने के बावजूद इटली, तुर्की और स्पेन जैसे देशों ने न सिर्फ युद्ध में शामिल होने से मना किया, बल्कि अमेरिका को अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र (Airspace) इस्तेमाल करने की इजाजत भी नहीं दी।
इन देशों का मानना है कि सैन्य दखल से मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ेगा। आइए जानते हैं कि किन देशों ने अमेरिका का साथ देने से हाथ पीछे खींच लिए हैं।

इटली: सख्त रुख और एयरबेस पर रोक
इटली ने अमेरिका को साफ संदेश दिया है कि वह उसकी मर्जी के बिना इतालवी जमीन का इस्तेमाल नहीं कर सकता। हाल ही में सिसली के सिगोनेला एयर बेस पर एक अमेरिकी विमान को उतरने से रोक दिया गया। इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो का कहना है कि अमेरिका ने इसके लिए पहले से कोई परमिशन नहीं ली थी। इटली का मानना है कि संधि के नाम पर अमेरिका हर बार अपनी मनमानी नहीं कर सकता, खासकर तब जब मामला किसी देश पर हमला करने का हो।
तुर्की: मध्यस्थ की भूमिका में एर्दोगन
नाटो सदस्य होने के बाद भी तुर्की इस युद्ध में अमेरिका के साथ खड़ा नहीं है। राष्ट्रपति एर्दोगन ने इसे 'इजराइल का युद्ध' करार दिया है और कहा है कि इसकी कीमत मासूम मुसलमान और मानवता चुका रही है। तुर्की फिलहाल दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाने वाले एक बिचौलिए (Mediator) का काम कर रहा है। तुर्की के अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान में किसी भी तरह के सैन्य दखल के खिलाफ हैं और शांति चाहते हैं।
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स्पेन: हवाई क्षेत्र और अड्डों पर पाबंदी
स्पेन की सरकार ने अमेरिका के लिए अपना आसमान पूरी तरह बंद कर दिया है। प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने युद्ध की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि स्पेन के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए नहीं किया जा सकता। रक्षा मंत्री मार्गरीटा रोबल्स ने स्पष्ट किया कि यह फैसला युद्ध की शुरुआत में ही अमेरिका को बता दिया गया था। स्पेन का यह रुख दिखाता है कि वह इस संघर्ष में खुद को घसीटना नहीं चाहता।
ब्रिटेन: डिफेंस तक सीमित समर्थन
ब्रिटेन ने बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखा है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का कहना है कि वे इराक युद्ध जैसी ऐतिहासिक गलती नहीं दोहराना चाहते। हालांकि ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने ठिकानों के इस्तेमाल की छूट दी है, लेकिन शर्त यह है कि वे सिर्फ 'डिफेंस' (बचाव) के लिए होंगे, हमले के लिए नहीं। इसके बावजूद, ब्रिटेन के एयरबेस से अमेरिकी बॉम्बर विमानों की उड़ान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
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फ्रांस और जर्मनी: शांति की अपील
यूरोप की इन दो महाशक्तियों ने भी युद्ध से किनारा कर लिया है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि युद्ध खत्म होने तक कोई भी सैन्य कदम उठाना गलत होगा। वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कहना है कि फिलहाल सबसे जरूरी काम तनाव कम करना है। इन देशों का मानना है कि यूरोप को इस जंग में शामिल नहीं होना चाहिए और सारा ध्यान अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन पर देना चाहिए।
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खाड़ी देश: दुविधा में पड़ोसी
सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देश बड़ी मुश्किल स्थिति में हैं। वे सीधे तौर पर तो अमेरिका के मिलिट्री ऑपरेशन का हिस्सा नहीं बन रहे हैं, लेकिन उनके यहां पहले से मौजूद अमेरिकी ठिकानों को वे पूरी तरह बंद भी नहीं कर पा रहे हैं। कतर और ओमान ने भी चेतावनी दी है कि इस युद्ध के नतीजे बहुत खतरनाक होंगे। ये देश डरे हुए हैं कि युद्ध फैला तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं के इलाके का होगा।
सहयोगी देशों का संयुक्त बयान
सात प्रमुख देशों (जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, जापान और कनाडा) ने एक मिला-जुला बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि वे समुद्र में जहाजों की सुरक्षा के लिए तो मदद कर सकते हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ सीधी जंग में शामिल होने के लिए युद्ध का रुकना पहली शर्त है। यह दिखाता है कि अमेरिका अब इस लड़ाई में काफी हद तक अकेला पड़ता जा रहा है और उसके दोस्त भी अब संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं।
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