Iran America War Explain: ईरान सत्ता बचा लेगा, लेकिन जो खोएगा वो सत्ता से भी बड़ा और भयानक होगा
Iran America War Explain: हर क्रांति के अपने नायक होते हैं। कुछ असली होते हैं, कुछ काल्पनिक। कुछ ज़मीन से उभरते हैं, कुछ ऊपर से गढ़े जाते हैं। कुछ इंसानी कमियों से भरे होते हैं, तो कुछ बिल्कुल परफेक्ट दिखाए जाते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि कई सफल क्रांतियां नायकों के बिना या उनके होते हुए भी नहीं, बल्कि उनके बावजूद सफल होती हैं। असली ताकत उस बदलाव की चाह से आती है जो समाज के सबसे अनदेखे कोनों में जन्म लेती है, जहां बहादुरी कोई मंच या सम्मान नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की ज़रूरत होती है।
ईरान की महिलाएं और रोज़मर्रा का संघर्ष
ईरान की महिलाएं दशकों से ऐसे ही अनदेखे कोनों में जी रही हैं। अभी यह बहस ज़रूरी नहीं कि ईरान में अयातुल्ला शासन जल्द गिरेगा या नहीं। लेकिन इतना साफ है कि डिजिटल ब्लैकआउट के बावजूद बाहर आ रही तस्वीरें और वीडियो एक बात साबित कर रहे हैं-ईरानी समाज अब 'रुबिकॉन' पार कर चुका है। अब इस्लामिक मिलिशिया और राज्य अधिकारियों के रोज़मर्रा के डर और दमन वाली पुरानी ज़िंदगी में लौटना लगभग नामुमकिन लगता है।

बाहरी दखल और उसके पुराने ज़ख्म
संभव है कि अमेरिका के आर्थिक या सैन्य हस्तक्षेप के बिना यह शासन न गिरे। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि यह कोई नुकसानदेह बात हो। इतिहास गवाह है कि बाहर से समर्थित क्रांतियां अक्सर ऐसे गहरे घाव छोड़ जाती हैं जो पीढ़ियों तक नहीं भरते। ईरान ने यह 1979 में देखा था, जब भ्रष्ट शाह शासन को गिराने वाली क्रांति को पश्चिमी देशों का समर्थन मिला, लेकिन नतीजे में देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और जियो-पॉलिटिकल दिशा उलट गई।
एक कट्टरता गई, दूसरी आ गई
1979 की क्रांति के बाद धार्मिक कट्टरता ने व्यावहारिक राजनीति पर कब्ज़ा कर लिया। ईरान ने उतनी ही तेज़ी से दुश्मन बनाए, जितनी तेज़ी से शासन फतवे जारी करता था। इतिहासकार क्रेन ब्रिन्टन ने पहले ही चेतावनी दी थी कि क्रांतियां अक्सर एक कठोर व्यवस्था को हटाकर दूसरी कठोर व्यवस्था बैठा देती हैं। मौजूदा ईरानी शासन भी आसानी से नहीं झुकेगा, लेकिन फर्क यह है कि इस बार प्रदर्शनकारी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
पहले के विरोधों से क्यों अलग है यह आंदोलन
यह आंदोलन 1999 के छात्र विद्रोह, 2009 के ग्रीन मूवमेंट या 2019 के ईंधन-मूल्य विरोधों से कहीं ज़्यादा गहरा है। यह कोई ऐसा असंतोष नहीं है जिसे थोड़े सुधारों से शांत किया जा सके या सिर्फ दमन से कुचला जा सके। दार्शनिक हन्ना एरेंड्ट के शब्दों में कहें तो यह 'दिए गए सत्य' में आई दरार है-जहां सत्ता के प्रति आज्ञाकारिता को अब स्वाभाविक नहीं माना जा रहा।
आंदोलन के केंद्र में खड़ी हैं महिलाएं
इस दरार के बिल्कुल केंद्र में ईरानी महिलाएं हैं। वे सिर्फ प्रतीक, सोशल मीडिया की तस्वीरें या बलि का बकरा नहीं हैं। वे इस पूरे आंदोलन की असली रणनीतिक शक्ति हैं। ईरानी राज्य ने दशकों तक महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण को सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का हथियार बनाया। 1979 के बाद लागू हुए अनिवार्य हिजाब कानूनों से लेकर नैतिकता पुलिस के रोज़मर्रा के अपमान तक, महिलाओं को व्यक्तित्व और स्वतंत्रता से वंचित किया गया।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी बनाम सत्ता
ईरान के प्रोफेसर और समाजशास्त्री आसेफ बायात ने इसे "रोज़मर्रा की ज़िंदगी के ज़रिये सामाजिक नियंत्रण" कहा था। सत्ता बड़े आदेशों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे दैनिक दबावों से खुद को ज़िंदा रखती है। आज जो हो रहा है, वह इसी प्रक्रिया का उलटा है-रोज़मर्रा का प्रतिरोध। छोटा-छोटा लेकिन लगातार, जो शासन की वैधता को हजारों चोटों से कमजोर कर रहा है।
निजी काम अब राजनीतिक बन चुके हैं
हिजाब उतारना, बाल काटना या सार्वजनिक रूप से नाचना-ये सब अब गहरे राजनीतिक कृत्य बन चुके हैं। ऐसी व्यवस्था में, जहां निजी ज़िंदगी को जबरन 'राष्ट्रीय मुद्दा' बना दिया गया हो, वहां हर व्यक्तिगत आज़ादी सत्ता को चुनौती बन जाती है।
फूको की भविष्यवाणी और उसकी सीमा
दार्शनिक मिशेल फूको ने 1978 की ईरानी क्रांति पर लिखते हुए कहा था कि 'राजनीतिक आध्यात्मिकता' टेक्नोक्रेटिक राज्य के खिलाफ लोगों को एकजुट कर सकती है। लेकिन उन्होंने यह कम आंका कि वही आध्यात्मिक सत्ता जब संस्थागत हो जाती है, तो खुद निरंकुश बन जाती है। आज के विरोध उसी थकी हुई निरंकुशता का प्रमाण हैं।
इतिहास जीत की गारंटी नहीं देता
ईरानी राज्य के पास आज भी हिंसा के शक्तिशाली साधन हैं। इतिहास कभी यह वादा नहीं करता कि नैतिक सच्चाई या संख्या हमेशा जीत दिलाएगी। पेरिस कम्यून को कुचल दिया गया था। अफ्रीका में कई क्रांतियों ने विदेशी शासकों की जगह स्थानीय तानाशाह बैठा दिए। अरब स्प्रिंग गृहयुद्ध और प्रतिक्रांति में बदल गया।
1979 की क्रांति का अधूरा सच
1979 की ईरानी क्रांति को अक्सर एक रोमांटिक जीत के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन उसने भी अपनी ही विविधता को जल्द खत्म कर दिया। जलाल अल-ए अहमद और अली शरियाती जैसे बुद्धिजीवियों ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी पश्चिम-विरोधी सोच एक कठोर धार्मिक सत्तावाद में बदल जाएगी।
क्रांति एक घटना नहीं, एक प्रक्रिया है
इतिहासकार चार्ल्स टिली कहते हैं कि क्रांतियां घटनाएं नहीं होतीं, बल्कि लंबी प्रक्रियाएं होती हैं-राज्य की ताकत और जनता के विरोध के बीच लगातार संघर्ष। इस मायने में ईरान पहले से ही एक क्रांतिकारी स्थिति में है, चाहे सत्ता बनी रहे या गिरे।
सत्ता ने खो दिया भरोसा
शासन संस्थागत रूप से जीवित रह सकता है, लेकिन उसने सबसे अहम चीज़ खो दी है-लोगों का भरोसा (खासकर महिलाओं का)। डर अब भी मौजूद है, लेकिन वह अब सिर्फ राज्य के पास नहीं है। अब राज्य को भी डर और वो भी खुद की जनता से।
प्रतीकों का टूटना और जलना
जब बिना हिजाब की किशोर लड़कियां हथियारों से लैस पुरुषों के सामने नारों के साथ खड़ी होती हैं, तो सत्ता का प्रतीकात्मक ढांचा टूटने लगता है। हिजाब जलते हैं, बाल कटतें और खामेनेई की तस्वीर के से सिगरेट जलाई जाती है। ईरान की 60 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी क्रांति के बाद पैदा हुई है। उनकी यादें शाह या विदेशी हस्तक्षेप की नहीं, बल्कि प्रतिबंधों, सेंसरशिप, धर्म के नाम पर रोक-टोक व कैद और आधिकारिक नैतिकता की हैं।
बिना चेहरे वाला विद्रोह
यह कोई घोषणापत्र वाला आंदोलन नहीं है। यह एक समाज है जो अपनी कहानी खुद लिखना चाहता है। यहां कोई एक नेता नहीं, कोई ऐसा चेहरा नहीं जिसे गिरफ़्तार या खत्म किया जा सके। यह बात शासन और विदेशी विश्लेषकों-दोनों को परेशान करती है।
होरिजोंटल पावर ही असली ताकत
लेकिन यही बिखरी हुई, होरिजोंटल स्ट्रक्चर इस आंदोलन को टिकाऊ बनाते है। जेम्स सी. स्कॉट के मुताबिक, सत्ता सबसे कमजोर तब होती है जब अवज्ञा सामान्य हो जाती है। ईरानी शासन गिरे या न गिरे, उसका नैतिक आधार टूट चुका है।
इतिहास नायकों से नहीं, निरंतरता से बदलता है
ईरान की महिलाएं, जिन्हें लंबे समय तक इतिहास के हाशिए पर रखा गया, अब केंद्र में हैं। उन्होंने आदेश मानने से साफ इनकार कर अपनी आजादी वापस ले ली है या लेने की जिद पकड़ ली है। और इसी में एक गहरी सच्चाई छिपी है-इतिहास को नायक नहीं, बल्कि लगातार चलता प्रतिरोध बदलता है।
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