बांग्लादेश में कहीं हो ना जाए बेगम खालिदा जिया की वापसी? जानिए भारत को क्यों है तीसरा फ्रंट खुलने का डर?
Bangladesh News: दिल्ली में बांग्लादेश उच्चायोग के अधिकारियों के मुताबिक, बांग्लादेश में हुई ताजा हिंसा में कम से कम 300 लोगों की मौत के बाद, आवामी लीग सुप्रीमो शेख हसीना ने सोमवार को देश के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है।
देश के नाम एक टेलीविज़न संबोधन में, सेना प्रमुख वकर-उज़-ज़मान ने कहा कि सेना अंतरिम सरकार बनाएगी। देश के कई भाषाई दैनिकों की रिपोर्टों के मुताबिक, शेख हसीना अपनी बहन शेख रेहाना के साथ देश छोड़कर चली गई हैं।

प्रदर्शनकारियों ने आज लगाए गए राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू का उल्लंघन करते हुए 'ढाका तक लंबा मार्च' बुलाया था। वे प्रधानमंत्री हसीना के इस्तीफे की मांग कर रहे थे, जिसमें उन्हें कामयाबी मिल गई है। लेकिन, सवाल ये है, कि आखिर बांग्लादेश में आगे क्या होगा? क्या बांग्लादेश की राजनीति में बेगम खालिदा जिया की वापसी होगी और क्या वो बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनेंगी?
अगर बेगम खालिदा जिया की वापसी होती है, तो क्या भारत के खिलाफ तीसरा फ्रंट खुल सकता है?
क्या भारत के खिलाफ खुलेगा तीसरा फ्रंट?
भारत के खिलाफ पहले से ही दो फ्रंट खुले हुए हैं। एक फ्रंट चीन का है, तो दूसरा फ्रंट पाकिस्तान का है। चीन और पाकिस्तान, दोनों ही देशों से लगती भारत की सीमा पर तनाव है। ऐसे में अगर बेगम खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनती हैं, तो आशंका इस बात को लेकर हो सकती है, कि बांग्लादेश में भी भारत के खिलाफ एक फ्रंट खुल सकता है।
बेगम खालिदा जिया जब प्रधानमंत्री थीं, तो उनके भारत को लेकर काफी खराब रूख अख्तियार कर रखा था। बेगम खालिदा जिया पाकिस्तान और चीन की कठपुतली मानी जाती रही हैं और कहा जा रहा है, कि इस बार भी बांग्लादेश में हुए विरोध प्रदर्शनों में चीन और पाकिस्तान का समर्थन हासिल था।
बेगम खालिदा जिया की पार्टी का नाम बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानि BNP है और बीएनपी, ढाका में तीन बार सत्ता में रही है, जो भारत के प्रति अपनी शंकाओं के लिए जानी जाती है। लिहाजा, भारत को डर हो सकता है, कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन से भारत के साथ सुरक्षा सहयोग में बाधा आ सकती है, जिससे भारत की आंतरिक सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
बेगम खालिदा जिया ने आखिरी बार 28 अक्टूबर 2012 को भारत का दौरा किया था और उस दौरान वो बांग्लादेश की विपक्षी नेता थीं और बांग्लादेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा था। उस दौरान तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार ने रेट कार्पेट बिछाकर उनका स्वागत किया था। उस वक्त भारत सरकार के निमंत्रण पर वो दिल्ली पहुंची थी और उस दौरान उन्होंने सरकार के शीर्ष नेताओं के साथ बैठक की थी, जिनमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और सत्तारूढ़ यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी भी थीं।
उस दौरान उन्होंने भारतीय नेताओं के साथ बैठकों के दौरान, तीस्ता जल समझौता, भूमि सीमा समझौता, तिपाईमुख मुद्दे, व्यापार घाटा आदि जैसे द्विपक्षीय मुद्दों पर बात की थी।
लेकिन, शेख हसीना ने 2012 के चुनाव में जीत हासिल की थी और उसके बाद से वो लगातार देश की प्रधानमंत्री थीं और इस दौरान बेगम खालिदा जिया नजरबंद रहीं। वहीं, अब खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान, जिनके खिलाफ शेख हसीना की सरकार आतंकवादी धाराओं में मुकदमा चला रही थी, उन्होंने छात्रों को प्रदर्शन के लिए बधाई दी है और कहा है, कि 'हम सब मिलकर लोकतांत्रिक सरकार चलाएंगे।'
लेकिन, उनका इतिहास ऐसा नहीं रही है।
खालिदा जिया की सरकार के दौरान बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथ हावी था। उनकी सरकार के दौरान भारत के खिलाफ लगातार आतंकी हरकतों को अंजाम दिया गया। खालिदा जिया के शासन के दौरान बांग्लादेश में कट्टर इस्लामिस्ट पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने उपद्रव मचाया था और हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ मुहिम चलाई थी।
हालांकि, बांग्लादेश में आगे क्या होगा, फिलहाल वो अनिश्चित है। लेकिन, शेख हसीना का जाना भारत के लिए कतई अच्छा नहीं है और अगर खालिदा जिया की सत्ता में वापसी होती है, तो भारत के लिए बांग्लादेश उस पड़ोसी देश के तौर पर उभर सकता है, जो पाकिस्तान, मालदीव, चीन और म्यांमार की तरह भारत के लिए मुसीबतें पैदा कर सकता है!












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