कंगाली में फंसते जा रहे हैं भारत के पड़ोसी देश, नेपाल में फिर राजनीतिक संकट, मोदी सरकार उठाएगी जिम्मेदारी?
साल 2021 के बाद से भले ही भारत ने आर्थिक संकट से निपटने के लिए श्रीलंका को 4 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दी है, लेकिन, श्रीलंका संकट बना हुआ है।

भारत के करीबी सहयोगी भूटान और बांग्लादेश के साथ साथ, भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देश राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहे हैं और गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। राजनीतिक संकट में फंसने वाला सबसे नया पड़ोसी देश नेपाल है, जहां 2008 में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद से अभी तक 11 अलग अलग सरकारें बन चुकी हैं। हिमालयी देश नेपाल एक बार फिर से राजनीतिक झंझावातों में फंसा हुआ है और नेपाल सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं, कि क्या भारत की 'पड़ोसी पहले' की नीति संकटग्रस्त पड़ोसी देशों को बचा पाएगी।

संकट में फंसा नेपाल
नेपाली कम्युनिस्टों के फिर से विभाजित होने के बाद नेपाल सरकार संकट में है, हालांकि उम्मीद ये है, कि माओवादी नेता पी.के. दहल उर्फ प्रचंड नेपाली कांग्रेस की मदद से संसद में विश्वास मत हासिल कर लेंगे। दहल की पार्टी ने नेपाल के राष्ट्रपति पद के लिए नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन करने का फैसला किया था, जिसके बाद के.पी. शर्मा ओली ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। राजशाही के खात्मे के बाद से, हिमालयी गणराज्य ने शायद ही कभी देश में राजनीतिक स्थिरता देखी है और नेपाल के नेता संकटग्रस्त और गरीब आबादी को बीच मंझधार में फंसाकर सत्ता हासिल करने के गणित में ज्यादा उलझे रहते हैं। काठमांडू में एक और खेल खेला जाता है, जिसमें भारत और चीन के बीच के बीच की प्रतिद्वंदिता का फायदा उठाकर बदले में आर्थिक या बुनियादी ढांचा सहायता प्राप्त करना होता है।

नेपाल संकट का भारत पर असर
भले ही नेपाली राजनेताओं ने अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए भारत पर प्रहार करने का कोई मौका नहीं जाने दिया, लेकिन तथ्य यह है, कि नेपाल, श्रीलंका या पाकिस्तान की तुलना में उसी तरह का या उससे भी बदतर स्थिति में होता नेपाल, अगर आर्थिक संकट में फंसता है, तो उसका असर यकीनन भारत पर पड़ेगा। नेपाली रुपया, भारतीय रुपया की तुलना में 1.6 प्वाइंट पर है और अगर नेपाली रुपये का और पतन होता है, तो फिर भारत की तरफ से उसे असीमित रुपया उधार लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी। सीधे शब्दों में कहें, तो अगर नेपाल फेल होता है, तो दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाले भारत को भी नुकसान होगा। चीन की वजह से नेपाल की सरकार स्थिर नहीं रह पाती है, क्योंकि चीन की कोशिश यही होती है, कि नेपाल में उसकी मनपसंद सरकार बने, ताकि वो भारत को नेपाल के रास्ते घेर सके।

अभी तक डूबा हुआ है श्रीलंका
साल 2021 के बाद से भले ही भारत ने आर्थिक संकट से निपटने के लिए श्रीलंका को 4 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दी है, लेकिन, श्रीलंका की वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल ने यह सुनिश्चित कर दिया है, कि देश में फैसला लेने वाला एक ही शख्स है, जो राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठा है। और राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघ देश को संकट से निकालने के लिए कठोर फैसले लेने से बच रहे हैं, क्योंकि एक तो उन्हें डर है, कि ऐसा करने से वो राजपक्षे परिवार की तरह बदनाम हो सकते हैं और दूसरा डर ये, कि उन्हें आम जनता के क्रोध का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही, श्रीलंक और आईएमएफ के बीच का समझौता इसलिए फंसा हुआ है, क्योंकि श्रीलंका को अभी तक चीन से समर्थन हासिल नहीं हुआ है। श्रीलंका ने चीन से भारी-भरकम कर्ज ले रखा है और अभी तक चीन ने श्रीलंका को कर्ज के पुनर्गठन का आश्वासन नहीं दिया है, लिहाजा श्रीलंका बड़ी राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है। अगर अमेरिका और जापान, श्रीलंका की मदद के लिए हाथ नहीं मिलाते हैं, तो ये द्वीप देश बड़े संकट में फिर से फंस जाएगा, जबकि भारत ने श्रीलंका के आईएमएफ प्रोग्राम का समर्थन कर दिया है। श्रीलंका के पास फिलहाल 500 मिलियन डॉलर का ही विदेशी मुद्रा भंडार है, ऐसे में देश कब तक उथल-पुथल से बच पाएगा, ये देखने वाली बात होगी।

डिफॉल्ट कर चुका है पाकिस्तान!
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पिछले हफ्ते कहा था, कि वो जिस देश में रहते हैं, वो कब का डिफॉल्ट कर चुका है। इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान, भोजन और ईंधन की कमी, आतंकी हमलों और राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहा है। 'बड़े भाई' चीन ने पाकिस्तान को फिर से 700 मिलियन डॉलर का नया लोन दिया है, बावजूद इसके पाकिस्तानी रुपया और डॉलर के बीच का एक्सचेंज रेट काफी ज्यादा है और पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 3 अरब डॉलर के आसपास है। हालांकि, अपनी आदत के मुताबिक, कंगाली के हालात में फंसे होने के बाद भी पाकिस्तान खलिस्तानी आतंकियों को मदद पहुंचा रहा है और अभी भी कश्मीर घाटी में निर्दोष कश्मीरी पंडितों की हत्याएं आतंकियों से करवा रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान का, अफगानिस्तान के तालिबान शासकों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा डुरंड रेखा पर अलग ही तनाव चल रहा है। जबकि, एक और आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान लगातार पाकिस्तान में आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहा है। पिछले महीने पेशावर में मस्जिद में हुए आतंकी बम धमाके में कम से कम 100 लोग मारे गये थे। फिर भी पाकिस्तान बेपरवाह है।

मालदीव-अफगानिस्तान भी बेहाल
वहीं, मालदीव में राष्ट्रपति आई.एम. सोलिह और विपक्षी नेता मोहम्मद नशीद के बीच की प्रतिद्वंद्विता लगातार बढ़ती जा रही है, लिहाजा मालदीव अभी भी कोविड महामारी के बाद के हालातों में फंसा हुआ है। वहीं, अफगानिस्तान के तालिबान शासकों को अभी तक वैश्विक समुदाय से मान्यता नहीं मिली है और देश में आर्थिक बदहाली भयंकर स्वरूप ले चुका है। स्थिति ये है, कि लोगों को अपनी बेटियों को बेचना पड़ रहा है, वहीं देश में आतंकी हमले भी लगातार होते रहते हैं, लिहाजा किसी भी तरह का वैश्विक निवेश भी देश को नहीं मिल रहा है। पिछले हफ्ते तो ये रिपोर्ट भी आई है, कि तालिबान भी दो धड़ों में बंट चुका है, जिसमें एक काबुल गुट है, तो दूसरा गुट कंधार गुट है। वहीं, सैन्य शासन के चुंगल में फंसा म्यांमार भी राजनीतिक और आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है। नजदीकी भविष्य में म्यांमार के ना तो राजनीतिक तौर पर पटरी पर लौटने की उम्मीद है और ना ही आर्थिक तौर पर। लिहाजा, म्यांमार की गरीब जनता को अभी लंबे वक्त तक आर्थिक बदहाली से जूझना होगा।












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