क्या इंडियन नेवी को अपना माइंडसेट बदलने की जरूरत है? कराची नहीं, इंडो-पैसिफिक बना युद्ध का नया मैदान!
भारत के पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर हो चुके हैं और सबसे खास बात ये कि भारत के पास अब एयरक्राफ्ट बनाने की टेक्नोलॉजी होने के साथ साथ इसकी दक्षता भी है, लेकिन क्या ये शक्ति सिर्फ दिखाने के लिए है?
नई दिल्ली, अगस्त 28: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 सितंबर की दोपहर को आईएनएस विक्रांत एयरक्राफ्ट कैरियर को भारतीय नौसेना में शामिल करेंगे। इस कमीशनिंग के साथ भारत दो एयरक्राफ्ट कैरियर वाला देश बन जाएगा और तीन परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों के स्वदेश में निर्माण की कोशिश के बाद दो एयरक्राफ्ट कैरियर का होना भारत की क्षमता और टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन करता है और बताता है, कि वैश्विक शक्ति के मामले में भारत टॉप-5 में शामिल हो गया है। हालांकि, आईएनएस विक्रांत को पूरी तरह से चालू होने में एक साल और आईएनएस विक्रमादित्य इस साल के अंत तक पूरी तरह से ऑपरेशन हो जाएगा।

भारत की मजबूत होती समुद्र शक्ति
भारत के पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर हो चुके हैं और सबसे खास बात ये कि भारत के पास अब एयरक्राफ्ट बनाने की टेक्नोलॉजी होने के साथ साथ इसकी दक्षता भी है, लिहाजा पिछले लंबे अर्से से तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण की इजाजत मांगी जा रही है, जिसका आकार आईएनएस विक्रांत से भी ज्यादा होगी। हालांकि, भारत सरकार की तरफ से अभी तक इसकी इजाजत नहीं दी गई है, लेकिन कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि, तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर हासिल करने से पहले इंडियन नेवी को पहले मौजूदा मजबूत बल के साथ अपनी योग्यता साबित करने की आवश्यकता है। दो विमानवाहक पोतों और नौसैनिक उड्डयन में आधी सदी के अनुभव के साथ, भारतीय नौसेना आज हिंद-प्रशांत में किसी भी एशियाई शक्ति के खिलाफ समुद्री मोर्चे को खोलने की क्षमता रखता है। लेकिन, क्या इंडियन नेवी को अब अपना माइंडसेट बदलने की जरूरत है, क्योंकि युद्ध का मैदान अब कराची से इंडो-पैसिफिक में शिफ्ट हो चुका है।

इंडियन नेवी की समुद्री कूटनीति
हिंदुस्तान टाइम्स के एक लेख के मुताबिक, भारतीय नौसेना को समुद्री कूटनीति की मानसिकता से आगे बढ़ना चाहिए और ऊंचे समुद्रों पर विरोधी का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इंडियन नेवी को अब सिर्फ फोर्स प्रोजेक्शन और फोर्स एप्लिकेशन की तरफ बढ़ना चाहिए और इसे अगर सामान्य शब्दों में कहें, को भारतीय नौसेना को अब अपने दांत की तेज धार को दिखाने की जरूरत है, क्योंकि थिएटर कराची बंदरगाह की केवल नाकाबंदी से इंडो-पैसिफिक में ट्रांसफर हो गया है और अब ये लड़ाई उस विरोधी के खिलाफ हो गया है, जो दुनिया में नंबर-वन की शक्ति बनना चाहता है और जिसके लिए वो सभी नियम-कायदों की किताब को फाड़कर फेंकने के लिए तैयार है। वो शक्ति अब हिंद महासागर में घुस आया है और श्रीलंका में चीनी राजदूत का बेशर्म और मुंहफट बयान इस बात की गवाही देता है, कि भारत को अब अपनी नीति बदलनी ही होगी।

चीन का बेशर्म बयान क्या है?
श्रीलंका में चीनी राजदूत ने बेशर्म और मुंहफट बयान में कहा है कि, भारत ने इतिहास में श्रीलंका पर 17 बार हमले किए हैं। ताइवान और इंडो-पैसिफिक के आसपास चीनी युद्ध डांस को केवल घरेलू दर्शकों के लिए काबुकी के रूप में खारिज नहीं किया जा सकता है। लद्दाख में मई 2020 की तरह चीन एक बार फिर से अपनी शक्ति को संग्रहित कर रहा है और वैश्विक मंच पर एक प्रमुख शक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति की घोषणा कर रहा है, लिहाजा अब भारत अपनी रणनीति बनाने और नई पॉलिसी बनाने में ज्यादा वक्त नहीं ले सकता है। अन्यथा, भविष्य में भारत के पास कोई और चारा भी नहीं रहेगा, लिहाजा युद्ध के नये मैदान में दुश्मन के सामने शंखनाद करने की जरूरत है और वो भी तब, जब चीन की नौसेना के पास भी सिर्फ 3 ही एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, जिनमें तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर 2 महीने पहले ही कमीशन किया गया है और चीन के पास लड़ाई का मैदान भी भारत की तुलना में काफी ज्यादा है, लिहाजा ड्रैगन को घेरना इंडियन नेवी के लिए कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है, सिर्फ माइंडसेट की जरूरत है।

क्या भारत के लिए जरूरी है तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, इंडियन नेवी लंबे अर्से से तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण की मांग कर रही है, वहीं हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, तीसरे विमानवाहक पोत की भारतीय नौसेना की इच्छा तभी समझ में आती है, जब वह अपने दरवाजे पर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी विरोधी से मुकाबला कर सके। बंगाल की खाड़ी या अरब सागर की रक्षा के लिए एक कैरियर स्ट्राइक फोर्स की तैनाती के लिए अरबों डॉलर खर्च करने का कोई मतलब नहीं है। यह भारत के द्वीप क्षेत्रों में स्थित एयरबेस और एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलों से आसानी से सुनिश्चित किया जा सकता है। यह याद रखना चाहिए कि अपने विदेशी क्षेत्रों के साथ फ्रांस के पास सिर्फ एक एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक फोर्स है और यूके, जो कभी विदेशी क्षेत्रों के साथ एक पूर्व-प्रतिष्ठित नौसैनिक शक्ति है, उसके पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर हैं। जहां तक नौसैनिक उड्डयन का संबंध है, न तो जापान और न ही जर्मनी के पास एयरक्राफ्ट कैरियर हैं। इस खेल में एकमात्र बड़ा और माहिर खिलाड़ी अमेरिका है, जो हिंद-प्रशांत में भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी कर चुका है और जिसका दुश्मन भी चीन है। अमेरिका के पास 12 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं। भारत के पूर्व सीडीएस दिवंगत जनरल विपिन रावत भी तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर की मांग को अस्वीकार कर चुके हैं।

हिंद महासागर में घुस गया चीन
हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी गतिविधि में पिछले एक दशक में लगातार वृद्धि हुई है और पिछले एक दशक में कम से कम 53 सैटेलाइट ट्रैकिंग जहाज और बैलिस्टिक मिसाइल हिंद महासागर में आ चुके हैं और इन जहाजों की इंडियन नेवी ने सर्विलांस रिसर्च वेसल्स भी कहा है। जबकि बीजिंग दक्षिण चीन सागर को अपना आंगन बनाने की की कोशश कर रहा है और इसके लिए वो लगातार छोटे देशों को धमका रहा है। चीन कभी समुद्री कूटनीति तो कभी समुद्री डकैती विरोधी अभियानों के नाम पर हिंद महासागर और सुदूर प्रशांत क्षेत्र में अधिक युद्धपोत भेज रहा है। यह केवल समय की बात है जब चीनी वाहक स्ट्राइक फोर्स हिंद महासागर से होकर गुजरेगी और भारतीय नौसेना और फारस की खाड़ी से निकलने वाली समुद्री गलियों पर प्रेशर आएगा। भारत का विरोध अच्छी तरह से परिभाषित है और राष्ट्रीय सुरक्षा योजनाकारों के भीतर इस बारे में कोई भ्रम नहीं है। लिहादा, तीसरे युद्धपोत की तभी जरूरत है, जब इंडियन नेवी अपना माइंडसेट बदलकर युद्ध के लिए तैयार हो जाए।












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