Siachen: भारत के हाथों से निकल रहा है सियाचिन, फौरन ध्यान नहीं दिया गया, तो हाथ में ना बर्फ बचेगी ना पानी!
Siachen Indian Army: दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र का एक दुर्जेय दुश्मन है, जलवायु परिवर्तन। सियाचिन ग्लेशियर, जहां 1984 से भारतीय और पाकिस्तानी सेनाएं एक-दूसरे का सामना कर रही हैं, वो अब पिघल रहा है और सदी के अंत तक सियाचीन ग्लेशियर 68 प्रतिशत का भारी नुकसान झेल सकता है।
सियाचीन ग्लेशियर गैर-ध्रुवीय क्षेत्र है और दुनिया के दूसरे सबसे लंबे सियाचिन ग्लेशियर की खतरनाक ऊंचाइयों और जोखिम भरे दर्रों में चलने वाली इस लड़ाई को अक्सर "ओरो-पॉलिटिक्स" कहा जाता है, जहां 'ओरो' का अर्थ पहाड़ होता है।

पाकिस्तानी सेना सियाचीन ग्लेशियर पर हमला करने और कब्जा करने की प्लानिंग तैयार कर रही थी, लेकिन उससे पहले ही इंडियन आर्मी ने सियाचीन को अपने कब्जे में ले लिया और उसके बाद से लगातार भारत का सियाचीन ग्लेशयर पर नियंत्रण है।
खतरनाक मौसम से सीधी लड़ाई
सियाचिन ग्लेशियर में अब बंदूकें खामोश रहती हैं, लेकिन अत्यधिक ऊंचाई, दुर्लभ वातावरण और जोखिम भरा इलाका, यहां पर तैनात सैनिकों के लिए अत्यंत मुश्किलें पैदा करती हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच सियाचिन संघर्ष को अक्सर दुनिया का सबसे ठंडा युद्ध या अंतहीन युद्ध कहा जाता है। अत्यधिक ऊंचाई और प्रचंड जलवायु, एक अज्ञात दुश्मन की तरह है, जिससे हर एक सेकंड सैनिकों को युद्ध लड़नी पड़ती है। सियाचीन ग्लेशियर में जवानों की मौत दुश्मनों की गोली से नहीं, बल्कि खतरनाक मौसम से होती है, जिससे निपटने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किया जाता है।
पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर सरकार (PoK) की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के उप निदेशक डॉ. सरदार मुहम्मद रफीक खान द्वारा प्रकाशित नवीनतम शोध पत्र से संकेत मिलता है, कि नियंत्रण रेखा के दोनों ओर "हिमनद संकट" व्याप्त है और अभी तक करीब 25 प्रतिशत ग्लेशियर लुप्त हो गये हैं।
इस पेपर की स्टडी करने पर पता चलता है, कि नियंत्रण रेखा के पाकिस्तानी हिस्से में नीलम घाटी में ग्लेशियर "तेजी से कम हो रहे हैं और इसके अगले 50 वर्षों के भीतर पूरी तरह से गायब होने की संभावना है।"
यह पेपर जर्नल ऑफ अर्थ साइंस एंड क्लाइमैटिक चेंज द्वारा आयोजित पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर 8वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए प्रस्तुत किया गया है। पेपर एक अस्थिर प्रवृत्ति पर प्रकाश डालता है, जिसमें कहा गया है, कि हिमालय के ग्लेशियर प्रति वर्ष 159 से 309 हेक्टेयर की दर से पिघल रहे हैं।
खान ने कहा है, कि साल 2000 से 2017 तक ग्लेशियर पिघलने की प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए, ग्लेशियरों का कवर क्षेत्र 10,396-9,496 हेक्टेयर तक कम हो चुका है और उन्होंने कहा, कि अनुमानित तौर पर इसमें 954 से 1,854 हेक्टेयर की और कमी हो सकती है और कुल मिलाकर 5,000-6,000 हेक्टेयर तक की कमी हो चुकी है। उन्होंने कहा, कि सटीक तौर पर इसलिए रिपोर्ट में नहीं कहा गया है, क्योंकि इसे मापने का कोई वैज्ञानिक तरीका उनके पास मौजूद नहीं है।
श्रीनगर में कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति ग्लेशियोलॉजी विशेषज्ञ शकील अहमद रोमशू, जिन्होंने भारतीय ग्लेशियरों की स्टडी की है, उनके मुताबिक, पिछले 50-60 सालों में हमने अपने ग्लेशियर द्रव्यमान का लगभग 25 प्रतिशत खो दिया है।"

ग्लेशियर पिघलने से गंभीर नुकसान
अनुमानों से पता चलता है, कि मध्यम जलवायु परिवर्तन होने से भी इस सदी के अंत तक 68 प्रतिशत ग्लेशियल पिघल कर गायब हो जाएगा। रोमशू ने क्षेत्र के 18,000 ग्लेशियरों, जैसे कि विशाल सियाचिन ग्लेशियर, के महत्व पर जोर दिया है। उन्होंने चेतावनी दी है, कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय क्षेत्र में पानी की उपलब्धता पर असर पड़ने वाला है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
उन्होंने कहा, कि "हमारे पास लगभग 18,000 ग्लेशियर हैं। इनमें से कुछ ग्लेशियर बड़े हैं, जैसे सियाचिन ग्लेशियर, जिसकी एक आयाम में लंबाई लगभग 65 किमी है। हमारे पास जो विशाल ग्लेशियर हैं, वो लगभग 500 से 600 मीटर मोटे हैं और वे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विशाल संसाधन हैं और उन्होंने कहा, जलवायु परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र में अब कम बर्फबारी हो रही है।"
आपको बता दें, कि कश्मीर घाटी में इस साल और पिछले साल बर्फबारी नहीं हुई है, जिससे पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है और इससे अल नीनो प्रभाव भी उजागर होगा। बर्फ और ग्लेशियर सिन्धु-गंगा के मैदानी इलाकों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत हैं। बर्फबारी कम होने से क्षेत्र में झरनों और पानी की उपलब्धता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

सियाचीन में कैसी है भारतीय सेना की मौजूदगी
भारतीय सेना ने 1984 में ऑपरेशन मेघदूत के तहत सियाचिन ग्लेशियर को अपने नियंत्रण में ले लिया था और तब से, भारतीय सेना यहां मौजूद है।
मेघदूत के जवाब में पाकिस्तान ने बिलाफोंड ला और सिया ला से भारतीय सैनिकों को हटाने के लिए ऑपरेशन अबाबील शुरू किया था, लेकिन वो हर बार नाकाम रहा है। सियाचिन ग्लेशियर तक पहुंचने के लिए सिया ला, बिलाफोंड ला और ग्योंग ला ही एकमात्र रास्ते हैं। लेकिन, रुक-रुक कर होने वाले दोनों देशों के बीच के इस संघर्ष ने, सियाचिन को दुनिया का "सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र" होने का उपनाम दिला दिया है। सैनिक बेहद खराब मौसम के बीच 24,000 फीट तक की ऊंचाई पर युद्ध लड़ते रहे हैं।
सियाचीन ग्लेशियर भारत के लिए काफी ज्यादा महत्व रखता है और पाकिस्तान और चीन, सियाचिन ग्लेशियर से ही विभाजित हैं, जो मध्य एशिया को भारतीय उपमहाद्वीप से भी विभाजित करता है।
सियाचिन ग्लेशियर का साल्टोरो रिज, चीन और पाकिस्तान के बीच एक बाधा के रूप में काम करता है, जो पीओके को चीन से सीधे जुड़ने से रोकता है और चीन को वहां सैन्य संबंध स्थापित करने से रोकता है। सियाचिन, भारत के लिए एक निगरानी टावर के रूप में भी कार्य करता है, जिससे उसे पाकिस्तान के गिलगित और बाल्टिस्तान क्षेत्रों पर कड़ी नजर रखने की अनुमति मिलती है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, सियाचीन ग्लेशियर में इंडियन आर्मी के करीब 5 हजार जवान हमेशा तैनात रहते हैं।
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