भारत के पास श्रीलंका, चीन के साथ मालदीव, दगाबाज़ बांग्लादेश.. हिंद महासागर में ड्रैगन Vs हाथी, किसके पास बाजी?
Indian Ocean: चीनी पनडुब्बी और जासूसी जहाज को अपने बंदरगाहों तक पहुंचने से रोकने के बाद श्रीलंका ने 3 फरवरी को देश की स्वतंत्रता दिवस से पहले भारतीय नौसेना की पनडुब्बी आईएनएस करंज का स्वागत कर हिंद महासागर की 'लड़ाई' को दिलचस्प बना दिया है।
श्रीलंका में भारतीय पनडुब्बी का स्वागत किया जाना, भारत के लिए एक कूटनीतिक जीत का प्रतीक है। लेकिन भारतीय बैकयार्ड में चीनी पनडुब्बी डॉकिंग का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है, क्योंकि बीजिंग, बांग्लादेश में एक विशाल नौसैनिक अड्डे का निर्माण कर रहा है।

श्रीलंकाई नौसेना ने यह घोषणा करते हुए कहा है, कि भारतीय पनडुब्बी श्रीलंका में पनडुब्बी जागरूकता कार्यक्रम में हिस्सा लेगी, और पनडुब्बी चालक दल देश में पर्यटक आकर्षणों की खोज करेगा।
भारतीय पनडुब्बी, जो पहली बार श्रीलंका पहुंची है, वो कलवरी सीरिज की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी है, जो फ्रांसीसी स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों पर आधारित है। इसे फ्रांसीसी नौसैनिक समूह डीसीएनएस ने डिजाइन किया है और मुंबई में मझगांव डॉक लिमिटेड ने इसका निर्माण किया है।
श्रीलंकाई नौसेना ने एक घोषणा में कहा है, कि "आईएनएस करंज 53 लोगों के चालक दल के साथ 67.5 मीटर लंबी पनडुब्बी है, और इसकी कमान कमांडर अरुणाभ के पास है।"
पनडुब्बी 5 फरवरी को श्रीलंकाई बंदरगाह से वापस रवाना होगी।
चीन के चंगुल से निकला श्रीलंका अब भारत के साथ!
इससे पहले लगातार चीनी पनडुब्बियां श्रीलंका पहुंच रही थीं, लेकिन अब श्रीलंका ने चीनी पनडुब्बियों और जहाजों की मेजबानी करने से मना कर दिया है और ये पहली बार है, जब भारतीय पनडुब्बी श्रीलंका के बंदरगाह तक पहुंची है।
श्रीलंका ने एक जनवरी से चीनी जहाजों की एंट्री पर रोक लगा दी है, जो भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक जीत है। क्योंकि चीनी जासूसी जहाज, वैज्ञानिक रिसर्च के बहाने हिंद महासागर में सर्वे करता था और भारत के दक्षिणी राज्यों में अलग अलग मिसाइलों की जासूसी करने की कोशिश करता था।
हिंद महासागर में जासूसी के जरिए चीन जो जानकारियां जुटाता था, उसका इस्तेमाल वो मलक्का जलडमरूमध्य के उथले पानी और पूर्वी हिंद महासागर के माध्यम से नेविगेट करने की कोशिश करने वाली चीनी पनडुब्बियों के लिए अमूल्य है, जिससे भारत को बहुत परेशानी होती है।
हिंद महासागर का खेल हुआ दिलचस्प
हालांकि, हिंद महासागर क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण पेचीदा होता जा रहा है, क्योंकि मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मालदीव ने उसी चीनी अनुसंधान जहाज को माले में डॉक करने के लिए हरी झंडी दे दी है, जो भारत के लिए काफी निराशाजनक है।
चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को 99 सालों के लिए लीज पर ले रखा है और चीन लगातार उसे ब्लैकमेल करता है। हंबनटोचा बंदरगाह भारत की नाक के नीचे है।
चीनी बैलिस्टिक मिसाइल ट्रैकर्स और अनुसंधान निगरानी जहाजों को श्रीलंका या मालदीव द्वारा अनुमति दिए जाने पर भारतीय चिंता इस डर के कारण है, कि बीजिंग समुद्री अन्वेषण के नाम पर जासूसी के लिए उनका इस्तेमाल कर सकता है।
वैज्ञानिक अनुसंधान में शामिल चीनी रिसर्च जहाज, अपने उपकरणों का उपयोग नौसैनिक टोही, विदेशी सैन्य सुविधाओं और आसपास के क्षेत्र में संचालित जहाजों पर खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए भी कर सकते हैं।
एक चीनी पनडुब्बी आखिरी बार अक्टूबर 2014 में कोलंबो में रुकी थी, इस कदम की भारत ने जमकर आलोचना की थी। भारत ने डॉकिंग को 1987 के समझौते के उल्लंघन के रूप में देखा, जिसमें कहा गया है, कि "श्रीलंका में बंदरगाहों को भारत के हितों के प्रतिकूल तरीके से किसी भी देश द्वारा सैन्य उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं कराया जाएगा।"
2017 में, श्रीलंका ने कोलंबो में अपनी एक पनडुब्बी को खड़ा करने के चीन के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि यह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए हानिकारक था।
चीन की नई 'लुक साउथ पॉलिसी'
श्रीलंका ने भले ही चीनी पनडुब्बियों को डॉकिंग करने से मना कर दिया हो, लेकिन बीजिंग को भारत के प्रभुत्व वाले क्षेत्र में एक और पकड़ मिल गई है। चीन ने बांग्लादेश नौसेना को दो पनडुब्बियां दी हैं, और कॉक्स बाजार में एक बंदरगाह का निर्माण कर रहा है, जिसका उद्घाटन 2023 में किया गया था।
सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है, कि चीन ने नौसेना बेस पर महत्वपूर्ण प्रगति की है, और बेस का आकार इंगित करता है, कि पीएलए-नौसेना जल्द ही बेस तक "लॉजिस्टिक पहुंच" हासिल कर लेगी। दूसरे शब्दों में, चीनी पनडुब्बियां नवीनीकरण और सर्विसिंग के लिए बांग्लादेश बंदरगाह पर आएंगी और डॉक करेंगी। विशेषज्ञ इसे चीन की ''पनडुब्बी कूटनीति'' बता रहे हैं।
सैटेलाइट तस्वीरों के हालिया विश्लेषण के अनुसार, "बांग्लादेश में नौसैनिक अड्डे के निर्माण का खुलासा हुआ है, कि बंगाल की खाड़ी में पैर जमाने से पीएलए की चीन के तटों से दूर तक काम करने की क्षमता काफी बढ़ जाएगी और भारत के साथ-साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए नई चुनौतियां पैदा होंगी।"
बांग्लादेश की प्रधान मंत्री शेख हसीना के नाम पर, बीएनएस शेख हसीना नौसेना बेस का नामकरण किया गया है और यह बेस 1.75 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। एक बार पूरा होने पर, यह बेस छह पनडुब्बियों और आठ युद्धपोतों को एक साथ डॉक करने में सक्षम होगा।
बंगाल की खाड़ी, कम्युनिकेशन के लिहाज से काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो चीन, जापान और कोरिया को मध्य पूर्व और अफ्रीका से जोड़ती है, और इन मार्गों से दुनिया का आधा व्यापार गुजरता है।
बांग्लादेश के अधिकारियों ने पुष्टि की है, कि चीनी कर्मी अपने पनडुब्बी चालकों को पनडुब्बियों और नए बेस के ऑपरेशन में भूमिका निभा रहे हैं। प्रधान मंत्री हसीना ने यह भी कहा है, कि इस सुविधा का उपयोग "बंगाल की खाड़ी में नौकायन करने वाले जहाजों के लिए एक सर्विस प्वाइंट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, यानि यह एक साफ संकेत है, कि सर्विसिंग के नाम पर चीनी जहाज अब यहां रूका करेंगे।
हालांकि, चीन ने इसपर चुप्पी साध रखी है, क्योंकि वो भारत को नाराज नहीं करना चाहता है। लेकिन भारत सतर्क है।
बांग्लादेश नौसेना को दी गईं दो चीनी पनडुब्बियां भारत के लिए कोई खास खतरा नहीं हैं। लेकिन इन दोनों पनडुब्बियों के साथ चीनी सेना के अधिकारी भी पहुंचे हैं, जो चिंता की बात है। साथ ही, पनडुब्बी बेस को चीनी कर्मियों से रखरखाव और ऑपरेशनल समर्थन की आवश्यकता होगी।
ये बंदरगाह भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान से काफी नजदीक है, जहां भारत स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी का निर्माण कर रहा है, लिहाजा ये भारत के लिए चिंता की बात है।
चीन लंबे समय से अपने सीमित और प्रतिकूल समुद्री भूगोल, खासकर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के कारण, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर तक पहुंच रहा है। चीन के लिए बंगाल की खाड़ी में प्रवेश को पहले म्यांमार और अब बांग्लादेश द्वारा काफी सुविधा प्रदान की जा रही है, लिहाजा भारत को काफी सतर्क रहने की जरूरत है।
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