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सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था दम तोड़ने वाली है? मोदी सरकार के फैसले से प्रिंस सलमान का सूखा गला

सऊदी अरब ने सालों तक भारत को तेल व्यापार के नाम पर प्रेशर में रखने की कोशिश की, और सऊदी ने तेल बाजार पर अपना दबदबा बनाए रखा है। लेकिन, अब सऊदी अरब पहली बार अपनी अर्थव्यवस्था को खतरे में देख रहा है।

saudi arab india crude oil trade low

India-Saudi Arabia: कुछ साल पहले तक खाड़ी देश भारत को तेल के नाम पर बहुत आसानी से धमका लेते थे और भारत को खाड़ी देशों को मनाकर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता था, क्योंकि खाड़ी देशों से भारत की तेल डिमांड पूरी होती थी।

लेकिन, जियो-पॉलिटिक्स में हर दिन एक समान नहीं रहता है और आज शायद सऊदी अरब से बेहतर इस बात को कोई और नहीं समझ सकता है। सऊदी अरब, जो भारत को तेल बेचने के मामले में दूसरे नंबर पर था, वो अब काफी पीछे चला गया है और इसका सीधा असर, देश की अर्थव्यवस्था पर हुआ है और कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि जो ट्रेंड बना है, वो सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था का गला घोंट सकता है।

क्या है तेल का पूरा खेल.. समझिए

यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने भारत को डिस्काउंट पर तेल बेचना शुरू किया और पिछले 15 महीनों में रूस, भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया है। ताजा स्थिति ये है, कि मई महीने में भारत ने सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका से जितना तेल खरीदा है, उससे ज्यादा तेल भारत ने सिर्फ रूस से ही खरीद लिया है।

यानि, भारत ने खाड़ी देशों पर तेल की निर्भरता काफी कम कर ली है। मतलब, जो खाड़ी देश कुछ साल पहले तक तेल के नाम पर भारत को आसानी से 'ब्लैकमेल' कर लेते थे, अब उन्हें उसका जवाब मिलना शुरू हो गया है।

एनर्जी कार्गो ट्रैकर वोर्टेक्सा के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने मई में रूस से एक दिन में 1.96 मिलियन बैरल तेल खरीदा है, जो अप्रैल महीने में खरीदे गये तेल से 15 प्रतिशत ज्यादा है और ये एक नया रिकॉर्ड है।

रूस से भारत का तेल आयात, अब इराक और सऊदी अरब (जो पिछले दशक में भारत के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता थे), साथ ही संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका से संयुक्त खरीद से ज्यादा है। इराक ने मई में 0.83 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) तेल की आपूर्ति की है, जबकि यूएई ने 203,000 (0.203 मिलियन) बीपीडी तेल भारत भेजा।

ओपेक, जिसमें यूएई भी है, वो लंबे समय से सऊदी अरब की मोनोपोली से परेशान रहा है। वहीं, सऊदी अरब, जिसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तेल पर निर्भर है, उसने मई महीने रिकॉर्ड स्तर पर सबसे कम तेल बेचा है और जुलाई महीने में सऊदी अरब, कई दशकों के बाद सबसे कम तेल का प्रोडक्शन करने वाला है।

रूस से 42 प्रतिशत तेल खरीदता भारत

रूस, हमेशा से भारत का एक समय की कसौटी पर परखा हुआ साथी रहा है, जिसने हर मुसीबत में भारत का साथ दिया है, लिहाजा रूस की दोस्ती पर किसी को कभी भी शक नहीं रहा है। लिहाजा, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, जब रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे, तो मदद की बारी भारत की थी और भारत ने दोस्त के लिए दुनिया से टक्कर लेने में परहेज नहीं किया।

आज की तारीख में भारत अपनी जरूरत का 42 प्रतिशत तेल रूस से खरीद रहा है, जबकि पिछले साल फरवरी में, जब यूक्रेन युद्ध शुरू नहीं हुआ था, तो भारत अपनी जरूरत का 1 प्रतिशत से भी कम तेल रूस से खरीदता था, जिसकी सबसे बड़ी वजह रूस से भारत तक तेल लाने में आने वाला खर्च था।

लेकिन, जब रूस ने डिस्काउंट पर तेल बेचना शुरू किया, तो भारत ने दिल खोलकर रूस से तेल खरीदा और आगे भी खरीदता रहेगा।

ज्यादा कीमत पर तेल बेचता है सऊदी अरब

अप्रैल में भारतीय तटों पर उतरने वाली माल ढुलाई की लागत सहित रूसी कच्चे तेल की औसत लागत 68.21 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी, जो यूक्रेन युद्ध के बाद से कच्चे तेल की कीमत का सबसे निचला स्तर है।

अप्रैल में भारत भेजे गए सऊदी अरब के कच्चे तेल की औसत कीमत 86.96 डॉलर प्रति बैरल थी, जबकि इराकी तेल की कीमत 77.77 डॉलर प्रति बैरल थी। यानि, भारत के लिए रूस से तेल खरीदना फायदे का सौदा है, फिर भला सऊदी अरब और इराक से तेल खरीदकर भारत घाटे का सौदा क्यों करें।

इसके अलावा, सऊदी अरब ने हमेशा से तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC को कंट्रोल किया है और तेल के दामों को अपनी मर्जी से कंट्रोल किया है। सऊदी अरब की मनमानी की वजह से भारत को कई बार तेल को लेकर गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

कोविड के पहले लॉकडाउन के बाद जब दुनियाभर के बाजार खुलने शुरू हुए, तो तेल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ और इसका गंभीर असर भारत पर पड़ा। सऊदी अरब ने तेल की कीमत को ज्यादा रखने के लिए तेल के प्रोडक्शन में कटौती कर दी। भारत ने सऊदी अरब से कई बार तेल का प्रोडक्शन बढ़ाने की अपील की, ताकि भारत में बेतहाशा भागते तेल की कीमत को कंट्रोल किया जा सके, लेकिन सऊदी अरब ने भारत की अपील को सिरे से खारिज कर दिया।

लिहाजा, 2020-21 में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत में भारी इजाफा हुआ था और भारत सऊदी अरब के आगे मजबूर था। लेकिन, अब सऊदी अरब को तेल का प्रोडक्शन इसलिए कम करना पड़ा है, क्योंकि उसके पास उतने तेल के खरीददार नहीं हैं।

भारत के साथ साथ चीन भी रूस से तेल खरीद रहा है और रूस, दक्षिण एशिया में अपने ग्राहकों की संख्या बढ़ा रहा है। रूस ने अब पाकिस्तान और बांग्लादेश को भी तेल की सप्लाई शुरू कर दी है, जिसका गंभीर असर सऊदी अरब भुगत रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए संकट खड़ा हो गया है।

सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था तेल व्यापार पर ही टिकी हुई है और अगर यूक्रेन युद्ध लंबा खिंचा और रूस ने डिस्काउंट पर तेल की सप्लाई जारी रखी, तो कुछ महीने बाद सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था धड़ाम से गिर सकती है या फिर उसे रूस की तरह डिस्काउंट पर तेल बेचना होगा।

खाड़ी देशों से काफी कम तेल खरीदता भारत

शिपिंग एनालिटिक्स कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब से शिपमेंट फरवरी 2021 के बाद सबसे कम 560,000 टन तक फिसल गया है।

भारत के तेल आयात में तेल उत्पादक कार्टेल ओपेक की हिस्सेदारी मई में अब तक के सबसे निचले स्तर 39% पर आ गई है और आने वाले वक्त में इसमें और भारी कमी आने की संभावना है, क्योंकि भारत, रूस से तेल खरीदता रहेगा और रूस भारत को डिस्काउंट पर तेल बेचता रहेगा।

पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक), जिसमें मुख्य रूप से मध्य पूर्व और अफ्रीका तेल उत्पादक देश हैं, वो एक वक्त भारत की जरूरत का 90 प्रतिशत तेल बेचते थे, जो अब गिरकर मई महीने में 39 प्रतिशत पर आ गया है, लिहाजा समझा जा सकता है, कि ओपेक को कितना बड़ा झटका लगा है।

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि चीन भी रूस से उसी तरह से तेल खरीद रहा है, जैसे भारत खरीज रहा है, लिहाजा सऊदी अरब की ना सिर्फ मोनोपॉली टूटी है, बल्कि अब सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर भी डरने लगा है, क्योंकि अभी तक सऊदी अरब के कारोबार, संयुक्त अरब अमीरात की तरह फैले नहीं हैं।

सऊदी अरब क्या कर रहा है?

सऊदी अरब अभी भी तेल मार्केट पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए अड़ा हुआ है और एक आश्चर्यजनक कदम उठाते हुए, सऊदी अरब ने 4 जून की ओपेक बैठक में फैसला लिया, कि जुलाई महीने से हर दिन तेल का प्रोडक्शन 1 मिलियन बैरल प्रति दिन कम किया जाएगा।

इस कदम के बाद सऊदी अरब कई दशकों के बाद सबसे कम तेल का प्रोडक्शन करेगा, यानि सऊदी अरब कई दशकों के बाद सबसे कम तेल जमीन से निकालेगा, ताकि डिमांड बढ़े और तेल की कीमत में इजाफा हो।

लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि सऊदी अरब का ये पैंतरा उसके ही ऊपर भारी पड़ सकता है, क्योंकि दुनिया के दो सबसे बड़े तेल खरीददार देश चीन और भारत को, रूस से डिस्काउंट पर तेल खरीदने की आदत लग चुकी है।

वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, सऊदी अरब को अपने बजट को संतुलित करने के लिए तेल की कीमत 81 डॉलर प्रति बैरल की आवश्यकता है। लेकिन, अभी वैश्विक बाजार में तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही घूम रही हैं, लिहाजा सऊदी अरब परेशान हो चुका है और तेल का प्रोडक्शन लगातार कम करता जा रहा है, ताकि देश की अर्थव्यवस्था को बचा सके।

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