Taiwan को लेकर पहली बार भारत का 'दुर्लभ' बयान, क्या मोदी सरकार बदल रही है चीन नीति?
इस महीने की शुरुआत में G7 के विदेश मंत्रियों, जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका है, उसने ताइवान जलडमरूमध्य में चीन की सैन्य गतिविधि के बारे में चिंता व्यक्त की थी।
नई दिल्ली/कोलंबो, अगस्त 28: ताइवान को लेकर काफी संभलकर बयान देने वाले भारत ने पहली बार ताइवान जलडमरूमध्य को लेकर दुर्लभ बयान दिया है। भारत ने पहली बार इसे "ताइवान जलडमरूमध्य का सैन्यीकरण" कहा है, जो नई दिल्ली द्वारा ताइवान के प्रति चीन की कार्रवाइयों पर टिप्पणी करने का एक दुर्लभ उदाहरण है।

भारत सरकार का दुर्लभ बयान
अमेरिका की यूएस हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद भी भारत की तरफ से चीनी आक्रामकता को लेकर संतुलित बयान दिए गये थे और भारत ने शांति और संयम बरतने का ही आह्वान किया था, लेकिन श्रीलंका के कोलंबो में चीनी जासूसी जहाज के ठहरने के बाद भारत की तरफ से पहली बार इस तरह का बयान दिया गया है। श्रीलंका में भारतीय उच्चायोग ने शनिवार देर रात जो बयान जारी किया है, उसमें पहली बार भारत का बयान काफी स्पष्ट, सटीक है। इससे पहले भारत की तरफ से 12 अगस्त को भी ताइवान संकट पर बयान जारी किया गया था, लेकिन वो बयान काफी ज्यादा डिप्लोमेटिक था और माना गया, कि भारत अभी भी संतुलित रूख ही अपना रहा है। लेकिन, इस बार भारत ने ताइवान स्ट्रेट में तनाव को 'चीन का सैन्यीकरण' कहा है, जो भारत के बदलते माइंडसेट को बता रहा है। वहीं, इस बात की तरफ भी इशारे कर रहा है, कि हिंद महासागर में चीनी जासूसी जहाज के दाखिल होने को भारत काफी गंभीरता से ले रहा है।

पहली बार 'सैन्यीकरण' शब्द का इस्तेमाल
इस महीने की शुरुआत में भारतीय विदेश मंत्रालय ने जो बयान जारी किया था, उसमें ताइवान जलडमरूमध्य के "सैन्यीकरण" का उल्लेख नहीं किया था, केवल यह कहा गया था, कि भारत "हाल के घटनाक्रमों से चिंतित है" और "संयम का अभ्यास, स्थिति बदलने के लिए एकतरफा कार्रवाई से बचने का आग्रह करता है" यथास्थिति, तनाव को कम करना और क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के प्रयास होने चाहिए।" जब 12 अगस्त की विदेश मंत्रालय की नियमित ब्रीफिंग में पूछा गया, कि क्या भारत, जैसा कि बीजिंग ने अनुरोध किया था, "एक चीन नीति" के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराएगा, उस सवाल पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि, "भारत की प्रासंगिक नीतियां प्रसिद्ध और सुसंगत हैं" और उसकी "पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं है"। भारत का ये बयान काफी सधा हुआ था और ऐसा लग रहा था, जैसे भारत किसी भी तरह के विवाद में नहीं पड़ना चाहता है।

जासूसी जहाज से भारत गुस्सा!
ताइवान संकट के बीच भारत के बार बार मना करने के बाद भी श्रीलंका ने चीन के सैटेलाइट सर्विंलांस जहाज युआन वांग 5, जिसे जासूसी जहाज कहा गया है, वो इसी महीने श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर पहुंचा, जिसके बाद भारत-श्रीलंका के बीच भी संबंधों में तनाव आने की आशंका है, वही चीन के साथ भारत का विवाद भी बढ़ गया है। श्रीलंका में चीन के राजदूत की अपने "उत्तरी पड़ोसी" से "आक्रामकता" का जिक्र पर पलटवार करते हुए भारतीय उच्चायोग ने उनकी टिप्पणियों को "बुनियादी राजनयिक शिष्टाचार का उल्लंघन" करार दिया और कहा कि, वे "व्यक्तिगत हो सकते हैं" या फिर देश के बड़े राष्ट्रीय दृष्टिकोण को दर्शाता है।" उच्चायोग ने कहा कि, ये बयान "श्रीलंका में चीनी राजदूत के लेख से संबंधित प्रश्नों के जवाब में था, जिसमें अन्य बातों के साथ, ताइवान जलडमरूमध्य के सैन्यीकरण और चीन के युआन वांग 5 जहाज की हंबनटोटा यात्रा के बीच संबंध को लेकर था।"

क्या जी-7 के साथ आ रहा भारत?
आपको बता दें कि, इस महीने की शुरुआत में G7 के विदेश मंत्रियों, जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका है, उसने ताइवान जलडमरूमध्य में चीन की सैन्य गतिविधि के बारे में चिंता व्यक्त की थी और चीन द्वारा "धमकी देने वाली कार्रवाई" का जिक्र करते हुए कहा था, कि इस सैन्य आक्रामकता का "कोई औचित्य नहीं था।" नैन्सी पेलोसी की यात्रा के बाद चीन ने करीब 10 दिनों तक भीषण युद्धाभ्यास किया था और लाइव फायरिंग ड्रिल किया था। स्थिति ऐसी बन गई थी, मानो लग रहा था, कि चीन किसी भी वक्त ताइवान पर आक्रमण कर देगा। वहीं, जिस शब्द "ताइवान जलडमरूमध्य का सैन्यीकरण" का भारत ने पहली बार इस्तेमाल किया है, उस शब्द का इस्तेमाल जी-7 हमेशा से करता रहा है, लिहाजा इस बयान से संकेत मिल रहे हैं, कि भारत चीन विवाद के बीच जी-7 के रास्ते पर कदम बढ़ा सकता है।

पेलोसी की यात्रा को जहाज से जोड़ा
आपको बता दें कि, हाल ही में श्रीलंका में चीनी दूत ने उस आरोप को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि "चीन के पास स्पीकर पेलोसी की ताइवान यात्रा के कारण हुए गंभीर प्रभावों के लिए बेझिझक प्रतिक्रिया देने का हर कारण है"। उन्होंने ताइवान की स्थिति और युआन वांग 5 की यात्रा के बीच एक कड़ी जोड़ने की कोशिश की थी, जिसका भारत ने विरोध किया था। चीन ने इन दोनों मामलों को जोड़ते हुए कहा था कि, "वे दो मामले अप्रासंगिक और हजारों मील दूर भले ही लग सकते हैं, लेकिन दोनों मामले, चीन और श्रीलंका के बीच एक ही महान महत्व साझा करते हैं, जो संयुक्त रूप से एक-दूसरे की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना है।" चीनी दूत ने अपने लेख में कहा कि, श्रीलंका उन देशों में शामिल है, जिन्होंने ताइवान तनाव के बीच "वन चाइना पॉलिसी" को दोहराकर चीन का समर्थन किया है।

भारत भी मानता है 'वन चायना पॉलिसी'
आपको बता दें कि, भारत ने 1949 में पीआरसी की मान्यता के बाद से "एक चीन नीति" का पालन किया है, और केवल ताइवान के साथ व्यापार और सांस्कृतिक संबंध ही बनाए रखा है। भारत ने नियमित रूप से 2008 तक इस नीति को दोहराया, लेकिन जब साल 2008 में चीन ने अरूणाचल प्रदेश के लोगों को चीन आने के लिए वीजा फ्री की घोषणा की, उसके बाद से भारत ने 'वन चायना पॉलिसी' का जिक्र करना बंद कर दिया। चीन किसी भी देश के साथ आधिकारिक बैठक के दौरान 'वन चायना पॉलिसी' पर बात करने पर जोर देता है, लेकिन भारत ने उसके बाद से 'वन चायना पॉलिसी' पर बात करनी बंद कर दी। उस समय के अधिकारियों ने कहा था कि, भारत को सार्वजनिक रूप से उस नीति को दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं है, जिसका वह वैसे भी पालन कर रहा है। खास कर, अरुणाचल प्रदेश पर दावा करने वाले चीनी बयानों के बाद और जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल में भारतीय नागरिकों को "स्टेपल वीजा" जारी करने के बाद भारत ने ये फैसला लिया था, जिसे 2014 के बाद से मोदी सरकार भी आगे बढ़ा रही है।












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