Indian Navy: पाकिस्तान के पास विशालकाय नेवल बेस बनकर तैयार, सबसे बड़े युद्धपोतों की होगी तैनाती, जानें फायदे
Indian Defence News: चीन और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारत लगातार अपनी समुद्री क्षमताओं को बढ़ा रहा है और ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, स्वेज नहर के पूर्व में बना बंदरगाह, जिसका ऑपरेशन पूरी तरह से इंडियन नेवी के पास है, उसे अब सैन्य अड्डा बना दिया जाएगा।
भारत के पश्चिमी समुद्री तट पर कारवार में आईएनएस कदंब उस जगह बनाया गया है, जहां भारत का एयरक्राफ्ट कैरियर INS विक्रमादित्य तैनात था। इस बेस में भारत की पहली शिप-लिफ्ट सुविधा है, जो डॉकिंग और अनडॉकिंग के लिए पनडुब्बियों और युद्धपोतों को शिप-लिफ्ट करेगी।
इस नौसैनिक अड्डे को प्रोजेक्ट सीबर्ड के तहत विकसित किया जा रहा है।

पाकिस्तान के करीब, यह बेस वर्जीनिया में अमेरिकी नौसेना के विशाल नॉरफॉक नौसैनिक अड्डे के समान ही विशालकाय और आधुनिक है, जो बताता है, कि दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारतीय नौसेना की तैयारी कितनी खतरनाक चल रही है।
इस बंदरगाह ने भारतीय नौसेना को काफी ज्यादा ऑपरेशनल लचीलापन दिया है, क्योंकि, भारत को 1971 की लड़ाई के दौरान मुंबई स्थित अपने पश्चिमी बेड़े के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। मुंबई में भारत का वाणिज्यिक बंदरगाह है, जहां भार संख्या में मछली पकड़ने वाली नावें होती हैं, लिहाजा वो जगह रणनीतिक तौर पर इंडियन नेवी के लिए सही नहीं है।
आईएनएस कदंब का संचालन इंडियन नेवी के पास
इंडियन नेवी के INS कदंब का नाम प्रोजेक्ट सीबर्ड है और इस बंदरगाह का सौ फीसदी कंट्रोल इंडियन नेवी के पास है और यहां भारतीय नौसेना का बेस भी है। इस बंदरगाह से भारतीय नौसेना को व्यापारी जहाजों की आवाजाही की चिंता किए बिना, अपने ऑपरेशनल बेड़े की स्थिति और संचालन की सुविधा मिलती है।
भारतीय नौसेना के दो और ऑपरेशनल बंदरगाह मुंबई और विशाखापत्तनम में हैं, जो वाणिज्यिक बंदरगाहों के भीतर स्थित हैं। लेकिन, दिक्कत ये है, कि युद्ध के समय व्यापारिक जहाजों के बीच युद्धपोतों की आवाजाही नौसेना के लिए मुश्किल स्थिति बना सकती है।
अब, भारतीय नौसेना, जिसने खुद को हिंद महासागर क्षेत्र में फर्स्ट रिस्पांउडर बना लिया है, उसे इस ऑपरेशनल बेस से काफी फायदा हो रहा है, क्योंकि बेस दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक के करीब है और अभी भी पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों की स्ट्राइक रेंज से बाहर है। यह काफी गहराई और भूमि की उपलब्धता वाला एक प्राकृतिक गहरे पानी का बंदरगाह है, जो बड़े विमान वाहकों की बर्थिंग की अनुमति देता है।
नौसेना के इस बेस में एक एयरक्राफ्ट कैरियर, विध्वंसक युद्धपोत, सीक्रेट युद्धपोत और पनडुब्बियों को रखा जा सकता है। इसके अलावा, इस बेस में पनुडुब्बियों और युद्धपोतों का रखरखाव और मरम्मद भी किया जा सकता है। आईएनएस कदंब, भारत का एकमात्र बेस है, जो 44,500 टन के कीव वर्ग के सोवियत निर्मित एडमिरल गोर्शकोव (वर्तमान नाम INS विक्रमादित्य) जैसे बड़े जहाजों को डॉक करने की क्षमता रखता है।
हालांकि, बर्थिंग सुविधाओं के मामले में भारत का सबसे बड़ा नौसैनिक बंदरगाह पूर्वी तट पर विशाखापत्तनम है, जो लगभग 50 जहाजों को बर्थिंग की अनुमति देता है। लेकिन, यहां पर स्वदेशी विमानवाहक पोत INS विक्रांत जैसे जहाजों को डॉक करने के लिए आवश्यक गहराई नहीं है, जिसका विस्थापन लगभग 40,000 टन है। इसके अलावा, विशाखापत्तनम बंदरगाह तक पहुंचने का चैनल सीधा नहीं है, जिससे लंबे जहाजों को ले जाना मुश्किल हो जाता है।
आईएनएस विक्रांत पहली बार 2023 में कारवार नौसैनिक अड्डे पर पहुंचा था।
कोच्चि में इंडियन नेवी का जो बेस है, वो काफी संकीर्ण क्षेत्र है, जिसकी वजह से हर बार जब कोई एयरक्राफ्ट कैरियर यहां पहुंचता है, तो वहां ड्रेजिंग ऑपरेशन करना पड़ता है और एयरक्राफ्ट कैरियर से दूसरे फाइटर जेट्स को हटाकर उसे हल्का करना पड़ता है।
इसके अलावा, मुंबई में जो बेस है, वहां का पानी उथला है। किसी भी एप्रोच चैनल पर उथले पानी का मतलब है, कि कोई एयरक्राफ्ट कैरियर वहां रुक नहीं सकता है। इसे लंगर डालना होगा और चालक दल को ट्रांसफर करते समय, ताजा पानी, ईंधन और बिजली की आपूर्ति के लिए काफी मेहनत मशक्कत करनी होगी।
9 अप्रैल को भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने ऑफशोर पेट्रोल वेसल्स (ओपीवी) के लिए 350 मीटर लंबे प्रमुख घाट और नौसेना बेस कारवार में एक आवासीय आवास का उद्घाटन किया है।
ये बुनियादी ढांचा डेवलपमेंट, प्रोजेक्ट सीबर्ड के चल रहे चरण IIA का हिस्सा हैं, जिसमें 32 जहाजों और पनडुब्बियों, 23-यार्ड शिल्प, एक डबल यूज वाले नौसेना एयर स्टेशन, एक पूर्ण नौसेना डॉकयार्ड, चार कवर ड्राई बर्थ और जहाजों को रखने के साथ साथ वहां रसद की सुविधा भी होगी।
सबसे खास बात ये है, कि भारतीय नौसेना का ये बेस ऑपरेशन के लिहाज से भी काफी सस्ता पड़ता है। यह फ्लोटिंग डॉक से सस्ता है, और भले ही यह सूखी डॉक से ज्यादा महंगा है, लेकिन एक ड्राय डॉक बनाने में जितनी लागत आती है, उसमें तीन और ड्राय बर्थ का निर्माण किया जा सकता है।
अब होगी Phase II-B की शुरूआत
एक जहाज को ड्राई-डॉक करने में करीब छह घंटे का वक्त लगता है, और ड्राई डॉक, बंदरगाह के तट के बहुत ज्यादा हिस्से को कवर कर लेता है। शिप-लिफ्ट का उपयोग चक्रवात के दौरान जहाजों को समुद्र में भेजने के बजाय जमीन पर चढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है।
अगर नौसेना को अपने 150 से ज्यादा सतही जहाजों, सहायक जहाजों की पतवार और संरचना को बनाए रखना है, तो आईएनएस कदंब नौसैनिक जहाजों को अंदर आने, बर्थ देने, जहाज उठाने, सुखाने, मरम्मत करने और घुमाने की इजाजत भी देगा।
अब इस बंदरगाह पर फेज II-बी शुरू होगा, और एक बार यह पूरा हो जाने पर, आईएनएस कदंब 50 फ्रंट-लाइन युद्धपोतों को एक साथ आधार देने में सक्षम हो जाएगा और स्वेज नहर के पूर्व में सबसे बड़ा नौसैनिक अड्डा बन जाएगा।
नौसेना अड्डे पर रणनीतिक एयर पावर
इसके अलावा, इसी नौसैनिक बेस के हिस्से के रूप में अंकोला के पास अलागेरी गांव में एक हवाई स्टेशन भी बन रहा है और 2025 तक इसके चालू होने की उम्मीद है। नौसैनिक हवाई स्टेशन 1,328 एकड़ में बनेगा।
नौसेना वायु स्टेशन में डोर्नियर-228-टाइप के विमान, हेलीकॉप्टर, मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) और दूसरे फाइटर जेट रखे जाएंगे। गोवा में स्थित आईएनएस हंस, प्रशिक्षण उड़ानों सहित बड़ी संख्या में नागरिक उड़ानों और नौसैनिक उड़ानों के कारण बहुत भीड़भाड़ वाला है। एक बार जब कारवार नौसैनिक हवाई स्टेशन काम करना शुरू कर देगा, तो आईएनएस हंस से कई विमानों को यहां भेजा जा सकता है।
नौसेना अपने विमानों की लैंडिंग के लिए प्रस्तावित नौसैनिक हवाई स्टेशन पर 2,000 मीटर लंबी हवाई पट्टी बनाने की योजना बना रही है।
जाहिर तौर पर, इंडियन नेवी अपनी क्षमता का विस्तार कर रहा है, क्योंकि युद्ध की स्थिति चीन के पास पाकिस्तानी नौसैनिक बेस होगा, जो बड़ी चुनौती पेश करेगा।












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