चीन के हाथ से निकलता नेपाल, लेकिन प्रधानमंत्री प्रचंड का दौरा बना 'राजनीतिक फुटबॉल', हाथ से फिसल ना जाए मौका
पिछले कुछ सालों में नेपाल-भारत संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। मनमोहन सिंह अपने दो कार्यकाल के दौरान एक बार भी नेपाल नहीं गये, जबकि पीएम मोदी अब तक आठ बार नेपाली प्रधानमंत्रियों से मुलाकात कर चुके हैं।

India-Nepal ties: नेपाल में लोकतांत्रिक सरकार के गठन के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ, कि नेपाल के प्रधानमंत्री का भारत दौरा 'राजनीतिक फुटबॉल' की तरह हो गया हो। नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड का भारत दौरा बार बार टल रहा है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कार्यक्रम काफी ज्यादा व्यस्त है। फिलहाल प्रधानमंत्री कर्नाटक चुनाव के प्रचार में व्यस्त हैं, उसके बाद पीएम मोदी को जी7 की बैठक में भाग लेने के लिए और क्वाड समिट में भाग लेने के लिए विदेशी दौरा करना है, लिहाजा पीएम मोदी का कैलेंडर पूरी तरह से पैक है।
इन सबके बीच, नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड सत्ता संभालने के बाद आठ बार अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर चुके हैं। इस बीच गठबंधन की अदला-बदली भी हो चुकी है, लेकिन प्रधानमंत्री देश के लिए एक विदेश मंत्री की नियुक्त करने में नाकाम रहे हैं।
नेपाल सरकार में विदेश मंत्रालय नेपाली कांग्रेस को मिलना था, लेकिन नेपाली कांग्रेस के अंदर ही जारी गुटबाजी की वजह से विदेश मंत्री कौन होगा, ये तय नहीं हो पाया। नेपाली कांग्रेस का एक धड़े का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा, तो दूसरे धड़े का नेतृत्व कांग्रेसी दिग्गज शेखर कोइराला और गगन थापा कर रहे हैं। वहीं, जब राम चंद्र पौडेल नेपाल के राष्ट्रपति बन गये, उसके बाद जाकर एनपी सऊद को 16 अप्रैल को नेपाल का विदेश मंत्री बनाया गया।

नेपाली पीएम का बार बार टलता भारत दौरा
नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड का पहला विदेशी दौरा भारत का ही होना था और वो तय कार्यक्रम के मुताबिक, मार्च महीने में भारत आने वाले थे। पीएम प्रचंड ने चीन की यात्रा से पहले भारत का दौरा करना चुना और उन्होंने चीन में होने वाले बीआरई कार्यक्रम के लिए अपना दौरा रद्द कर दिया।
लेकिन, किन्ही कारणों ने मार्च में पीएम प्रचंड का भारत दौरा नहीं हो पाया और फिर यात्रा का नया कार्यक्रम मध्य अप्रैल में बनाया गया। लेकिन, मध्य अप्रैल की तारीख भी आगे बढ़कर अप्रैल के अंतिम हफ्तों में चला गया। लेकिन, अप्रैल अंत में भी पीएम प्रचंड भारत नहीं आ पाए।
इसके बाद मई की शुरूआत में पीएम मोदी कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हो गये। वहीं, मई महीने में पीएम मोदी को जी20 बैठक और ऑस्ट्रेलिया में क्वाड शिखर सम्मेलन में भाग लेना है, लिहाजा अब नेपाल के प्रधानमंत्री का भारत दौरा जून महीने तक के लिए टल गया है, और पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, काठमांडू ने इसे आंतरिक कारणों से रिपोर्ट किया है।
हालांकि इतना तय है कि पीएम के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान प्रचंड की दूसरी राजकीय यात्रा भारत की होगी। दिवंगत प्रधान मंत्री सुशील कोइराला को राजकीय दौरे पर आमंत्रित नहीं करने के लिए नेपाली कांग्रेस का एक धड़ा मोदी सरकार के खिलाफ हैं। नेपाली प्रधानमंत्रियों के लिए भारतीय प्रधानमंत्री की ओर से राजकीय यात्रा का निमंत्रण उनकी सदाशयता स्थापित करने के लिए सर्वोपरि है।

भारत बनाम चीन नेपाल
कुछ सालों तक चीन की तरफ झुकने के बाद नेपाल अब फिर से भारत के करीब आ रहा है और नेपाली नेताओं में चीन को लेकर फिर से आशंकाएं बढ़ने लगी हैं। चीन ने नेपाल के भी कुछ गावों पर कब्जा जमा लिया है, लिहाजा नेपाल का भरोसा चीन से टूट रहा है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण, प्रधानमंत्री प्रचंड का चीन में होने वाले बीआरई सम्मेलन में शामिल होने से इनकार करना है। वहीं, अप्रैल में जब पीएम प्रचंड की भारत यात्रा की योजना बनी थी, उस वक्त नेपाली मीडिया में कहा गया, कि इस दौरे के दौरान, भारत और नेपाल के बीच 36 किमी रक्सौल-काठमांडू रेलवे लाइन के निर्माण को लेकर समझौता हो सकता है।
वहीं, नेपाल की अर्थव्यवस्था को तेजी से पटरी पर लाने के लिए रेल संपर्क अत्यधिक रणनीतिक होगा। हालांकि, इससे पहले की भारत नेपाल के अंदर रेलवे कनेक्टिविटी का विस्तार करने पर विचार करता, चीन ने नेपाल को किरूंग से काठमांडू तक रेलवे का विस्तार करने का वादा कर लिया। जिसके लिए बीआरआई/चीन-नेपाल आर्थिक कॉरिडोर के तहत काम करने की बात कही गई। चीन इस रेल परियोजना के जरिए भारतीय-गंगा के मैदानी इलाकों में आकर्षक भारतीय बाजार तक चीनी सामान पहुंचाने का योजना बना रहा है।
इस रेल परियोजना के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साल 2019 में नेपाल के दौरे के दौरान वादा किया था, लेकिन इस रेल परियोजना का प्रभाव पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। वहीं, इस परियोजना की लागत, अनुमान से करीब 5 अरब डॉलर ज्यादा होने की संभावना है, लिहाजा चीन ने चार साल बीतने के बाद भी प्रोजेक्ट के लिए एक रुपया भी जारी नहीं किया।
2018 में चीन समर्थक वामपंथी गठबंधन के टूटने के बाद, BRI के लिए बीजिंग का जुनून काफी कम हो गया है।

भारत के लिए है बहुत बड़ा मौका
भारत के रिटायर्ड सैन्य अधिकारी जनरल अशोक कुमार मेहता लिखते हैं, कि एक बार जब भारत वास्तव में रेलवे का निर्माण करने का फैसला कर लेता है, तो चीन उत्तर-दक्षिण रेल लाइन को लेकर बेहद सतर्क हो जाएगा। भारत का ये फैसला चीन के डर को काफी ज्यादा बढ़ा देगा। जैसा की 1960 में हो चुका है।
जनरल मेहता के मुताबिक, 1960 में नई दिल्ली ने रक्सौल-काठमांडू त्रिभुवन राजपथ के निर्माण किया था, जिससे डरकर चीन ने कोडारी-काठमांडू महेंद्र राजपथ का निर्माण किया, जिसको लेकर भारत ने गहरी नाराजगी जताई थी। लिहाजा, अब भारत 1960 की बात को दोहराने से रोकने के लिए नेपाल से कुछ आश्वासन मांग सकता है।

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वहीं, नेपाल के एक अधिकारी ने कहा, कि "हम उम्मीद करते हैं कि भारत अनुदान के साथ सड़क का निर्माण करेगा"। संयुक्त तकनीकी बैठक में वित्तीय व्यवस्था पर चर्चा होने की उम्मीद है। वहीं, एक नेपाली पत्रकार के मुताबिक, अब चीन द्वारा उत्तर-दक्षिण रेल लाइन बनाने की बहुत कम संभावना है। हालांकि भारत इसे हल्के में नहीं ले सकता है।
लिहाजा, एक्सपर्ट्स का मानना है, भारत को चीन को लेकर नेपाल के मन मे आई असंतुष्टि का फौरन फायदा उठाना चाहिए और बॉर्डर विवाद, अग्निवीर स्कीम विवाद, नेपाल अर्थव्यवस्था को कैसे फायदा हो, जैसे मुद्दों पर नेपाल के साथ करीब से जुड़ना चाहिए और चीन को हमेशा के लिए नेपाल से बाहर कर देना चाहिए।












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