मोदी सरकार की विदेश नीति कितनी सुपरहिट है और अगले 10 साल में भारत कैसे बनेगा 'शक्ति का केन्द्र'?
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का शुरूआती समय उन संवेदनशील मुद्दों को 'निपटाना' था, जो भारत के सामने कई दशकों से मुंह बाए खड़े थे, इसका भी असर भारत की विदेश नीति पर पड़ा है।
नई दिल्ली, नवंबर 23: पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार दानिश तरार कहते हैं, ''भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल खरीदा, अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाने की हिम्मत नहीं कर रहा है, भारत का इजरायल और ईरान, दोनों ही देशों से अच्छे संबंध हैं, सऊदी अरब आज भारत के साथ खड़ा है, यूएई और भारत के बीच 70 अरब डॉलर का व्यापार है, और ये भारत के परफेक्ट विदेश नीति का उदाहरण है''... तो क्या मोदी सरकार की विदेश नीति को सुपरहिट माना जाएगा? क्या अगले 10 सालों में भारत दुनियाभर के शक्तिशाली देशों के बीच 'शक्ति का केन्द्र' बन जाएगा? इस मुद्दे पर बहस शुरू हो चुकी है, ऐसे में आईये जानते हैं, कि अगरे 10 सालों में भारत की विदेश नीति किस दिशा में आगे बढ़ने जा रही है और मोदी सरकार की विदेश नीति 'सुपरहिट' कैसे है?

विदेश नीति में व्यापक बदलाव
भारत के दो पूर्व विदेश सचिव, आठ अलग अलग रणनीतिक विश्लेषकों ने मिलकर भारत की विदेश नीति पर एक किताब लिखी है। किताब का नाम है 'इंडियाज पाथ टू पॉवर: स्ट्रैटजी इन ए वर्ल्ड एड्रिफ्ट'', इस किताब में सभी दिग्गज एक बाद पर सहमत हैं, कि भारत की विदेश नीति में व्यापक बदलाव हुए हैं, हालांकि, इस किताब में भारत सरकार को कई सुझाव भी दिए गये हैं। लेकिन, एक बात जो और इस किताब से जाहिर हो रही है, कि अब भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति में राष्ट्रीय सहमति लेना बंद कर दिया है और इसके पीछे विदेश नीति में कुछ 'दोष' का होना नहीं, बल्कि घरेलू घटनाक्रमों की गूंज जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उछाला गया है, वो 'जिम्मेदार' है। यानि, भारत सरकार की विदेश नीति अब राष्ट्र की आम सहमति पर 'आधारित' नहीं हो रहे हैं।

अधूरे कामों को मोदी सरकार ने 'निपटाया'
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का शुरूआती समय उन संवेदनशील मुद्दों को 'निपटाना' था, जो भारत के सामने कई दशकों से मुंह बाए खड़े थे। जिनमें कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करना था, तो भारत में नागरिकता कानून यानि सीएए लागू करना था। लिहाजा पश्चिमी देशों ने भारत में मानवाधिकर उल्लंघन को लेकर सवाल उठाए। भारत की विपक्षी पार्टियां भी सरकार की इन नीतियों पर काफी ज्यादा आक्रामक थीं, इसके साथ ही रही सही कसर कोरोना महामारी के दौरान उत्पन्न हुई देश की आर्थिक परिस्थितियां थीं तो लद्दाख में चीन की आक्रामकता ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाईं, लिहाजा मोदी सरकार के लिए विदेश नीति पर 'आम राय' कायम करना काफी मुश्किल हो गया और सरकार विदेश नीति पर अपने हिसाब से आगे बढ़ रही है।

किस चीज पर टिकी है विदेश नीति?
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान लिए गये इन फैसलों ने अंतर्राष्टीय प्रभाव छोड़े हैं। बात भारत की विदेश नीति की करें, तो भारत की विदेश नीति चार स्तंभों पर टिकी होती हैं। पहला स्तंभ- घरेलू आर्थिक विकास, दूसरा स्तंभ- सामाजिक समावेश, तीसरा स्तंभ- राजनीतिक लोकतंत्र और चौथा स्तंभ- व्यापक रूप से उदार संवैधानिक व्यवस्था पर टिकी हुई है। यदि ये अभिन्न स्तंभ मजबूत बने रहें, तो भारत को कोई रोक नहीं सकता...। पिछले एक दशक में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि हम भारत के विकास मॉडल की सफलता को हल्के में नहीं ले सकते हैं। लेकिन भारत के विकास और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव के मूल स्रोत तेजी से बढ़ते दिख रहे हैं।

मोदी सरकार की अब तक की विदेश नीति
मोदी सरकार का पहला कार्यकाल साहसिक और मुखर विदेश नीति के लिए जाना जाएगा। जिसे देश के साथ साथ विदेशों में भी स्वीकृति मिली है। पाकिस्तान के साथ उनकी अपरंपरागत शांति पहल विफल होने के बाद, उन्होंने सख्त रुख अपनाया और घर में लोकप्रियता हासिल की। हालांकि, अन्य पड़ोसियों के साथ घनिष्ठ संबंध रखने की उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई, लेकिन कठिन परिस्थितियों में भी उनके प्रति उनके मददगार रवैये ने किसी भी संकट को टाल दिया। वह भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया तालमेल लेकर आए और चीन से लगातार एक नया समीकरण खोजने में लगे रहे। इजराइल और अरब देशों के साथ भारत के संबंध प्रोडक्टिव बन गए। दूसरे कार्यकाल में मोदी की लोकप्रियता में इजाफे पर उनकी विदेश नीति का भी असर था। यहां तक कि नोटबंदी और जीएसटी विवाद भी उनके रास्ते में नहीं आए।

अगले दशक के लिए सुझाव
विश्लेषकों ने मोदी सरकार को सुझाव देते हुए कहा है कि, भारक को अब वैश्वीकरण से मुंह किसी भी हाल में नहीं मोड़ना चाहिए और अगर भारत ऐसा करता है, तो उसका उल्टा असर होगा। वहीं, मोदी सरकार को सार्क को फिर से पुनर्जीवित करने का भी सुझाव दिया गया है। इसके साथ ही भारत को फिर से आरसीईपी में शामिल होने और एपेक में सदस्यता के लिए कोशिश जारी रखने का सुझाव दिया गया है। इसके साथ ही रिपोर्ट में मोदी सरकार को विदेश नीति में स्वायत्तता के महत्व की तरफ भी सुझाव दिया गया है और जहां तक भारत-अमेरिका-चीन त्रिकोण का संबंध है, रिपोर्ट असामान्य सुझाव देती है कि भारत के अमेरिका और चीन दोनों के साथ व्यक्तिगत रूप से बेहतर संबंध होने चाहिए, जबकि इस वक्त भारत के अमेरिका से तो अच्छे संबंध हैं, लेकिन निकट भविष्य में चीन से बेहतर संबंध होने की उम्मीद कम ही है।

चीन के साथ कैसी हो नीति?
भारत की विदेश नीति पर सबसे ज्यादा प्रभाव चीन और अमेरिका का ही पड़ने वाला है। चूंकि चीन भारत के बाहरी स्थिति को प्रभावित करने के साथ साथ भारत की घरेलू राजनीति पर भी असर डालेगा और भारत की राजनीतिक, आर्थिक और ढांचागत रूप को भी प्रभावित करेगा, लिहाजा भारत को चीन के साथ किस तरह का व्यवहार बनाना चाहिए, या चीन को लेकर भारत की रणनीति किस तरह की होनी चाहिए, विश्लेषकों के बीच इसको लेकर आम राय नहीं है। वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण बहुत अलग नहीं है। वहीं, पाकिस्तान को लेकर भारत की विदेश नीति की थोड़ी आलोचना की गई है, और रिपोर्ट में कहा गया है कि, "जब तक पाकिस्तान के प्रति हमारी नीति के उद्देश्य मामूली हैं, बातचीत की बहाली और व्यापार, परिवहन और दूसरे तरह के संबंधों की बहाली गलत है।"

पड़ोसी देशों के साथ संबंध
मोदी सरकार की विदेश नीति में पड़ोसी देशों, खासकर श्रीलंका, मालदीव के साथ अपने संबधों को विस्तार देना है। खासकर हिंद महासागर की सुरक्षा के लिए मोदी सरकार काफी आक्रामक है। पिछली सरकारों ने हिंद महासागर को लेकर लापरवाही भरा रवैया अपनाया और उसी का परिणाम हंबनटोटा बंदरगाह पर चीन का कब्जा है, लिहाजा इस बार भारत ने कोलंबो पोर्ट सिटी का ठेका चीन को पीछा छोड़ते हुए लिया है। इसके अलावा मालदीव के साथ संबंध को भारत ने ऐतिहासिक स्तर पर मजबूत किए हैं। मालदीव की पिछली सरकारों के साथ भारत के संबंध काफी तनावपूर्ण हो गये थे। इसके अलावा मोदी सरकार ने बिम्सटेक पर खासा ध्यान दिया है, जिसमें बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, नेपाल और भूटान शामिल हैं और भारत सरकार की मौजूदा विदेश नीति में इस संगठन को काफी प्रमुखता दिया जा रहा है। लिहाजा कहा जा सकता है, कि मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति के मूल में कई बदलाव जरूर किए है, लेकिन आने वाला दशक भारत का ही होने वाला है।












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