Explainer: भारत जानता है, शेख हसीना परफेक्ट प्रधानमंत्री नहीं हैं.. फिर भी मोदी सरकार क्यों कर रही समर्थन?
Bangladesh Election News: बांग्लादेश में अगले साल 7 जनवरी को संसदीय चुनाव होने वाले हैं और उससे पहले भारत का ये पड़ोसी देश, एक गंभीर राजनीतिक मंथन के बीच में है, जो हाल के वर्षों में नहीं देखा गया है। बांग्लादेश की सत्तारूढ़ अवामी लीग 7 जनवरी 2024 को होने वाले आम चुनाव को जीतने और प्रधान मंत्री शेख हसीना को अभूतपूर्व पांचवें कार्यकाल के लिए सत्ता में वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध दिख रही है।
इस बीच, सत्तारूढ़ अवामी लीग की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), राजनीतिक जंगल में 17 लंबे साल बिताने के बाद, उम्मीद कर रही है, कि हसीना के भूल-चूक के पाप उसे सत्ता हासिल करने में मदद करेंगे, भले ही सत्ताधारी पार्टी चुनाव आयोग के जरिए सत्ता के कई साधनों को नियंत्रित करना चाहती हो।

बांग्लादेश में 7 जनवरी को संसदीय चुनाव
इस बार और भी दिलचस्प बात यह है, कि बाहरी शक्तियों ने बांग्लादेश के चुनावी नतीजों में गहरी दिलचस्पी दिखाई है। संयुक्त राज्य अमेरिका, जिसने पिछले कई हफ्तों से इजरायली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को आश्रय दिया है, जिनकी सेना गाजा पर लगातार बमबारी कर रही है, वो शेख हसीना को लोकतांत्रिक उपदेश दे रहा है और उनसे अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ बातचीत करने का आग्रह कर रहा है।
गौरतलब है कि भारत, जो अमेरिकियों से मित्रता की हदें पार कर चुका है, वो भी बांग्लादेश पर एक स्वतंत्र कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा है, लेकिन भारत की चाहत यही है, कि शेख हसीना फिर से जीतें और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। लेकिन, इस सबके बीच, चीन यह देखने के लिए इंतजार कर रहा है, कि हवा किस दिशा में बहती है।
इसी महीने 10 नवंबर को पांचवें भारत-अमेरिका 2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद के दौरान, भारतीय विदेश मामलों के प्रवक्ता अरिंदम बागची से बांग्लादेश में हाल ही में हसीना द्वारा आदेशित कार्रवाई के बारे में एक सवाल पूछा गया था, जिसमें लगभग 10,000 विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर गिरफ्तार किया गया था। उनका जवाब खुलासा करने वाला था, "क्रैकडाउन, जेल में बंद विपक्षी नेता, आदि आपकी (पत्रकारों की) व्याख्या हैं। कृपया उनका श्रेय मुझे न दें। हम किसी तीसरे देश की नीति पर टिप्पणी नहीं करना चाहते।"
अरिंदम बागची ने खुले शब्दों में कहा, कि "ये बांग्लादेश का घरेलू मामला है और बांग्लादेश के लोगों को अपना भविष्य खुद तय करना है।"

जबकि, कुछ ही दिन पहले, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने बांग्लादेश चुनावों पर अमेरिकी रुख के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में अधिकारों और उनके उल्लंघन को प्राथमिकता देते हुए, इसी प्रश्न का बिल्कुल अलग तरीके से उत्तर दिया था। उन्होंने कहा था, कि "हम बांग्लादेश में इस जनवरी के चुनाव से पहले के चुनावी माहौल पर बारीकी से नज़र रखना जारी रखते हैं, और हम हिंसा की किसी भी घटना को अविश्वसनीय रूप से गंभीरता से लेते हैं। हम बांग्लादेशी लोगों के लाभ के लिए सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार, विपक्षी दलों, नागरिक समाज और अन्य हितधारकों के साथ जुड़ रहे हैं और जुड़ते रहेंगे।"
तो, बांग्लादेश पर भारत और अमेरिका की स्थिति पर इतना अंतर क्यों है? जबकि बांग्लादेश, भारत और अमेरिका, तीनों ही देश लोकतांत्रिक हैं। अमेरिका इतना सख्त रुख क्यों अपना रहा है, जबकि अमेरिका का इतिहास रहा है, कि उसने हमेशा से अपने मित्रवत सरकारों की रक्षा की है, भले ही सरकार का नेतृत्व कोई तानाशाह ही क्यों ना कर रहा हो?
इस सवाल का जवाब काफी सरल है।
भारत उस अशांत पड़ोस को समझता है, जिसमें वह रहता है। भारत जानता है, कि शेख हसीना एक आदर्श प्रधान मंत्री नहीं हैं और वह कठोर हाथों से शासन करती हैं, अक्सर आवश्यकता से ज्यादा कठोर रवैया अपनाती हैं। शेख हसीना ने स्वतंत्र मीडिया को कुचलने का काम किया है और देश के चुनाव आयोग को सत्ताधारी पार्टी की लाइन अपनाने के लिए राजी कर लिया है।
इसके साथ ही, शेख हसीना की पार्टी, विपक्षी बीएनपी को एक-दूसरे से लड़ने वाले गुटों में तोड़ने की कोशिश कर रही है, ताकि चुनाव को ऐसा दिखाया जा सके, कि चुनाव स्वतंत्र है, और यदि बीएनपी हारती है, या अगर पिछली दो बार की तरह चुनाव का बहिष्कार करती है, तो शेख हसीना के लिए वो सिरदर्द का मुद्दा ना बने।
लेकिन, भारत यह भी मानता है, कि शेख हसीना का कोई विकल्प नहीं है। यदि शेख हसीना हार जाती हैं, और बीएनपी सत्ता में आती है, तो इस्लामी कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी भी उसके पीछे-पीछे सत्ता में आ जाएगी। और अगर जमात कहीं भी सत्ता के इर्द-गिर्द आती है, तो उसके समर्थक, पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान, ड्राइविंग सीट पर होंगे।
यही वजह है, कि सत्ता पर कब्ज़ा बनाए रखने के लिए शेख हसीना अगर असंसदीय आचरण करती भी हैं, या असंवैधानिक आदेश भी देती हैं, तो भी भारत अपनी नजरें दूसरी तरफ रखेगा।

मोदी सरकार-शेख हसीना में कैसे हैं संबंध?
भारतीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार बांग्लादेशी शरणार्थियों को दीमक बताकर मोदी सरकार के लिए बांग्लादेश नीति को कड़वा बना दिया था। अमित शाह की टिप्पणी उस वक्त आई थी, जब भारत सरकार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लागू करने की कोशिश कर रही थी, जो तब से अधर में लटका हुआ है।
बांग्लादेशी अधिकारी निजी तौर पर कहते हैं, कि शेख हसीना इस मामले को सार्वजनिक रूप से उठाने में बहुत गर्व महसूस करती हैं, लेकिन वह अपमान को कभी नहीं भूलेंगी।
उनकी अन्य सभी विशिष्टताओं के बावजूद, शेख हसीना के बारे में एक बात है, जो किसी भी उपमहाद्वीप के दिल को प्रसन्न कर देगी, वह है, उनकी पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष नीति, वो वो बांग्लादेश को भी धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने के लिए दृढ़ हैं, उन सभी सांप्रदायिक परेशानियों के बावजूद, जिन्होंने उनकी निगरानी में भी हिंदू समुदाय को परेशान किया है।
अगर शेख हसीना को लगता है, कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ कोई कट्टरपंथी संगठन भावनाओं को भड़काने का काम कर रहे हैं, तो ऐसे संगठनों के खिलाफ वो सख्ती से एक्शन लेती हैं और इसमें भी कोई शक नहीं है, कि पिछले कुछ वर्षों में दुर्गा पूजा के दौरान मूर्ति तोड़ने की घटनाओं को बेहद गंभीरता से निपटाया गया है।
लिहाजा, मोदी सरकार के साथ कई मायनों में शेख हसीना के संबंध काफी मजबूत रहे हैं। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने कई मौकों पर शेख हसीना को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर विशेष स्थान दिया है, जैसे जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान शेख हसीना को ना सिर्फ आमंत्रण भेजना, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से पहले शेख हसीना के साथ द्विपक्षीय बैठक करना, ये संदेश देता है, कि मोदी सरकार, शेख हसीना को कितना तवज्जो देती है।
लेकिन, मोदी सरकार के विपरीत, अमेरिका लोकतांत्रिक चाबुक से शेख हसीना सरकार को नियंत्रित करना चाहता है और उम्मीद करता है, कि शेख हसीना, मदर टेरेसा जैसा बर्ताव करेंगी, ये संभव नहीं है।
एक्सपर्ट्स का कहना है, कि जिस तरह से अल्पसंख्यकों को लेकर मोदी सरकार के सामने अमेरिका ने घुटने टेके हैं, शेख हसीना के सामने भी अमेरिका को बेबस होना पड़ेगा।
लेकिन, तमाम एक्सपर्ट्स इस बात पर सहमत हैं, कि जब बांग्लादेश में 7 जनवरी को मतदान होगा, तो यह एक आदर्श चुनाव नहीं हो सकता है, जिसमें पुरुष, महिलाएं और युवा वयस्क मतदान केंद्र पर हाथ पकड़कर रवीन्द्र संगीत गाएंगे। लेकिन, यह चुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र ही करवाए जाएंगे, इसमें भी शक नहीं है।
इसके अलावा, शेख हसीना सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, कि अमेरिका और पश्चिम की बांग्लादेश के चुनाव को लेकर क्या धारणा है, क्योंकि शेख हसीना को पूरा भरोसा है, कि कम से कम भारत, पूरी तरह से उनके पीछे खड़ा है।












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