Iran Foreign Minister India Visit: भारत दौरे पर क्यों आ रहे हैं ईरानी विदेश मंत्री? किन मुद्दों पर चर्चा

Iran Foreign Minister India Visit: ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची की 14-15 मई को होने वाली भारत यात्रा न केवल ब्रिक्स (BRICS) के लिए, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की शांति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, और ऐसे में दिल्ली में होने वाली यह बैठक दुनिया भर की कूटनीति का केंद्र बन गई है।

ईरान के नए सदस्य के रूप में शामिल होने के बाद यह पहला बड़ा मौका है जब वह भारत की मेजबानी में इतने बड़े मंच पर अपनी बात रखेगा।

Iran Foreign Minister India Visit

बड़ा मुद्दा अशांति को रोकना होगा

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। अराघची की भारत यात्रा का सबसे बड़ा मुद्दा इस अशांति को रोकना होगा। हाल ही में हुए हमलों और अमेरिका के साथ बातचीत टूटने के बाद, ईरान अब भारत जैसे मित्र देशों के जरिए अपनी बात दुनिया के सामने रखना चाहता है। भारत की संतुलित विदेश नीति इस संकट में मध्यस्थ (Mediator) के रूप में एक उम्मीद की किरण पेश कर सकती है।

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अमेरिका के साथ टूटी बातचीत

ईरान ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल अमेरिका से सीधी बात नहीं करेगा। ईरान की शर्त है कि जब तक उसके देश को हुए भारी नुकसान की भरपाई नहीं होती, तब तक कोई समझौता मुमकिन नहीं है। ब्रिक्स की इस बैठक में ईरान इस मुद्दे पर भारत और रूस का समर्थन मांग सकता है। चूंकि रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भी वहां मौजूद होंगे, इसलिए यह बैठक अमेरिका और इजरायल के खिलाफ एक मजबूत कूटनीतिक मोर्चा तैयार करने का जरिया बन सकती है।

चाबहार और आर्थिक रणनीतियां

भारत और ईरान के बीच 'चाबहार पोर्ट' एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। इस यात्रा के दौरान दोनों देश व्यापार और कनेक्टिविटी (Connectivity) को बढ़ाने पर बात करेंगे। ब्रिक्स के ढांचे के भीतर, दोनों देश डॉलर के बिना अपनी स्थानीय करेंसी (जैसे रुपया और रियाल) में व्यापार करने की योजना को भी आगे बढ़ा सकते हैं। इससे ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर कम करने में मदद मिलेगी और भारत को मध्य एशिया तक सीधा रास्ता मिलेगा।

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विस्तारित ब्रिक्स में भारत का दबदबा

भारत इस साल चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। ईरान, मिस्र और सऊदी अरब जैसे नए देशों के शामिल होने के बाद यह समूह अब और भी ज्यादा शक्तिशाली हो गया है। भारत के लिए यह मौका है कि वह खुद को 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के नेता के रूप में पेश करे। सैयद अब्बास अराघची की मौजूदगी यह साबित करेगी कि वैश्विक राजनीति में अब फैसले केवल पश्चिम के देशों द्वारा नहीं, बल्कि ब्रिक्स जैसे मंचों पर भी लिए जा रहे हैं।

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