पाकिस्तान और लीबिया के साथ खड़ा हुआ भारत, अमेरिका के खिलाफ जाकर क्यों दिया ईरान का साथ?
ईरान की सरकार IAEA के साथ टकराव की स्थिति में चली गई है और इस सप्ताह IAEA बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक के दौरान भारत के मत को तेहरान के लिए समर्थन के एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा था।
नई दिल्ली, जून 12: पिछले कुछ महीनों में भारत बार बार साबित कर रहा है, कि क्यों उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है और क्यों भारत की विदेश नीति पर ना तो अमेरिका और ना ही पश्चिमी देश अपना प्रभाव डाल सकते हैं। ईरान के मुद्दे पर अमेरिका द्वारा लाए गये एक अहम प्रस्ताव पर भारत ने वोटिंग से गैर-हाजिर रहकर ईरान की ना सिर्फ बहुत बड़ी मदद कर दी है, बल्कि भारत ने एक बार फिर से साबित किया है, कि उसकी विदेश नीति गुट-निरपेक्ष सिद्धांत का ही पालन कर रही है।

ईरान के खिलाफ वोटिंग से गैर-हाजिर
पाकिस्तान और लीबिया के साथ भारत उन तीन देशों में शामिल हो गया, जिसने आईएईए में ईरान के खिलाफ लाए गये प्रस्ताव के ना तो समर्थन में और ना ही विरोध में वोट किया। बल्कि, भारत वोटिंग से गैर-हाजिर रहा। भारत के अलावा पाकिस्तान और लीबिया भी ईरान के मुद्दे पर वोटिंग से गैर-हाजिर रहे और ईरान की आलोचना करने वाले प्रस्ताव से परहेज किया। ईरान के खिलाफ आईएईए ये इस प्रस्ताव को अमेरिका के द्वारा लाया गया था, जिसका समर्थन फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने किया था और भारत को लेकर सबकी निगाहें जमीं थी, कि क्या भारत ईरान के मुद्दे पर भी रूस जैसा ही फैसला करता है, या फिर अमेरिकी प्रस्ताव का समर्थन करता है।

भारत ने दिया ईरान का साथ!
ईरान की सरकार अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ टकराव की स्थिति में चली गई है और इस सप्ताह IAEA बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक के दौरान भारत के मत को तेहरान के लिए समर्थन के एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है, और इसके "गुटनिरपेक्ष" के पुनर्मूल्यांकन के रूप में देखा जा रहा है। भारत, पाकिस्तान और लीबिया के अलावा केवल तीन देशों में से एक था, जिन्होंने अपने परमाणु कार्यक्रम और अन्य प्रक्रियाओं के निरीक्षण के लिए IAEA के अनुरोधों का उल्लंघन करने के लिए ईरान की आलोचना करने वाले प्रस्ताव से परहेज किया। आईएईए के 35 देशों के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में से 30 देशों ने अमेरिका और "ई-3" देशों यूके, जर्मनी और फ्रांस द्वारा लाए गए प्रस्ताव के लिए मतदान किया, जबकि रूस और चीन ने इसके खिलाफ मतदान किया। (आईएईए के अध्यक्ष)

अमेरिका के खिलाफ फिर गया भारत
ईरान के खिलाफ लाए गये अमेरिकी प्रस्ताव का समर्थन नहीं करके भारत ने भले ही एक बार फिर से अपनी स्वतंत्र और गुट-निरपेक्ष विदेश नीति की बात कही हो, लेकिन ये तय है, कि भारत के फैसले से अमेरिका खुश नहीं है। पूर्व राजदूत और परमाणु मुद्दों पर विशेष दूत राकेश सूद ने कहा कि, 'भारत के वोटिंग से गैर-हाजिर रहने की ही उम्मीद थी, क्योंकि ठीक उसी वक्त ईरानी विदेश मंत्री भारत से अनुरोध करने नई दिल्ली पहुंच गये थे और यह फैसला भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के विकल्पों पर जोर देने के मामले में सरकार द्वारा हाल के बयानों के अनुरूप भी है'।

भारत दौर पर थे ईरानी विदेश मंत्री
IAEA में ये मतदान बुधवार को हुआ था, जब ईरानी विदेश मंत्री होसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन ने भारत की आधिकारिक यात्रा शुरू की थी और नई दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी औऱ भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ साथ भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ मुलाकात की थी। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने आईएईए की बैठक और संकल्प पर अपनी बातचीत का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया। बुधवार रात जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि, ईरानी विदेश मंत्री अब्दुल्लाहियन ने "जेसीपीओए से संबंधित मौजूदा स्थिति पर विदेश मंत्री को जानकारी दी" और 2015 में ईरान द्वारा परमाणु मुद्दों पर संयुक्त व्यापक कार्य योजना पर सहमति व्यक्त की गई, जिससे अमेरिका साल 2019 में पीछे हट गया था।

न्यूक्लियर डील पर घिरा है ईरान
आईएईए के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने मंगलवार को ईरान का दौरा करने के बाद प्रस्तुत एक रिपोर्ट में बोर्ड को बताया कि, आईएईए ने जेसीपीओए के तहत ईरान की परमाणु प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन की अंतिम बार पुष्टि और निगरानी की थी। उन्होंने कहा कि, 'हालांकि, उस तिथि के बाद से, अतिरिक्त प्रोटोकॉल सहित, जेसीपीओए के तहत अपनी परमाणु-संबंधित प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन को रोकने के ईरान के फैसले से ये गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं'। जिसके बाद आईएईए में ईरान की आलोचना करने के लिए प्रस्ताव लाया गा था, जिसमें आरोप गया गया, कि तेहरान अघोषित स्थलों पर यूरेनियम के निशान पाए जाने के आरोपों पर जांच का समर्थन नहीं कर रहा है। वहीं, ईरान ने उस जगहों पर लगे सीसीटीवी कैमरों को भी हटा दिया है, जिन जगहों को लेकर शक है, कि वहां पर ईरान परमाणु बम बना सकता है।

परमाणु बम निर्माण पर क्या कहता है ईरान?
ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी के नेतृत्व वाली ईरानी सरकार ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि. उसके पास "कोई छिपी या अनिर्दिष्ट परमाणु गतिविधियां या अघोषित साइट नहीं हैं" और उन्होंने IAEA पर अपने सहयोग के लिए "कृतघ्न" होने का आरोप लगाया, जो कहता है कि ईरान परमाणु हथियार के निर्माण में लगा हुआ है। जबकि, ईरान अमेरिका के पूर्व ट्रंप प्रशासन पर न्यूक्लियर डील से पीछे हटने का आरोप लगाता है और कहा है कि, ट्रंप प्रशासन प्रतिबंध हटाने की अपनी प्रतिबद्धताओं से मुकर गया और पिछली अमेरिकी ओबामा सरकार द्वारा हस्ताक्षरित जेसीपीओए समझौते से बाहर निकल गया। बुधवार को, ईरान ने परमाणु कार्यों की निगरानी के लिए IAEA द्वारा लगाए गए कुछ कैमरों को भी नष्ट करना शुरू कर दिया, जिसने भविष्य के डेटा संग्रह पर चिंता जताई।

स्वतंत्र विदेश नीति पर भारत का जोर
यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद से भारत ने यूनाइटेड नेशंस में रूस के खिलाफ लाए गये तमाम प्रस्तावों पर वोटिंग से गैर-हाजिर रहा और अब ईरान के मुद्दे पर भी भारत अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ वहीं गया और भारत का वोटिंग में शामिल नहीं होना, ईरान के लिए बहुत बड़ी राहत की बात है। वहीं, पिछले कुछ हफ्तों में सरकार द्वारा संदर्भित "गुटनिरपेक्षता" की भारत की नीति पर जोर दिया है। पिछले दिनों भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने एक अखबार में लिखे अपने कॉलम में कहा कि 'गुटनिरपेक्षता और एक स्वतंत्र और निष्पक्ष वैश्विक व्यवस्था का लक्ष्य" मोदी सरकार की विदेश नीति की "प्रमुख" विशेषताओं में से एक रहा है। वहीं, आईआईटी गुवाहाटी के छात्रों द्वारा भारत की गुटनिरपेक्ष नीति के बारे में पूछे जाने पर भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि, एक ध्रुवीकृत दुनिया में भारत को "अपने हितों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए और हमें इसे आगे बढ़ाने के लिए आश्वस्त होना चाहिए। हमें अधिक से अधिक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ एक डायलॉग का निर्माण करने और अपने हितों का सामंजस्य स्थापित करने के लिए कुशल होना चाहिए। "
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