EX-CM को छोड़ कांग्रेस नेता की बेटी को राज्यसभा भेजेगी BJP? कौन हैं निशा उरांव? क्या है जाति, पति हैं IAS
Nesha Oraon Rajya Sabha Ticket: झारखंड के सियासी गलियारों में इन दिनों एक नया और बेहद दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही राज्य की राजनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। इस बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने साफ कर दिया है कि वह किसी निर्दलीय प्रत्याशी के कंधों पर बंदूक रखकर नहीं चलेगी, बल्कि मैदान में अपना ही आधिकारिक उम्मीदवार उतारेगी।
भाजपा के इस फैसले के बाद से ही संभावित उम्मीदवारों के नामों को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। रेस में कई बड़े नाम तैर रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा दो चेहरों की हो रही है। पहला नाम है राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा का, और दूसरा नाम जिसने सबको चौंकाया है, वह है भारतीय राजस्व सेवा (IRS) की अधिकारी निशा उरांव का।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि निशा उरांव कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव की बेटी हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी झारखंड की राजनीति में बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा जैसे बड़े चेहरे की जगह निशा उरांव पर दांव लगाने जा रही है? आइए समझते हैं कि आखिर निशा उरांव का नाम इस रेस में इतनी तेजी से आगे क्यों आया और इसके पीछे के असली सियासी समीकरण क्या हैं, साथ में ये भी जानेंगे कि निशा उरांव कौन हैं।
▶️कौन हैं निशा उरांव और क्या है उनका पारिवारिक बैकग्राउंड? (Who is Nesha Oraon and what is her family background)
निशा उरांव कोई साधारण प्रशासनिक चेहरा नहीं हैं, बल्कि उनका ताल्लुक झारखंड के एक बेहद रसूखदार राजनीतिक और प्रशासनिक परिवार से है। वह 2008 बैच की आईआरएस (Indian Revenue Service - Income Tax) अधिकारी हैं। निशा मूल रूप से उरांव जनजाति से आती हैं, जो झारखंड की एक बेहद प्रतिष्ठित और प्रभावशाली अनुसूचित जनजाति (ST) है।
उनकी पहली पोस्टिंग हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुई थी। इसके बाद उन्होंने रांची में आयकर उप-आयुक्त के रूप में अपनी सेवाएं दीं। प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें झारखंड सरकार में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर भेजा गया, जहां उन्होंने कृषि निदेशक और पंचायती राज निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों की कमान संभाली।
अगर उनके परिवार की बात करें, तो निशा उरांव के पिता कोई और नहीं बल्कि झारखंड कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार डॉ. रामेश्वर उरांव हैं। डॉ. रामेश्वर उरांव खुद 1972 बैच के पूर्व आईपीएस (IPS) अधिकारी रह चुके हैं और उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक भी मिल चुका है। नौकरी से इस्तीफा देकर राजनीति में आए रामेश्वर उरांव मनमोहन सिंह की केंद्र सरकार में आदिवासी मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री और झारखंड के वित्त मंत्री रह चुके हैं। वर्तमान में वह लोहरदगा सीट से कांग्रेस विधायक हैं और कांग्रेस विधायक दल (CLP) के नेता हैं। निशा की माता का नाम रागिनी मिंज है और उनके भाई का नाम रोहित उरांव है।

▶️कौन हैं निशा उरांव के IAS पति आशीष सिंघमार (Who is Nesha Oraon's husband IAS Ashish Singhmar)
निशा उरांव के पति भी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा का हिस्सा हैं। उनके पति का नाम आशीष सिंघमार है, जो एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी हैं। दोनों की मुलाकात की कहानी भी काफी दिलचस्प है। निशा ने साल 2008 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा पास की थी। इसी साल इंटरव्यू के दौर के दौरान उनकी मुलाकात आशीष से हुई थी। आगे चलकर दोनों का यह परिचय जीवनभर के साथ में बदल गया। दोनों ही अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों में बेहतरीन कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं।
▶️वो 3 बड़े कारण, जिन्होंने निशा उरांव को बनाया राज्यसभा भेजने के लिए BJP की पसंद
भले ही निशा उरांव एक कांग्रेस नेता की बेटी हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से उनकी वैचारिक दिशा भाजपा की नीतियों से काफी मेल खा रही है। यही वजह है कि राज्यसभा के लिए उनके नाम की चर्चा सबसे ज्यादा है। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण नजर आते हैं:
🔹1. धर्मांतरण के मुद्दे पर खुलकर बोलना
निशा उरांव इन दिनों झारखंड के आदिवासी इलाकों में धर्मांतरण के खिलाफ एक वैचारिक मुहिम चला रही हैं। उन्होंने सितंबर 2025 में लोहरदगा से 'पारंपरिक उलगुलान (सांस्कृतिक क्रांति)' के दूसरे अध्याय की शुरुआत की, जिसका मकसद आदिवासी परंपराओं और कानूनों की रक्षा करना है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि धर्मांतरण आदिवासियों की संस्कृति और जड़ों में नमक डालने जैसा है। जब भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने इस मुद्दे को उठाया, तो निशा ने खुलकर उनका समर्थन किया, जिसने भाजपा का ध्यान उनकी ओर खींचा।
🔹2. डिलिस्टिंग की मांग का पुरजोर समर्थन
निशा उरांव ने आदिवासियों के आरक्षण को लेकर एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि सरकारी नौकरियों में आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण का करीब 90 फीसदी फायदा वो लोग उठा रहे हैं जो धर्म बदल चुके हैं। इसलिए उन्होंने 'डिलिस्टिंग' का समर्थन किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि जो सरना आदिवासी अपना धर्म बदलकर ईसाई या इस्लाम अपना चुके हैं, उन्हें आदिवासी के दर्जे से बाहर किया जाए और उनका आरक्षण खत्म हो। यह लाइन पूरी तरह से भाजपा के एजेंडे से मेल खाती है।
🔹3. जनजातीय समागम और सनातन से जुड़ाव
हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित हुए 'जनजातीय समागम' में निशा उरांव ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। इसके बाद उन्होंने भाजपा की उन नीतियों की सराहना की जो सरना आदिवासियों को हिंदू और सनातन परंपरा से जोड़कर देखती हैं। एक आईआरएस अधिकारी होने के बावजूद उनका इस तरह सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों पर मुखर होना इस बात का संकेत है कि वह भविष्य के लिए कोई बड़ी सियासी जमीन तैयार कर रही हैं।

▶️प्रशासनिक करियर में क्रांतिकारी कदम और पेसा कानून
निशा उरांव सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही हैं, बल्कि झारखंड सरकार में काम करते हुए उन्होंने जमीन पर अपनी काबिलियत साबित की है। पंचायती राज निदेशक रहते हुए उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को मजबूत करने वाले PESA अधिनियम (1996) की नियमावली बनाने में बेहद अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, जब हेमंत सोरेन सरकार ने इस नियमावली को लागू किया, तो निशा ने इसमें कई कमियां पाते हुए आदिवासी संगठनों के साथ मिलकर राज्यपाल को ज्ञापन भी सौंपा था।
इसके अलावा, उन्होंने आदिवासी संस्कृति के दस्तावेज़ीकरण के लिए "हमारी परंपरा, हमारी विरासत" कार्यक्रम की शुरुआत की थी। वहीं कृषि विभाग में रहते हुए उन्होंने बीज वितरण प्रणाली में 'ब्लॉकचेन तकनीक' लागू की थी, जिसे झारखंड जैसे राज्य के लिए एक बड़ा और आधुनिक क्रांतिकारी कदम माना गया।

▶️कांग्रेस विधायक की बेटी पर दांव खेलने के पीछे का असली खेल
अब सवाल उठता है कि भाजपा आखिर पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा जैसे दिग्गज को छोड़कर निशा उरांव पर दांव क्यों लगाना चाहेगी? इसके पीछे झारखंड विधानसभा का पूरा गणित और सियासी रणनीति छिपी है।
वोटों का गणित: राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए प्रथम वरीयता के 28 वोटों की जरूरत है। वर्तमान में भाजपा के पास अपने 21 विधायक हैं और सहयोगियों को मिलाकर यह आंकड़ा 24 तक पहुंचता है। जीत के लिए भाजपा को सत्ता पक्ष (झामुमो-कांग्रेस गठबंधन) के कम से कम 3-4 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी।
🔹सत्तारूढ़ दल में सेंधमारी: निशा उरांव चूंकि कांग्रेस विधायक दल के नेता डॉ. रामेश्वर उरांव की बेटी हैं, इसलिए उनके नाम पर दांव खेलकर भाजपा सत्ता पक्ष के विधायकों में आसानी से सेंध लगा सकती है।
🔹पिता-पुत्र पर जांच का साया: गौरतलब है कि अगस्त 2023 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कथित शराब घोटाले में रामेश्वर उरांव के बेटे (निशा के भाई) के ठिकानों पर छापेमारी की थी। हालांकि कांग्रेस ने इसे राजनीतिक साजिश बताया था, लेकिन इस पारिवारिक पृष्ठभूमि और बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच निशा उरांव का नाम आगे बढ़ाना भाजपा के लिए एक अचूक तीर साबित हो सकता है।
यही वो तमाम सियासी और सामाजिक समीकरण हैं, जो इस समय निशा उरांव के पक्ष में जाते दिख रहे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस दांव को अंतिम रूप देकर झारखंड की राजनीति में क्या नया धमाका करती है।















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