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Imran Khan पाकिस्तानी सेना को लाए घुटनों पर, जिन्ना के देश के लिए क्यों है ये ऐतिहासिक घटना

आईएसआई की स्थापना का मकसद पाकिस्तान के बाहर की खुफिया जानकारियों को इकट्ठा करना था, लेकिन आईएसआई अपने देश के अंदर ही जासूसी करने, लोगों को ठिकाना लगाने और सरकार बनाने और इसे गिराने का काम करने के लिए कुख्यात है।

Imran khan Vs Pakistani Army: अपनी स्थापना के बाद से ही पाकिस्तान की सेना ने भारत के खिलाफ अपनी अवाम को भड़काने, भारत के खिलाफ युद्ध शुरू करने और हारने का रिकॉर्ड बनाया है। पाकिस्तानी सेना के लिए अपने माथे पर लगे इस दाग को पोंछना असंभव है, लेकिन पाकिस्तान की सेना एक जगह बिल्कुल नहीं हारी है और वो है अपने देश की राजनीति में जनता की चुनी हुई सरकारों को नियंत्रित करने में। पाकिस्तानी सेना ने अपनी अवाम को भारत का हमेशा से खतरे का माहौल बनाया, डर का माहौल है, जैसे वातावरण बनाया और फिर देश की सरकारों को अपनी बेंत से हांकने का काम किया। लेकिन, शायद पाकिस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है, जब पाकिस्तानी सेना एक जननेता के सामने घुटनों पर आ गई है। ऐसे में सवाल ये है, कि क्या पाकिस्तानी फौज पहली बार खुद को कमजोर अवस्था में पा रही है, या इमरान खान को 'जीवनदान' दिया जा रहा है या फिर इमरान खान अब इतने ताकतवर हो चुके हैं, कि वो पाकिस्तानी लोकतंत्र को सेना के दायरे से बाहर निकालने में कामयाब हो जाएंगे?

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    इतिहास में पहली बार ISI की प्रेस कॉन्फ्रेंस

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    भारत के साथ चार युद्ध लड़ने और पूरा का पूरा पूर्वी पाकिस्तान खोने के बाद भी दुनिया में सिर्फ पाकिस्तान की ही इकलौती सेना है, जिसके जनरलों के कंधे पर बड़े बड़े मेडल्स सजे होते हैं और वो पाकिस्तान आर्मी ही है, जो अपनी अवाम की आंख में आंख डालकर झूठ बोलती है और अवाम उस झूठ को अपने गले का हार भी बनाती है। राजनीति में सेना के बार बार हस्तक्षेप ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से लेकर उसकी उद्यमिता और उसकी मानसिकता तक को नष्ट कर दिया है। लिहाजा, जैसे ही सेना फंसती है, पाकिस्तान में कश्मीर और सियाचिन के नारे लगाए जाने लगते हैं। लेकिन, इस बार लगता है, इमरान खान ने सेना को चित करने ठान ली है और शायद इसीलिए पाकिस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब खुद को सर्वशक्तिमान कहने वाली पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख जनरल नदीम अहमद अंजुम को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए आना पड़ा। आईएसआई के प्रमुख के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तानी सेना के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बाबर इफ्तिखार भी मौजूद थे और ये प्रेस कॉन्फ्रेंस कुछ मिनट नहीं, बल्कि डेढ़ घंटे तक चलता रहा। इस दौरान आईएसआई चीफ बार बार एजेंसी को पाक साफ बताने की कोशिश कर रहे थे और इमरान खान पर सीधे हमले कर रहे थे।

    घरेलू राजनीति में कुख्यात है आईएसआई

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    वैसे तो आईएसआई की स्थापना का मकसद पाकिस्तान के बाहर की खुफिया जानकारियों को इकट्ठा करना था, लेकिन आईएसआई अपने देश के अंदर ही जासूसी करने, लोगों को ठिकाना लगाने और सरकार बनाने और इसे गिराने का काम करने के लिए कुख्यात है। लिहाजा, ये आईएसआई ही है, जिससे पूरा पाकिस्तान प्यार भी करता है, डरता भी है और नफरत भी करता है। खासकर पाकिस्तान के नेता और पत्रकार आईएसआई के एक इशारे पर लाइन में लग जाते हैं। यदि कोई ऐसा नहीं करेगा, तो उसकी लाश किसी अज्ञात जगह मिलेगी, या फिर वो जेल जाता नजर आएगा, या फिर देश से भागा हुआ या फिर किसी थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हो जाएगी, यानि वो लापता हो जाएगा। आईएसआई ऐसे कामों में माहिर मानी जाती है। लेकिन, इस बार आईएसआई के बैकफुट पर आने की वजह पाकिस्तान के दिग्गज पत्रकार अरशद शरीफ की मौत है, जिनकी केन्या में गोली मारकर हत्या कर दी गई। अरशद शरीफ ने अपने कुछ कार्यक्रमों में आईसआई को आड़े हाथों लिया था, जिसके बाद उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा था। अरशद शरीफ पाकिस्तान एक ईमानदार और कद्दावर पत्रकार माने जाते थे और इमरान खान ने उनकी मौत के पीछे सीधे तौर पर सेना और आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया है और इसीलिए सेना और आईएसआई प्रमुख को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए आना पड़ा।

    इमरान खान से आईएसआई को डर क्यों?

    इमरान खान से आईएसआई को डर क्यों?

    इमरान खान की मौजूदा राजनीतिक स्थिति ने सेना और आईएसआई को डरा दिया है, इसमें शक करने की कोई बात नहीं है। क्योंकि, पाकिस्तान में ऐसा पहली बार हुआ है, जब पाकिस्तानी अवाम ने सेना से सवाल पूछना शुरू कर दिया है। लिहाजा, अरशद शरीफ की मौत सेना और आईएसआई के गले पर भारी पत्थर की तरह लटक गया है। अरशद शरीफ के जनाजे में लाखों लोग उमर आए, जिससे सेना प्रेशर में आ गई है। आईएसआई, जो पाकिस्तान की अदालत, इलेक्शन कमीशन, सरकार और पत्रकार को नियंत्रित करती है, वो अब जनता और इमरान खान को कैसे नियंत्रित करे, उसे समझ नहीं आ रहा है। इमरान खान सिर पर कफन बांधकर खड़े हो गये हैं और शुक्रवार को उन्होंने लाहौर से राजधानी इस्लामाबाद के लिए पैदल यात्रा शुरू कर दी है। इस रैली में लाखों लोगों की मौजूदगी से डरी शहबाज शरीफ की सरकार ने यात्रा के लाइव प्रसारण पर रोक लगा दी है। लेकिन, इमरान खान अड़े हुए हैं और उन्होंने रैली को संबोधित करते हुए सीधे आईएसआई के प्रमुख को चेतावनी दे दी, कि उनके पास इतने सबूत हैं, कि अगर वो सार्वजनिक कर दें, तो आईएसआई की हालत पतली हो जाएगी। लिहाजा आईएसआई डरी नजर आ रही है।

    लोकतंत्र के अंदर आने से डरी आर्मी?

    लोकतंत्र के अंदर आने से डरी आर्मी?

    पाकिस्तान की सेना देश के राजनीतिक वर्ग को खत्म करने और उन्हें कंट्रोल में रखने में हमेशा से शानदार रही है। अब उसे देश के राजनेताओं के हाथों हार जाने का डर सता रहा है। इमरान खान जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उसमें उनके चुनाव जीतने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ गई है और अगर वाकई ऐसा होता है, तो फिर ऐसा पहली बार होगा, जब एक नेता पाकिस्तानी आर्मी की मर्जी के खिलाफ चुनकर सत्ता में आ जाएगी। लिहाजा ये ऐतिहासिक होगा और पाकिस्तान की जनता की तरफ से साफ तौर पर ये सेना के लिए ये एक संदेश होगा, कि सेना का काम राजनीति में दखल देना नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा करना है। राजनीति करने नेताओं का काम है और सेना इससे दूर रहे। लिहाजा, संभावित हार से सेना आशंकित है, लिहाजा यह उपमहाद्वीप के लिए इतिहास को परिभाषित करने वाला क्षण है।

    इतिहास को परिभाषित करने वाला क्षण कैसे?

    इतिहास को परिभाषित करने वाला क्षण कैसे?

    पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों ने हमेशा से 'भारत से खतरा है' का डर दिखाकर अपनी जेबें भरी हैं और पाकिस्तानी सेना का कोई भी रिटायर्ड जनरल पाकिस्तान में नहीं रहता है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन रहने के लिए चला जाता है। पाकिस्तानी जनरलों के बच्चे भी इन्हीं देशों में पढ़ते हैं और पाकिस्तानी की सेना दुनिया की पहली आर्मी है, जो पैसों के लिए अपने ही देश की जनता को मारने से पीछे नहीं हटती है। लेकिन, इमरान खान अब सेना से सीधा सवाल पूछ रहे हैं। सेना इस बात से इनकार नहीं कर सकती है, कि पाकिस्तान की विदेश नीति पर उसका ही नियंत्रण रहा है, लिहाजा इमरान खान बार बार पाकिस्तान की विदेश नीति को 'गुलाम' बताते हुए भारत की विदेश नीति की तारीफ कर रहा है और ऐसा इमरान खान बहुत सोच विचार कर, अपनी रणनीति के तहत कर रहे हैं। एक समय पाकिस्तानी सेना के मुंह से निकला एक एक शब्द पाकिस्तान के नेताओं के लिए आदेश हुआ करता था, लेकिन इमरान खान उसे बदल रहे हैं। इमरान खान मंच से सेना और आईएसआई को चुनौती दे रहे हैं और ऐसा पहली बार हो रहा है, जब सेना और आईएसआई प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद को पीड़ित बता रही है। इसीलिए, अगर इमरान खान जीतते हैं, तो ये एक नागरिक सरकार की जीत होगी और सैन्य तानाशाहों की हार होगी, इसीलिए पाकिस्तान और समूचे उपमहाद्वीप के लिए ये एक ऐतिहासिक पल होगा।

    आसानी से हार मान लेगी आर्मी?

    आसानी से हार मान लेगी आर्मी?

    अब सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या पाकिस्तान की सेना इतनी आसानी से हार मान लेगी? जो पाकिस्तानी सेना नागरिक सरकारों के मुखिया को फांसी देने, गोली मरवाने और रातों रात सत्ता पलटने के लिए कुख्यात रही है, क्या वो वाकई हार मान लेगी? साल 2007 में जब ऐसा लग रहा था, कि निर्वासित होकर देश लौटने वालीं बेनजीर भुट्टो चुनावी जीत की तरफ बढ़ रही हैं, उस वक्त उनकी सरेआम गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई। आरोप पाकिस्तान की सेना पर लगे। इस हत्याकांड में आज तक किसी की गिरफ्तारी तक नहीं हो पाई। यह घटना, कई अन्य लोगों की तरह पाकिस्तान के साजिशों और शाश्वत रहस्यों के इतिहास में दफन है। उनकी पार्टी की सरकार को सत्ता से बाहर फेंक दिया गया और बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी पाकिस्तान की राजनीति में नाममात्र के नेता रह गये। इस तरह सेना ने एक नागरिक नेता को कुचल दिया था।

    नवाज शरीफ का भी किया बुरा हाल

    नवाज शरीफ का भी किया बुरा हाल

    नवाज शरीफ ने बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और नवाज शरीफ ने भी खुद को सेना से ज्यादा ताकतवार होने का भ्रम पाला और नवाज शफीफ ने खुद को पाकिस्तान का वास्तविक प्रधानमंत्री मानना शुरू कर दिया। लेकिन, साल 2018 में सेना ने नवाज शरीफ को ना सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटा दिया, बल्कि उन्हें जेल भी भिजवा दिया। इतना ही नहीं, सेना ने सुनिश्चित किया, कि नवाज शरीफ की पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर पाए और फिर इस तरह से इमरान खान की पाकिस्तान की सत्ता में पहली बार एंट्री हुई। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तानी सेना ने अब पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन चुके 'तहरीक-ए-लब्बैक' पार्टी को बनाया, उसे मजबूत किया और खुद अपनी ही अवाम के दिमाग को इतना कट्टर बना दिया, कि ये अब किसी की भी गर्दन उतारने से पहले क्षण भर नहीं सोचेंगे। लिहाजा, अब सवाल यही उठ रहे हैं, कि आखिर इमरान खान कितने दिनों तक फौज के सामने खड़े रहेंगे और क्या इमरान खान पाकिस्तान के इतिहास को बदल पाएंगे?

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