Chabahar Port: चाबहार पोर्ट भारत के लिए इतना जरूरी क्यों है, कि अमेरिकी प्रतिबंधों की नहीं है परवाह?
Chabahar Port Deal: भारत ने ईरान के रणनीतिक चाबहार बंदरगाह को विकसित करने और ऑपरेट करने के लिए 10 साल के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसका मकसद अपने पश्चिमी पड़ोसी और कट्टर दुश्मन पाकिस्तान में बंदरगाहों को दरकिनार करते हुए, भूमि से घिरे अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देना है।
ये बंदरगाह भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि इस पोर्ट डील के लिए भारत ने अमेरिका के प्रतिबंधों को भी परवाह नहीं की है। आखिर ये बंदरगाह भारत के लिए कितना जरूरी है, आइये समझते हैं।

भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का रिस्क
भारत के जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, कि, "यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण व्यापार धमनी के रूप में कार्य करता है। क्योंकि नई दिल्ली एक महत्वपूर्ण मध्य पूर्वी राष्ट्र के साथ संबंधों को मजबूत करने का प्रयास कर रही है।"
लेकिन इस सौदे की वजह से संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिबंधों का खतरा है, जिसके साथ भारत ने हाल के दशकों में घनिष्ठ आर्थिक और सैन्य संबंध विकसित किए हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता वेदांत पटेल ने संवाददाताओं से कहा, "कोई भी इकाई, कोई भी व्यक्ति जो ईरान के साथ व्यापारिक सौदे पर विचार कर रहा है, उन्हें उस संभावित जोखिम और प्रतिबंधों के संभावित जोखिम के बारे में पता होना चाहिए, जो वे खुद के लिए खोल रहे हैं।"
हालांकि, भारतीय अधिकारियों ने तनाव को कम कर दिया है। विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर ने बुधवार को संवाददाताओं से कहा, कि नई दिल्ली अमेरिका को समझौते के "लाभों के बारे में बताएगी" और देशों से "इसके बारे में संकीर्ण दृष्टिकोण न अपनाने" का आग्रह करेगी।
चाबहार बंदरगाह सौदा क्या है?
इंडिया पोर्ट ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के बंदरगाह और समुद्री संगठन (PMO) ने दीर्घकालिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो नई दिल्ली को 10 वर्षों में चाबहार बंदरगाह पर एक टर्मिनल को अपग्रेड और संचालित करने की अनुमति देगा।
ईरान के दक्षिणपूर्वी सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित और ओमान की खाड़ी पर स्थित, चाबहार बंदरगाह में दो अलग-अलग बंदरगाह हैं - शाहिद कलंतरी और शाहिद बेहेश्टी। भारत शाहिद बेहेश्टी में एक टर्मिनल संचालित करेगा, और नये समझौते के मुताबिक, इसे जेइक्विपमेंट में 120 मिलियन डॉलर का निवेश करेगा। बंदरगाह में संबंधित परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त 250 मिलियन डॉलर ऋण क्रेडिट सुविधा अनुबंध के मूल्य को 370 मिलियन डॉलर तक ले जाती है।
दोनों देशों ने पहली बार 2003 में इस परियोजना पर बातचीत शुरू की थी, लेकिन ईरान को निशाना बनाने वाले अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से कोई वास्तविक विकास नहीं हो सका। वाशिंगटन ने 2015 के ईरान पर परमाणु समझौते के तहत प्रतिबंधों में ढील देने के बाद तेहरान और नई दिल्ली ने फिर से वार्ता शुरू की।
अफगानिस्तान के साथ दोनों देशों भारत और ईरान, जो पाकिस्तान को छोड़कर वैकल्पिक मार्गों की तलाश कर रहे थे, उसके लिए भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की 2016 की ईरान यात्रा के दौरान बंदरगाह को विकसित करने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गये।

उस समय, नई दिल्ली ने गहरे समुद्र के बंदरगाह को पारगमन केंद्र के रूप में विकसित करने के अपने प्रयासों के तहत 600 मीटर (1969 फीट) लंबी कंटेनर हैंडलिंग सुविधा के पुनर्निर्माण के लिए 500 मिलियन डॉलर का निवेश करने का वादा किया था। चाबहार, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से लगभग 140 किमी (87 मील) पश्चिम में स्थित है, जिसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के हिस्से के रूप में विकसित किया गया है।
दिसंबर 2017 में, अफगानिस्तान के लिए भारतीय गेहूं की पहली खेप चाबहार से होकर गुजरी, जिससे भारत को पाकिस्तान से गुजरने वाले भूमि मार्ग का विकल्प मिल गया।
2018 में, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प परमाणु समझौते से हट गए और तेहरान पर प्रतिबंध फिर से लागू कर दिए, जिससे चाबहार बंदरगाह पर ऑपरेशन फिर सीमित हो गया।
चाबहार क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत, अपने तेजी से बढ़ते 600 अरब डॉलर के मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के साथ, पश्चिम में अपने अंतर्देशीय पड़ोसियों के साथ ज्यादा निकटता से व्यापार करने की महत्वाकांक्षा रखता है, लेकिन पाकिस्तान के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधों का मतलब है, कि सामानों को बेचने के लिए जमीन मार्ग का इस्तेमाल करने पर मजबूर होना, जो महंगा पड़ता है।
लेकिन, चाबहार बंदरगाह, भारत को पाकिस्तान के साथ लेनदेन से बचाता है और भारत इस रूट के जरिए पहले ईरान तक माल पहुंचा सकता है, और फिर रेल या सड़क नेटवर्क के माध्यम से अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे संसाधन-संपन्न भूमि से घिरे देशों तक अपना सामान पहुंचा सकता है। एक भारतीय अधिकारी ने तो रूस तक सामान पहुंचाने का भी जिक्र किया है।
भारत के लिए, चाबहार "उसकी पड़ोस नीतियों के केंद्रबिंदुओं में से एक है" और पश्चिम और मध्य एशिया में ज्यादा निवेश के अवसरों के लिए एक प्रकार का सुनहरा द्वार है।

क्या अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगा सकता है?
इतिहास में अमेरिका दो बार, साल 1974 और 1998 में भारत पर सीमित प्रतिबंध लगा चुका है, जब दोनों बार भारत ने परमाणु परीक्षण किए थे।
लेकिन, अब भारत और अमेरिका ने संबंधों को काफी मजबूत किया है, और आज एक दूसरे को सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार बन चुके हैं। हालांकि, भारत आधिकारिक तौर पर राष्ट्रों पर लगाए गए किसी भी प्रतिबंध को मान्यता नहीं देता है, जब तक कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र अनुमोदित ना करे, लेकिन अमेरिका के प्रतिबंध की वजह से भारत ने चाबहार पोर्ट को लेकर अभी तक परहेज किया है।
कुछ साल पहले तक, भारत ईरान से सबसे ज्यादा तेल खरीदता था, लेकिन 2018 के बाद से, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान परमाणु समझौते से हाथ खींच लिया और तेहरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए, तो भारत ने ईरानी तेल को खरीदना बंद कर दिया।
फिर भी, 2018 में, नई दिल्ली ने चाबहार से संबंधित प्रतिबंधों में विशिष्ट छूट हासिल करने के लिए वाशिंगटन से सफलतापूर्वक पैरवी की थी और अमेरिका को विश्वास दिलाया था, कि ये ट्रांजिट रूट, अफगानिस्तान की मदद कर सकता है, जो उस समय अमेरिका के लिए एक प्रमुख सुरक्षा हित था। चाबहार बंदरगाह को अफगानिस्तान से जोड़ने वाले एक निर्माणाधीन रेलवे लिंक को भी प्रतिबंधों से छूट दी गई थी।
लेकिन, अब ईरान के साथ भारत की दोस्ती, जब गाजा में इजराइल और हमास के बीच युद्ध चल रहा है, तो अमेरिका से प्रतिबंधों में छूट की उम्मीद करना बेमानी है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि 2021 में देश से बाहर निकलने के बाद से अफगानिस्तान भी अमेरिका के लिए एक प्रमुख हित नहीं रह गया है।
फिर भी, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि अमेरिका के लिए भारत पर प्रतिबंध लगाना काफी मुश्किल लगता है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के गुलशन सचदेवा ने कहा, कि "इतने छोटे मुद्दे पर भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंध लगाना बेहद असंभावित है।" उन्होंने अल जजीरा को बताया, "सबसे खराब स्थिति में केवल चाबहार पोर्ट सौदे में शामिल इकाइयां ही कुछ प्रतिबंधों के दायरे में आ सकती हैं।"
भारत, दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि देश पर किसी भी अमेरिकी प्रतिबंध को संभवतः नियंत्रित किया जाएगा और इससे वैश्विक व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक क्विंसी इंस्टीट्यूट फॉर रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट में ग्लोबल साउथ प्रोग्राम के निदेशक सारंग शिदोरे ने कहा, अगर अमेरिकी प्रतिबंधों के वास्तविक खतरे के बावजूद भारत आगे बढ़ता है, तो यह वाशिंगटन के लिए भी एक संकेत होगा।
उन्होंने कहा, कि "अगर भारत आगे बढ़ता है, तो इसका मतलब ये होता है, कि भारत अपने रणनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप बनाने की वाशिंगटन की प्राथमिकताओं के बावजूद, अपने हितों को आगे बढ़ाना जारी रखेगा।"












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