20 सालों में अमेरिका ने बनाई अफगान सेना, तालिबान के आगे ताश के पत्तों की तरह बिखर गई, आखिर क्यों?

अमेरिका ने दावा किया था कि वो अफगानिस्तान में प्रोफेशनल आर्मी का निर्माण करेगा और फिर देश से निकलेगा, लेकिन, अमेरिकी दावे की पूंगी तालिबान बजा चुका है।

काबुल, अगस्त 15: अमेरिका दावा करता है कि उसने एक ट्रिलियन डॉलर यानि भारतीय रुपयों के हिसाब से देखें तो 71,260,000,000,000 रुपये अफगानिस्तान में खर्च किए हैं। अमेरिका कहता है कि इतने पैसे खर्च कर अफगानिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया गया, तालिबान की कमर तोड़ी गई, अलकायदा को खत्म किया गया और अमेरिका का सबसे बड़ा दावा था कि उसने अफगानिस्तान में एक ऐसी सेना तैयार की है, जो तालिबान को रोककर रखेगा। लेकिन, अमेरिका के दावे ताश के पत्तों की तरफ बिखड़ चुकी है और अफगानिस्तान की सेना शीश महल की तरह चकनाचूर हो चुकी है। काबुल पर अब तालिबान का कब्जा होने वाला है।

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    टूटकर बिखड़ गई अफगान सेना

    टूटकर बिखड़ गई अफगान सेना

    अफगानिस्तान की रक्षा करने में अफगान सेना पूरी तरह से फेल हो गई है और राजधानी काबुल के चारों तरफ तालिबान डेरा डाल चुका है। अभी तक तालिबान का आक्रमण काबुल पर हो चुका होता, लेकिन खबर है कि अमेरिका ने तालिबान से गुहार लगाई थी कि उसे अपना दूतावास खाली करने दे। यानि, अब अगर आपको काबुल से बाहर निकलना है तो आपके लिए सिर्फ हवाई मार्ग ही सहारा है। जमीन के हर रास्ते पर तालिबान का नियंत्रण हो चुका है।

    तालिबान की एकतरफा जीत

    तालिबान की एकतरफा जीत

    अफगानिस्तान में अब सरकार के नियंत्रण में सिर्फ 82 जिले हैं और कब तक हैं, ये तालिबान पर निर्भर करता है। तालिबान के हाथ में अब 252 जिले हैं और तालिबान की 31 प्रांतीय राजधानियों में 20 राजधानियों पर अब तालिबानी झंडा लहरा रहा है। तालिबान ने ये जीत सिर्फ एक महीने में हासिल कर ली है, यानि देखा जाए तो अफगानिस्तान की सेना तालिबान के खिलाफ बेअसर साबित हुई है। तो सवाल ये उठता है कि आखिर अमेरिका ने अफगानिस्तान के अंदर किस तरह की आर्मी का निर्माण किया था, जो बिना प्रतिरोध के घुटने टेक गई?

    तालिबान के आगे नतमस्तक अफगान आर्मी

    तालिबान के आगे नतमस्तक अफगान आर्मी

    अफगानिस्तान से मिल रही है रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान उतनी ही तेजी से अफगानिस्तान पर कब्जा कर पा रहा है, जितना वक्त उसे एक जगह से दूसरे जगह तक पहुंचने में लगता है। तालिबान के पहुंचते ही अफगान सेना अपना हथियार डाल कर आत्मसमर्पण कर दे रही है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि तालिबान ने कहा है कि जो सैनिक आत्मसमर्पण कर देंगे, उन्हें मारा नहीं जाएगा। लिहाजा ज्यादातर प्रांतों में स्थानीय नेता और अफगान आर्मी के जवान सरेंडर कर अपनी जान बचा रहे है। यानि, अमेरिका ने 20 सालों में जिस अफगानिस्तान की आर्मी को तैयार किया था, वो महज कुछ ही महीनों में बिखर गई और अमेरिका की इस वजह से जमकर आलोचना हो रही है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिका की पोल-पट्टी खोलकर रख दी है।

    ट्रेनिंग पर खर्च किए 83 बिलियन डॉलर

    ट्रेनिंग पर खर्च किए 83 बिलियन डॉलर

    न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान की नेशनल आर्मी ने तालिबान से लड़ने के बजाए सरेंडर करने पर ज्यादा ध्यान दिया है और बड़े पैमाने पर सैनिकों ने सरेंडर कर अपनी जान बचाई है। जिसकी वजह से भारी संख्या में अमेरिकी लड़ाकू हेलीकॉप्टर, अमेरिकी रक्षा उपकरणों और हथियारों पर तालिबान का कब्जा हो गया है, जिसने तालिबान को काफी मजबूत बनाने का काम किया है। कई इलाकों में अफगानिस्तान की सेना शहर के बाहरी इलाकों में लड़ाई लड़ती नजर आई और हफ्तों का संघर्ष भी चला, लेकिन अंतिम जीत तालिबान की हुई है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने अफगान सेना की ट्रेनिंग पर, उन्हें हथियार देने पर और उपकरणों से लैस करने पर करीब 83 बिलियन डॉलर यानि करीब 6.10 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।

    कैसी सेना बनाई गई जो सरेंडर करती है?

    कैसी सेना बनाई गई जो सरेंडर करती है?

    रिपोर्ट के मुताबिक, बराक ओबामा प्रशासन ने अपने दूसरे कार्यकाल में अफगानिस्तान से अमेरिकन सैनिकों को वापस बुलाने की बात की थी और कहा था कि अफगानिस्तान की सुरक्षा अफगान सैनिकों के हाथ में सौंप दिया जाए। लेकिन, बाद में तय किया गया कि अफगान सैनिकों को इस लायक बना दिया जाए कि वो तालिबान को अकले रोकने में कामयाब हो सके। लेकिन, अमेरिका की तैयारी कैसी थी, इसे अब पूरी दुनिया देख चुकी है। यानि, 83 बिलियन डॉलर खर्च कर अमेरिका ने जिस अफगान आर्मी का निर्माण किया था और जिसका काम तालिबान को रोककर रखना था, वो ताश के पत्तों की तरफ बिखर चुकी है।

    अमेरिका की नाकामी, देश पर खतरा

    अमेरिका की नाकामी, देश पर खतरा

    यानि, अमेरिका ने जो दावा किया था कि वो अफगानिस्तान में प्रोफेशनल आर्मी का निर्माण करेगा और फिर देश से निकलेगा, उसकी पूंगी तालिबान बजा चुका है और स्थिति तो यहां तक बन गई कि अमेरिका को खुद काबुल में अपनी सुरक्षा के लिए तालिबान से गुहार लगानी पड़ी। अब स्थिति ये है कि अफगानिस्तान की सरकार के साथ साथ अफगान सैनिकों के लिए अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो चुका है और अफगानिस्तान के भीषण गृहयुद्ध में जाने की संभावना है या फिर अगले कुछ दिनों में तालिबान पूरे देश पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ अमेरिका की नाकामी है और अमेरिका की नाकामी, लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये की खामियाजा ना सिर्फ पूरा अफगानिस्तान चुका रहा है, बल्कि अफगानिस्तान का आने वाला भविष्य भी काला दिख रहा है। अफगानिस्तान के बच्चों के हाथ में रोटी नहीं है, किताब नहीं है, दूध नहीं है और वो असहाय रास्तों पर आ गये, इसकी जिम्मेदारी अगर किसी की है...तो सिर्फ और सिर्फ अमेरिका की।

    क्यों हार रही है अफगानिस्तान की सेना?

    क्यों हार रही है अफगानिस्तान की सेना?

    कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिका के संरक्षण में अशरफ गनी सरकार पूरी तरह से लापरवाह हो गई थी और अफगानिस्तान सरकार ने खुद को मजबूत करने पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। अफगानिस्तान सरकार ने सिर्फ काबुल, कंधार और हेरात जैसे शहरों को ही पूरा देश मान लिया। इसके साथ ही कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अफगानिस्तान सेना के निर्माण में अफगानिस्तान सरकार के कुछ मंत्रियों ने भारी भ्रष्टाचार किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दावा किया गया है कि अफगानिस्तान आर्मी के पास 3 लाख से ज्यादा जवानों की ताकत है, लेकिन हकीकत ये है कि ये जवान सिर्फ कागजों पर है। कागजों पर ही हजारों जवानों की भर्ती की गई, कागजों पर ही हजारों जवानों को ट्रेनिंग दी गई और कागजों पर ही उन्हें जंग में भेजा गया। यानि, सेना में भारी भ्रष्टाचार किया गया और कुछ भ्रष्ट नेताओं के किए की सजा पूरा अफगानिस्तान भुगत रहा है।

    60 हजार सैनिकों की मौत

    60 हजार सैनिकों की मौत

    न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान की आर्मी के पास खाने तक का बजट नहीं है। यानि भूखे पेट अफगानिस्तान की सैनिकों को तालिबान से लोहा लेने के लिए भेजा गया है। जिसकी वजह से तालिबान अफगान सैनिकों पर काफी ज्यादा हावी नजर आए। रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान सरकार की तरफ से देश के सैनिकों को खाने के नाम पर राशन और आलू दिए गये हैं। पुलिसवालों की भी यही स्थिति है। हजारों पुलिसवालों ने भूखे पेट रहकर देश की सेवा की है। एक पुलिसकर्मी ने तो यहां तक चिल्लाते हुए कहा था कि ''ये फ्रेंच फ्राइज पहली पंक्ति के सैनिकों की रक्षा नहीं कर पाएंगे''। और जिसका डर था वही हुआ। अफगानिस्तान सेना की पहली पंक्ति ध्वस्त हो चुकी है और अफगान सरकार के पास सिर्फ काबुल बचा है। रिपोर्ट के मुताबिक अब तक अफगानिस्तान में तालिबान के हाथों 60 हजार अफगान सैनिक मारे गये हैं और हजारों घायल हुए हैं।

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