जब भारत-PAK के जासूसों में हुई थी सीक्रेट मीटिंग, RAW-ISI की गुप्त डील कैसे हुई फेल? जानिए
भारत और पाकिस्तान के खुफिया प्रमुखों के बीच होने वाली इस बैठक की जानकारी दोनों देशों के प्रधानमंत्री को थी।
RAW-ISI सीक्रेट डील: क्या कश्मीर में भारतीय और पाकिस्तान के जासूसों के बीच सीक्रेट डील हुआ है? इस बाबत द प्रिंट में एक रिपोर्ट छपी है, जिसमें बताया गया है, कि किस तरह से भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बीच एक सीक्रेट डील की गई थी। इस रिपोर्ट में भारतीय विदेशी खुफिया सेवा के प्रमुख ए.के. वर्मा के एक आर्टिकिल का हवाला दिया गया है, जिनका अब निधन हो गया है। आइये जानते हैं, कि आखिर ये सीक्रेट डील क्या थी, इसका मकसद क्या था और इस सीक्रेट डील का क्या हुआ?

जासूसों के बीच सीक्रेट डील
28 अगस्त 2015 को पूर्व भारतीय विदेशी खुफिया प्रमुख दिवंगत ए.के. वर्मा ने एक नेशनल न्यूजपेपर में एक ऑप-एड लिखा था, जिसमें आईएसआई और रॉ के प्रमुखों के बीच अम्मान और जिनेवा में की हई दो दौर की गुप्त वार्ता का जिक्र किया गया था। उन्होंने इस बैठक के बारे में यह कहने के बजाय, कि भारतीय पक्ष का प्रतिनिधित्व उन्होंने खुद किया था, उन्होंने एक तीसरे व्यक्ति का मीटिंग में शामिल होने का हवाला दिया था। उन्होंने कहा कि, ये पहल 1988 की शुरुआत में खुद जनरल जिया ने की थी, क्योंकि उन्हें लग रहा था, कि भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण रक्षा बजट पर कीमती संसाधन बर्बाद हो रहे हैं।

जॉर्डन के क्राउन प्रिंस मे की मध्यस्थता
रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद उन्होंने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मनाने के लिए अपने अधिकारियों के जरिए जॉर्डन के तत्कालीन क्राउन प्रिंस हसन से संपर्क किया था। प्रिंस हसन, जिन्हें 9 फरवरी 1999 को जॉर्डन के राजा हुसैन की मृत्यु से तीन सप्ताह पहले इस पद से हटा दिया गया था, उन्होंने पाकिस्तान के पहले विदेश सचिव मोहम्मद इकरामुल्ला की बेटी सर्वथ इकरामुल्लाह से शादी की थी। और ये काफी दिलचस्प है, कि पूर्व भारतीय उपराष्ट्रपति मोहम्मद हिदायतुल्लाह (1979-84) इकरामुल्लाह के छोटे भाई थे। 15 अगस्त 2015 को हामिद गुल की मौत के बाद वर्मा ने यह अंश लिखा था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि, "इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के पूर्व प्रमुख जनरल हामिद गुल, जिनकी हाल ही में मृत्यु हो गई, उन्हें भारतीय मीडिया में एक राक्षस, भारत के खिलाफ आतंकवाद के प्रवर्तक और अपराधी के रूप में वर्णित किया गया है। फिर भी, उनके व्यक्तित्व का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे प्रकट करने की आवश्यकता है।"

ISI ने मानी आतंकवाद की बात
उन्होंने लिखा कि, "इन बैठकों में जो समझौते किए गये थे, उनके जरिए भारत और पाकिस्तान के बीच कई अहम विवादों का समधान हो जाता है, जिनमें सियाचीन और एलओसी जैसे मुद्दे भी थे। इन समझौतों से भारत और पाकिस्तान के बीच विश्वास की बहाली को बल मिलता।" उन्होंने अपने आर्टिकिल में लिखा कि, "इस बैठक के शुरू होने से पहले तत्कालीन आईएसआई चीफ हामिद गुल ने इस बात को साफ तौर पर स्वीकार किया था, कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, क्योंकि वो भारत के विशाल आकार से डरता है। उन्होंने कहा था कि, पाकिस्तान जैसे छोटे देश में विश्वास जगाना भारत की जिम्मेदारी है"। वप्पला बालचंद्रन ने अपनी किताब इंटेलिजेंस ओवर सेंचुरीज में इसका खुलासा किया है और उन्होंने लिखा है कि, वर्मा ने अपने ऑप-एड लेख में इसका उल्लेख नहीं किया था, लेकिन उन्होंने मुझे यह उस समय बताया था, जब मैं उनके चीफ स्टाफ ऑफिसर के रूप में काम कर रहा था।

क्यों नहीं अंजाम तक पहुंचा समझौता?
वप्पला बालचंद्रन ने अपनी किताब में लिखा है कि, "इससे पहले कि दोनों देशों की सरकारें इस बैठक के समझौते के मुताबिक होने वाले लाभों को हासिल करने के लिए कदम उठा पाती, पाकिस्तान में एक के बाद एक कई तरह की चीजें हो गईं। जैसे, जनरल जिया की संदिग्ध मौत हो गई और इस बैठक में अहम भूमिका निभाने वाले आईएसआई प्रमुख जनरल हामिद गुल को उनके पद से हटा दिया गया। इसके साथ ही, पाकिस्तान के तत्कालीन उच्चायुक्त नियाज नाइक की रहस्यमय मौत ने भारत में इस संदेह में योगदान दिया कि, पाकिस्तानी सेना ने इन सुलह के प्रयासों को तार-तार कर दिया है। इस वार्ता की पहल करने वाले जनरल जिया की 17 अगस्त 1988 को एक आतंकी घटना में मृत्यु हो गई थी। जिनके बाद प्रधानमंत्री बनी बेनजीर भुट्टो की सककार में जनरल हामिद गुल को 4 अक्टूबर 1989 को आईएसआई पद से हटा दिया गया।

कैसे पटरी से उतरी बातचीत?
भारतीय विदेशी खुफिया सेवा के प्रमुख ए.के. वर्मा ने अपने लेख में लिखा था कि, पाकिस्तान के तत्कालीन उच्चायुक्त नियाज नाइक, जो इन वार्ताओं के एकमात्र जानकार थे, उनकी भी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी। यानि, पाकिस्तान की तरफ से इस सीक्रेट डील में जितने भी लोग शामिल थे, सभी लोगों की संदिग्ध मौत हो गई और जब भारतीय पक्ष ने इन घटनाओं के बाद फॉलोअप लेने की कोशिश की, तो पाकिस्तान ने उनसे कहा कि, उनके पास इन गुप्त वार्ताओं पर कोई कागजात नहीं है। वर्मा ने 21 मई 1991 को राजीव गांधी के उस इंटरव्यू का हवाला दिया है, जो उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स के बारबरा क्रोसेट को दिया था। ये इंटरव्यू राजीव गांधी ने अपनी हत्या से कुछ घंटे पहले दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था, कि "हम कश्मीर पर समझौता करने का काफी करीब पहुंच गये थे, हमारे पास नक्शे और हस्ताक्षर करने के लिए सबकुछ तैयार था, और फिर उसे मार दिया गया।" वर्मा ने निष्कर्ष निकाला कि, "इस प्रकार यह स्पष्ट है, कि पाकिस्तानी जनरल भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नया चैप्टर खोलने से रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।"

डॉन की रिपोर्ट से भी अहम संकेत
वप्पला बालचंद्रन ने इसके पीछे अटल बिहारी बाजपेयी के पाकिस्तान दौरे का भी हवाला दिया है। उन्होंने लिखा है कि, बातचीत का अहम हिस्सा रहे पाकिस्तानी उच्चायुक्त नियाज नाइक की संदिग्ध परिस्थितियों में 8 अगस्त 2009 को मौत हो गई थी, लिहाजा ये कहना तो मुश्किल है, कि उनकी मौत को गुल-वर्मा सीक्रेट डील से जोड़ना सही होगा या गलत, लेकिन ये सच है, जिसका जिक्र पाकिस्तानी अखबार डॉन ने भी किया है, कि नियाज नाइक ने भारत की गु्प्त यात्रा की थी। वप्पला बालचंद्रन ने लिखा है कि, नियाज भारत के साथ गुप्त बातचीत में लगातार शामिल थे और वो बाजपेयी सरकार के साथ भी राजीव गांधी के वक्त के समझौते को रखना चाह रहे थे। वहीं, लुडविग मैक्सिमिलियन यूनिवर्सिटी के एक जर्मन लेखक हेन जी. किसलिंग, जिन्होंने आईएसआई का अब तक का सबसे प्रामाणिक इतिहास लिखा है, उन्होंने लिखा है कि, जनरल जिया के हरक्यूलिस सी-130 विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के पीछे अमेरिकी जांच दल ने इंजन खराबी बतायीा था, जबकि पाकिस्तान ने इसके पीछे एक आपराधिक कृत्य को जिम्मेदार बताया था। जिया उल हक की मौत को लेकर पाकिस्तान से ज्यादा रूचि अमेरिका की थी। उस समय अमेरिकी दूतावास में पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारी जनरल हर्बर्ट वासोम की भी पाकिस्तान के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ जनरल अख्तर और आठ पाकिस्तानी जनरलों के साथ मृत्यु हो गई थी।

जिया उल हक की संदिग्ध मौत
किसलिंग का कहना है कि, यह भारत में अमेरिकी राजदूत जॉन गुंथर डीन थे, जो इस बात को लेकर आश्वस्त थे, कि जिया उल हक की मौत पाकिस्तान की मदद से केजीबी और अफगान सीक्रेट सर्विस केएचएडी ने की थी और ये इंडियन-इजरायली प्लान के तहत किया गया था। उन्होंने लिखा है कि, "जब जॉन गुंथर डीन ने अपनी इस थ्योरी को सार्वजनिक कर दिया, तो अमेरिकी विदेश विभाग ने उन्हें अपनी रिपोर्ट वापस लेने का आदेश दिया, लेकिन जब उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया, तो उन्हें पागल घोषित कर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।" वहीं, साल 2012 में जब पी. चिदंबरम भारत के गृहमंत्री थे, उस वक्त उन्होंने एक एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश की थी और उन्होंने एक टीम का गठन किया था, जिसमे 24-25 मई 2012 को पाकिस्तान का दौरा किया था। इस टीम में तत्कालीन आईबी डायरेक्टर नेहचल संधू, सीबीआई डायरेक्टर ए.पी.सिंह और एनआईए डायरेक्टर एस. सी सिन्हा शामिल थे और इस टीम को लीड तत्कालीन गृह सचिव आर.के सिन्हा ने किया था, जो बाद में बीजेपी की सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी बना। हालांकि, ये कोई खुफिया प्रयोग नहीं था, लेकिन इस टीम के पाकिस्तान दौरे के दौरान क्या बातें हुई, इसका खुलासा आजतक नहीं हो पाया है।












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