अटल बिहारी बाजपेयी की बनाई इस 'महान विदेश नीति' का कैसे फायदा उठा रहे हैं नरेन्द्र मोदी?
कमला हैरिस, ऋषि सुनक, एंटोनियो कोस्टा, निक्ली हेली, प्रविंद जगन्नाथ, हलीमा याकूब, चंद्रिका प्रसाद संतोखी, इरफान अली... ये कुछ ऐसे नाम हैं, जो अलग अलग देशों में अपनी खास पहचान रखते हैं।
Indian Foreign Policy: कमला हैरिस, ऋषि सुनक, एंटोनियो कोस्टा, निक्ली हेली, प्रविंद जगन्नाथ, हलीमा याकूब, चंद्रिका प्रसाद संतोखी, इरफान अली... ये कुछ ऐसे नाम हैं, जो अलग अलग देशों में अपनी खास पहचान रखते हैं और अलग अलग देशों की राजनीति में शिखर पर हैं। लेकिन, इन सभी नेताओं में एक बात कॉमन है और वो ये बात है, कि इनकी जड़ें भारत से जुड़ी हुई हैं और इस बात को ये सभी नेता गर्व के साथ स्वीकार भी करते हैं। निक्की हेली और कमला हैरिस को छोड़कर इनमें से सभी प्रवासी भारतीय किसी ना किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष हैं और अपनी पहचान को अपना अस्तित्व बताते हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं, कि एक वक्त भारत की विदेश नीति में इन प्रवासी भारतीयों को लेकर कोई खास जगह नहीं थी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने सबसे पहली बार प्रवास भारतीयों से जुड़ने की विदेश नीति तैयार की थी, जिसका फायदा अब भारत को मिल रहा है और बाजपेयी की परंपरा को नरेन्द्र मोदी आगे बढ़ा रहे हैं।

बाजपेयी ने बनाई थी 'महान नीति'
अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल से पहले भारत की तरफ से प्रवासी भारतीयों से जुड़ने के सिलसिले की शुरूआत ठोस तौर पर नहीं हुई थी, लेकिन प्रवासी भारतीयों तक पहुंचने का एक मजबूत प्रयास तीन बार के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रमुख विरासतों में से एक है, जिसका फायदा अब भारत को मिल रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी ने एलएम सिंघवी की अध्यक्षता में सितंबर 2000 में प्रवासी भारतीयों पर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन कर इस संबंध में एक स्ट्रक्चर्ड नीति की नींव रखी थी। जब बाजपेयी के सामने इस नीति को कैबिनेट की बैठक के दौरान प्रस्तुत किया गया था, तो उन्होंने बिना किसी तरह का बदलाव किए उसकी मंजूरी दे दी थी और उसके बाद से ही भारत सरकार ने एक विस्तृत प्लान के साथ अलग अलग देशों में रहने वाले भारतीयों के साथ जुड़ने का सिलसिला शुरू किया था। बाजपेयी सरकार की उस विदेश नीति के बाद भारत सरकार ने प्रवासी भारतीय दिवस (पीबीडी), प्रवासी सम्मान पुरस्कार, ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (ओसीआई) और पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन (पीआईओ) कार्ड जैसे कार्यक्रम और योजनाओं की शुरूआत की थी।

सिंघवी कमेटी की रिपोर्ट से जुड़ा नाता
भारत के एक पूर्व राजनयिक आर. दयाकर ने इकोनॉमिक टाइम्स को दिए गये एक इंटरव्यू में इसका जिक्र करते बहुए कहा कि, "सिंघवी समिति की रिपोर्ट ने दुनिया भर में फैले विशाल भारतीय प्रवासी के साथ जुड़ने के लिए परिवर्तनकारी नीतियों का निर्माण किया। इसने भारतीय मूल के लोगों के साथ संबंधों को मजबूत करने में मदद की, जबकि उससे पहले जो जुड़ाव था, वो सिर्फ विदेशों में भारतीय मिशनों के कांसुलर अनुभागों तक ही सीमित था, जो मुख्य रूप से भारतीय पासपोर्ट धारकों के साथ जुड़े हुए थे।" आर. दयाकर भारतीय विदेश मंत्रालय के एनआरआई/पीआईओ विभाग का नेतृत्व करते थे और इस विभाग ने दुनियाभर के भारतीयों से जुड़ने की शुरूआत की। उन्होंने कहा कि नेपाल, नाइजीरिया और इथियोपिया सहित कई अन्य देशों ने बाद में अपने प्रवासी भारतीयों तक पहुंचने के लिए इन तर्ज पर नीतियां बनाईं।

इतने से ही नहीं रूके बाजपेयी
पूर्व भारतीय राजनयिक दयाकर ने कहा कि, "लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक ही ऐसी नीति बनाने तक नहीं रूके, जो भारतीय मूल के लोगों तक भारत की रणनीतिक पहुंच तक सीमित हो, बल्कि बाजपेयी ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों को अमूल्य संपत्ति माना और उन्होंने पहले और दूसरे प्रवासी भारतीय दिवस के दौरान महत्वपूर्ण प्रवासी भारतीयों से व्यक्तिगत संपर्क को जोड़ना शुरू किया। उन्होंने विदेश में रहने वाले गणमान्य भारतीयों को सम्मानित करना शुरू किया। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के एक प्रमुख होटल व्यवसायी माइक पटेल ने कहा कि, वाजपेयी की पहल से भारत और विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को काफी फायदा हुआ। उन्होंने कहा कि, "वार्षिक पीबीडी कार्यक्रमों ने हमें पहली बार न केवल भारत सरकार और भारतीय उद्योग के साथ जुड़ने का मौका दिया, बल्कि दुनिया भर के पीआईओ के साथ नेटवर्क बनाने का भी मौका दिया, जो विविधता और ज्ञान के धन का प्रतिनिधित्व करते हैं।"

भारतीय अर्थव्यवस्था को हुआ फायदा
पटेल ने कहा कि, "अचल बिहारी बाजपेयी को एशियन अमेरिकन होटल ओनर्स एसोसिएशन (एएएचओए) और अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडियन ओरिजिन जैसे संगठनों को गंभीरता से लेने और भारतीय अर्थव्यवस्था में हमारे लिए कई तरह से योगदान करने की क्षमता को पहचानने का श्रेय दिया जा सकता है।" उन्होंने कहा कि, "भारतीय उद्योग निकाय FICCI, जो पहले PBD के लिए भारत सरकार का भागीदार था, उसने भी भारतीय कंपनियों के साथ कॉर्पोरेट संबंध बनाने में हममें से कई लोगों की मदद की।" वहीं, ब्रिटेन में लिबरल डेमोक्रेट्स के उपनेता और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य लॉर्ड नवनीत ढोलकिया ने कहा कि, वह पीएम वाजपेयी से प्रवासी सम्मान पत्र प्राप्त करना अपने जीवन का सबसे बड़ा क्षण मानते हैं। अब मोदी सरकार भी उस नीति को आगे बढ़ा रही है।

बाजपेयी की परंपरा को आगे बढ़ाते मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिन देशों की भी यात्रा करते हैं, वहां रहने वाले प्रवासी भारतीयों से जरूर मुलाकात करते हैं। चाहे अमेरिका हो या जर्मनी या जापान या फिर नॉर्डिक देश या या फिर रूस, पीएम मोदी ने अपनी अधिकतर यात्राओं के दौरान प्रवासी भारतीयों को संबोधित किया है और उन्हें भारत का अभिन्न हिस्सा बताया है। इसका सबसे बड़ा फायदा ये हो रहा है, कि ये प्रवासी भारतीय अभी भी भारत के साथ अपने जुड़ाव को महसूस कर पाते हैं और भारत के साथ इमोशनली अटैच हैं। विदेशों में प्रवासी भारतीयों के मजबूत संगठन हैं और ये संगठन अपने प्रभाव का इस्तेमाल भारत की भलाई के लिए भी करते हैं। जैसे अमेरिका में भारतीय समुदाय की मजबूती का ही नतीजा है, कि अमेरिकी पॉलिसी में भारत की अहम छाप दिखाई देती है और बाइडेन प्रशासन में कई भारतीय मौजूद हैं, जो भारत के रास्ते में आने वाले खतरों के सामने ढाल की तरह खड़े हो जाते हैं। जैसे, जब अमेरिका में भारत के खिलाफ रूस से एस-400 मिसाइस खरीदने के लिए प्रतिबंध लगाने की मांग की जा रही थी, उस वक्त भारतीय मूल के सांसद रो खन्ना ने हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में भारत को प्रतिबंध से बचाने वाला बिल ना सिर्फ पेश किया, बल्कि उसे पास भी करवाया, जिससे भारत पर लटक रहा प्रतिबंध का तलवार अब हट चुका है।

दुनिया में उच्च पदों पर भारतीय
मोदी सरकार भारतीय मूल के लोगों से उनके एक भारतीय होने की हैसियत से मुलाकात करते हैं और उनसे राजनीतिक संबंध जोड़ते हैं और यही वजह है, कि कमला हैरिस अभी भी दिवाली के मौके पर अपने दादा के साथ भारत के तमिलनाडु में दिवाली मनाने की कहानी सुनाती हैं, तो पुर्तगाल के प्रधानमंत्री गोआ आकर अपनी पुश्तैनी घर को देखकर इमोशनल हो जाते हैं। फिलहाल इस वक्त दुनिया के सात देशों की कमान भारतीय मूल के लोगों के हाथ में है। पुर्तगाल के प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा, मॉरिशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ, सिंगापुर की राष्ट्रपति हलीमा याकूब, सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी, गुयाना के राष्ट्रपति इरफान अली, सेशल के राष्ट्रपति वावेल रामकलावन भारतीय मूल के हैं और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब भी इन नेताओं से मुलाकात करते हैं, तो उनके भारतीय पहचान के साथ उनसे जुड़ते हैं। जैसे जब पीएम मोदी ने सेशल के राष्ट्रपति वावेल रामकलावन से एक वर्चुअल बैठक में मुलाकात की, तो उनके बिहार के साथ रिश्ते को उन्हें याद दिलाया। सेशल के राष्ट्रपति वावेल रामकलावन का मूल बिहार के गोपालगंज से जुड़ा है, जिसका जिक्र पीएम मोदी ने किया था।












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