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कैसे तालिबान की सेवा में लेट गया पाकिस्तान ? अमरुल्ला सालेह ने बताया

पंजशीर, 25 अगस्त: काबुल पर तालिबान के कब्जे से पहले ही अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भले ही अपनी जान बचाकर भाग गए हों, लेकिन वहां के कार्यकारी राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह आतंकवादियों के सामने अभी भी डटे हुए हैं। वो पंजशीर की खौफनाक घाटियों में रहकर ही तालिबान से लोहा लेने की कोशिश कर रहे हैं। अब जबकि काबुल तालिबान के नियंत्रण में है, फिर भी सालेह को अपने अफगानी सैनिकों पर गर्व है। वह अभी भी कह रहे हैं कि तालिबान को रोकने के लिए सरकार जो कुछ कर सकती है, वह करती रहगी। सालेह ने एक इंटरव्यू में जो कुछ कहा है उससे पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिकी प्रशासन की भी पोल खुल गई है।

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    अमरुल्ला सालेह ने बताया अफगानिस्तान के साथ क्या हुआ ?

    अमरुल्ला सालेह ने बताया अफगानिस्तान के साथ क्या हुआ ?

    अफगानिस्तान में क्या हुआ ? कैस दुनिया के सुपरपावर अमेरिका से इतनी बड़ी खुफिया चूक हुई? कैसे उसे पाकिस्तान के कारनामों की भनक नहीं लगी? इसके बारे में सीएनएन-न्यूज18 ने अफगानिस्तान के कार्यकारी राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह से बात की है। उन्होंने अफगान सरकार के नियंत्रण वाले आखिरी किले पंजशीर घाटी से जो कुछ कहा है, उससे भारत का वह दावा और पुख्ता हुआ है कि पाकिस्तान की सरकार नीतिगत तौर पर आतंकवादी ताकतों की सहायता करती है। उन्होंने लंबी बातचीत में अफगानिस्तान की बर्बादी के चार मूल कारण बताए हैं। उनके मुताबिक तालिबान कभी भी दबाव में रहा ही नहीं, क्योंकि उसने पाकिस्तान को अपने आधार के तौर पर इस्तेमाल किया।

    कैसे तालिबान की सेवा में लेट गया पाकिस्तान ?

    कैसे तालिबान की सेवा में लेट गया पाकिस्तान ?

    सालेह ने कहा है कि पूरा पाकिस्तान तालिबान की सेवा में बिछ गया था। अमेरिका सहयोग के लिए पाकिस्तान को पैसे देकर उसे खरीदने की कोशिश करता रहा, लेकिन उसे जितने ही ज्यादा फंड दिए गए, वह उतना ही ज्यादा तालिबान की सेवा में उसे लुटाता रहा। एक परमाणु शक्ति संपन्न देश अफगानिस्तान में आतंवाद को बढ़ावा दे रहा है, इसपर पश्चिम के सहयोगी देशों ने कभी ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने दूसरा कारण ये बताया है कि दोहा बातचीत ने तालिबान को वैद्यता दे दी, जो कभी भी अपनी बातों का पक्का नहीं रहा है। उन्होंने कभी भी अपने वादे को नहीं निभाया और पूरी दुनिया को मूर्ख बनाया। दोहा का मकसद ही यही था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को विभाजित कर दिया जाए और उनमें उस शांति प्रक्रिया की उम्मीद जगाई रखी जाए, जो कि कभी थी ही नहीं।

    अमेरिका भी है अफगानिस्तान का गुनहगार!

    अमेरिका भी है अफगानिस्तान का गुनहगार!

    तीसरे कारण में उन्होंने अमेरिका की भी पोल खोल दी है। उन्होंन कहा है कि पिछले दो वर्षों में हमारे अमेरिकी सहयोगी ने हमपर बहुत ज्यादा दबाव बनाया था। उन्होंने हमारे साथ ब्लैकमेल किया कि या तो कैदियों को रिहा कर दें या फिर हम सहायता में कटौती कर देंगे और मिलिट्री सहायता भी कम कर देंगे। हमने उनसे कहा कि उन्हें यकीन है कि ये लोग हमारे सामने नहीं खड़े होंगे? उनका जवाब था नहीं, लेकिन सब हमारे सामने खड़े हो गए। मतलब यह बंदियों की रिहाई नहीं थी, यह तालिबान को कट्टर लड़ाकों की पूरी फौज गिफ्ट देने की तरह था।

    अफगान सरकार में कई लोग हालात से बेखबर रहे

    अफगान सरकार में कई लोग हालात से बेखबर रहे

    सालेह के अनुसार अफगान सरकार पर तालिबान के आतंकियों के भारी पड़ने का कारण ये था कि उनकी सरकार में ऐसे लोग भी थे, जिन्हें हालात की जानकारी नहीं थी और सबकुछ हल्के में ले रहे थे। उन्होंने यह भी कहा है कि इस त्रासदी को सिर्फ इन्हीं चार कारणों तक ही सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि और भी कई वजहें हैं, जिसके चलते अफगानिस्तान का पतन हुआ है। उन्होंने कहा है कि हकीकत ये है कि नाटो जा चुका है, अमेरिकी सेना जा चुकी है, लेकिन अफगानिस्तान की जनता यहीं है, उन्हें नहीं निकाला जा सकता।

    आज हक्कानी काबुल को चला रहे हैं......सालेह

    आज हक्कानी काबुल को चला रहे हैं......सालेह

    अफगानिस्तान के कार्यकारी राष्ट्रपति का कहना है कि उनके देश को तबाही में धकेल दिया गया है और आतंकी समूहों ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। उदाहरण लिए आज एक मनी लॉन्ड्रर जो अल-कायदा से हमदर्दी रखने वालों और तालिबान के बीच लेन-देन की सुविधा उपलब्ध करवा रहा था, वह अफगानिस्तान केंद्रीय बैंक का गवर्नर बन गया है, हक्कानी काबुल को चला रहे हैं....कहने की जरूरत नहीं है कि हक्कानी कौन हैं? यह शर्मनाक और विश्वासघात है और मैं उस शर्म और विश्वासघात का हिस्सा नहीं बनना चाहता।

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