ईरान-इजराइल संघर्ष पर भारत का समझदारी वाला फैसला! मिडिल ईस्ट की डिप्लोमेसी में क्या किए 4 बदलाव?
India on Israel-Iran Crisis: पिछले एक दशक में देखा जाए, तो मिडिल ईस्ट वो क्षेत्र है, जहां भारत की डिप्लोमेसी ने सबसे ज्यादा कामयाबी हासिल की है, लेकिन इस क्षेत्र में उतनी ही ज्यादा चुनौतियां और इस वक्त इस क्षेत्र की दो बड़ी शक्तियां युद्ध के बिल्कुल मुहाने पर खड़ी हैं। लिहाजा, एक बार फिर नई दिल्ली के आगे डिप्लोमेटिक चुनौतियां आ गई हैं।
इजराइल के खिलाफ ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद भारत सरकार की तरफ से जारी बयान में तत्काल तनाव कम करने का आह्वान किया गया था। इसके अलावा, 7 अक्टूबर को जब हमास ने दक्षिणी इजराइल पर हमला किया था, उस वक्त भारत ने इजराइल के साथ उच्चतम स्तर पर एकजुटता दिखाई थी।

लेकिन, इस बार जब ईरान ने इजराइल पर हमला किया है, तो भारत के रूख में काफी बड़ा बदलाव देखा गया और भारत ने इजराइल पर ईरानी हमले कि निंदा भी नहीं की।
लिहाजा, यह विरोधाभास मिडिल ईस्ट के साथ भारत के डिप्लोमेटिक संबंधों में आए 4 बदलावों को उजागर करता है।
1- सबसे पहले, भारत ने हमास के इजराइल पर किए गये हमले की सख्त शब्दों में निंदा की, जबकि इजराइल पर ईरान के हमलों के बाद भारत ने डिप्लोमेटिक बातचीत का आह्वान किया, जो भारत सरकार की आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीति और दो राज्यों के संघर्ष के बीच किसी एक का रक्ष ना लेना की नीति को दर्शाता है। तेहरान और तेल अवीव, दोनों के साथ द्विपक्षीय संबंधों में दिल्ली का दांव बहुत बड़ा है और उनमें से किसी एक को चुनने का सवाल कभी नहीं रहा है।
ईरान ने यह साफ कर दिया है, कि दमिश्क में उसके दूतावास पर इजरायली हमले के खिलाफ उसकी जवाबी कार्रवाई अब पूरी हो गई है, जिससे भारत को उम्मीद होगी, कि ईरान के खिलाफ इजराइल कोई नहीं कर्रवाई नगीं करेगा। जो क्षेत्र में एक खतरनाक और व्यापक युद्ध को जन्म दे सकता है। यदि 7 अक्टूबर को भारत को "इजरायल का पक्ष" लेते हुए देखा गया था, तो इस बार भारत ने संयम बरतने का आग्रह किया है, जो भारक की "संतुलित" और क्षेत्रीय शांति के पक्ष में दिखाता है।
2- इजराइल और ईरान के बीच के तनाव को बगैर निंदा किए कम करने का आह्वान करना, बताता है कि भारत ने मिडिल ईस्ट की जटिल राजनीति को बेहतरीन अंदाज में पहचान लिया है। इतिहास बताता है, कि भारत की क्षेत्रीय नीति, पश्चिम और मध्य पूर्व के बीच विरोधाभासों के संदर्भ में तैयार की गई थी। लेकिन आज, दिल्ली क्षेत्र के आंतरिक विरोधाभासों पर ना सिर्फ अपना ध्यान देती है, बल्कि अपने हितों को देखते हुए फैसले करती है।
मिडिल ईस्ट में चप्पे-चप्पे पर संघर्ष है और उस संघर्ष को टालते हुए अपने हितों को साधने के लिए भारत ने अब प्रमुख क्षेत्रीय अभिनेताओं - मिस्र, ईरान, इजराइल, कतर, तुर्की, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात - के साथ अपने जुड़ाव को संतुलित कर लिया है। इन सभी देशों के बीच आपसी संघर्ष, आपकी प्रतिस्पर्धा और आपसी जुड़ाव अलग अलग हैं, जिससे यहां की डिप्लोमेसी फिसलन वाली होती है, लेकिन भारत ने हर देश के साथ अलग अलग रिश्ते बनाए हैं और अपने हितों को सबसे आगे रखा है। लिहाजा, भारत के एक देश के साथ संबंध को लेकर, किसी दूसरे देश को दिक्कत नहीं होती।

3- भारत का तनाव कम करने का आह्वान यह भी बताता है, कि भारत अब समझ चुका है, कि मध्य पूर्व की डिप्लोमेसी के सेंटर में धर्म एक प्रमुख फैक्टर नहीं है। अतीत में, कांग्रेस सरकारों पर मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होने का आरोप लगाया गया था। विडंबना यह है, कि इजरायल के प्रति एनडीए सरकार की गर्मजोशी को भी धार्मिक चश्मे से देखा गया है।
आज कई दक्षिणपंथी मानते हैं, कि भारत को किसी भी हाल में इजराइसल का समर्थन करना चाहिए। जबकि, कई लोगों को मानना है, इजराइल के लिए भारतीय ससंर्थन ऑटोमेटिक है। यह वामपंथियों की पिछली स्थिति की दर्पण छवि है, जो मानती थी कि भारत की क्षेत्रीय नीति डिफ़ॉल्ट रूप से इजराइल विरोधी है। जबकि, मौजूदा एनडीए सरकार संकेत दे रही है, कि उसका दृष्टिकोण पहले से तय नहीं किया जा सकता है, और भारत अपने हितों को देखते हुए फैसला लेता है।
4- मिडिल ईस्ट में भारत की डिप्लोमेसी का नया अध्याय non-ideological engagement है। यानि, विचारधारा से अलग विदेश नीति। इस क्षेत्र में भारत के हित अब तेल आयात और श्रम निर्यात तक सीमित नहीं हैं। बल्कि, खाड़ी अरब देश - विशेष रूप से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात - भारत के लिए प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक भागीदार बनकर उभरे हैं।
खाड़ी देशों के साथ भारत की साझेदारी और भागीदारी अब इंडो-पैसिफिक और हिंद महासागर में विस्तार ले चुकी है। और सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, भारत के साथ मध्य पूर्व यूरोप कॉरिडोर (आईएमईसी) को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जो आज भारत का ड्रीम प्रोजेक्ट बन चुका है।
वहीं, ईरान के साथ भी भारत के कारोबारी रिश्ते छिपे नहीं है। भारत जितना इजराइल के करीब रहा है, उससे कम करीब ईरान से भी नहीं है।
लिहाजा, मिडिल ईस्ट की राजनीति से निपटना साधारण दिमाग वाले या कमजोर दिल वालों के बस की बात नहीं है। मध्य पूर्व में बढ़ते दांव के साथ एक बड़े पड़ोसी के रूप में, दिल्ली इस क्षेत्र के अंतहीन संघर्ष से निपटना तेजी से सीख रही है।
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