सियाचिन ग्लेशियर के रक्षक ओपी बाबा... दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान में कैसे ऑपरेशन करती है इंडियन आर्मी?
Siachen News: विश्वास पहाड़ों को हिला सकता है, और यह विश्वास ही है, जो भारतीय सेना के जवानों को सियाचिन ग्लेशियर के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करता है, जहां सबसे बड़ा दुश्मन, खतरनाक मौसम और जोखिम भरा इलाका है।
दिलचस्प बात यह है, कि ओपी बाबा सियाचिन ग्लेशियर के 'रक्षक देवता' हैं और सबसे चुनौतीपूर्ण सैन्य चौकी पर तीन महीने के खतरनाक कार्यकाल के दौरान सैनिकों की मदद करते हैं।

सियाचिन, जिसे 'तीसरे ध्रुव' के नाम से जाना जाता है, वो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बाहर दुनिया का सबसे ऊंचा ग्लेशियर है। हालांकि, सियाचिन का शाब्दिक मतलब "गुलाबों का स्थान" होता है। लेकिन, यह दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र के रूप में जाना जाता है। 13 अप्रैल 2024 को सियाचीन ग्लेशियर पर भारतीय सेना के अधिकार के 40 साल पूरे हो गये हैं, जब इंडियन आर्मी ने 'ऑपरेशन मेघदूत' चलाकर रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले सियाचिन ग्लेशियर पर 1984 में अपना कंट्रोल स्थापित किया था।
दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध का मैदान
साल 2003 से सियाचिन ग्लेशियर में बंदूकें खामोश हैं, लेकिन यह भारतीय सैनिकों के लिए सबसे कठिन पोस्टिंग में से एक होता है। जवानों को सिर्फ तीन महीने के लिए ही सियाचिन ग्लेशियर में तैनात किया जाता है, क्योंकि वैज्ञानिकों का कहना है, कि उस ऊंचाई पर 90 दिन रहने से किसी भी जवान के जीने की क्षमता को कम से कम पांच साल कम कर देते हैं।
उस ऊंचाई पर जवानों के लिए सांस लेना भी चुनौतीपूर्ण होता है। यहां का मौसम ऐसा होता है, कि धूप के संपर्क में आने से भी शरीर के कुछ हिस्से झुलस सकते हैं, और ठंड से भी शरीर जल सकते हैं। बर्फ से उछलती सूरज की किरणें स्नो ब्लाइंडनेस का कारण बन सकती हैं। ज्यादातर सैनिक अनिद्रा की शिकायत करते हैं, जिसके लिए डॉक्टर ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक ठंड को जिम्मेदार मानते हैं।
चूल्हे से खाना उतारते ही खाना ठंडा हो जाता है और जवानों के लिए अपना चेहरा धोना भी दुर्लभ माना जाता है। यहां पानी पीने के लिए बर्फ को उबाला जाता है, जिसके लिए मिट्टी के तेल का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, उसके बाद भी यहां सैनिक मजबूती से डटे रहते हैं, और इस क्षेत्र में दो सालों के कार्यकाल पर भेजे गये सैनिकों की कम से कम तीन महीने के लिए यहां ड्यूटी लगाई जाती है।
काफी ज्यादा ऊंचाइयों पर भूख कम लगने की वजह से सैनिकों का वजन कम हो जाता है, और जब वे वापस लौटते हैं, तो उनका शरीर पीला पड़ चुका होता है। लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद, उन्हें 'ओपी बाबा' पर अटूट विश्वास है।

कौन हैं ओपी बाबा, क्यों हैं इतना विश्वास?
सियाचिन के सैनिकों के बीच ये कहानी प्रसिद्ध है, कि एक तोपखाना सैनिक ओम प्रकाश को 1980 के दशक के अंत में उत्तरी ग्लेशियर के बिला कॉम्प्लेक्स में मलौन पोस्ट पर गश्त पर भेजा गया था। वहां उन्होंने मालौन पोस्ट पर दुश्मन के हमले को अकेले ही नाकाम कर दिया था, जबकि सैनिकों को अस्थायी रूप से पीछे हटने के मुख्यालय में बुलाया गया था। सैनिक ओम प्रकाश का शव कभी नहीं मिला, और वह कभी वापस नहीं लौटे। सिपाही ओम प्रकाश के साथ क्या हुआ, ये अभी भी रहस्य बना हुआ है।
ग्लेशियर पर तैनात सैनिकों को मजबूती से यकीन है, ओपी बाबा उन्हें न केवल प्रकृति के विनाश से बचाते हैं, बल्कि उनके सपनों में आकर उन्हें पहले से ही चेतावनी देकर दुश्मन से भी बचाते हैं। ओपी बाबा को लेकर आस्था इतनी मजबूत है, कि सियाचिन बेस कैंप में ट्रेनिंग के बाद कोई भी सैनिक ओपी बाबा का आशीर्वाद लिए बिना फॉरवर्ड पोस्ट के लिए रवाना नहीं होता है।
सियाचिन बेस कैंप में ट्रेक की शुरुआत से पहले ओपी बाबा की मंदिर बनाई गई है।

ग्लेशियर पर सैनिक दल के शामिल होने से पहले आज तक इस परंपरा का पालन किया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारी उन्हें सैनिकों की ताकत बताते हैं, और देवता को उनकी देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके बाद, सैनिक तीन बार "ओपी बाबा की जय" (जय ओपी बाबा) का नारा लगाते हैं।
ओपी बाबा की कथा ने सैनिकों के बीच इतनी आस्था पैदा कर दी है, कि ग्लेशियर में हर पोस्ट पर एक छोटा सा मंदिर बनाया गया है। जब भी सैनिकों का कोई दल किसी पोस्ट से निकलता है, या किसी अन्य पोस्ट पर सुरक्षित पहुंचता है, तो ओपी बाबा को एक रिपोर्ट पेश की जाती है।
सियाचिन ग्लेशियर पर रहने के दौरान अपने तीन महीने के कार्यकाल के दौरान सैनिक शराब और तंबाकू का सेवन छोड़ देते हैं।
सियाचिन बेस कैंप में, ओपी बाबा का मंदिर ग्लेशियर के मुहाने से कुछ ही मीटर की दूरी पर है, जहां यह पिघलकर नुब्रा नदी बन जाता है। यह मंदिर 1996 में बनाया गया था और हर धर्म के लोग बाबा की पूजा अर्चना करते हैं। हर धर्म की रेजिमेंट महान सैनिक का आशीर्वाद लेने के लिए यहां झुकती हैं।
कई तरह की कहानियां सियाचिन ग्लेशियर का हिस्सा हैं।
सियाचिन बेस कैंप के एक पहाड़ पर मौजूद एक छायाचित्र को वहां तैनात सैनिकों, "लेडी ऑफ सियाचिन" कहते हैं। और उनका मानना है, कि किसी भी महिला को वहां तैनात नहीं किया जा सकता है। लेकिन, 2023 में पहली बार कैप्टन शिवा चौहान को सियाचिन ग्लेशियर पर ऑपरेशनल रूप से तैनात किया गया और वो पहली अधिकारी बनीं, जिन्हें सियाचिन भेजा गया। वह करीब 15,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित कुमार पोस्ट पर तैनात थीं।
सियाचिन ग्लेशियर पर कैसी होती है जिंदगी?
भारतीय सेना के जवान अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर सियाचिन ग्लेशियर में काम करते हैं और तैनाती से पहले सैनिकों को काफी खतरनाक ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वो वहां रह सकें। फेफड़ों को ज्यादा ऊंचाई पर रहने के लिए उन्हें ऑक्सीजन की कमी का आदी करवाया जाता है, उन्हें मानसिक तौर पर मजबूत किया जाता है। उनके शरीर की त्वचा को इतनी भीषण ठंड झेलने के लायक तैयार किया जाता है।
सैनिक दुनिया की सबसे ऊंची मिलिट्री ट्रेनिंग एकेडमी में पर्वतारोहण का ट्रेनिंग लेते हैं। यह प्रशिक्षण ही है, जो खतरनाक ऊंचाइयों पर सैनिकों की जान बचाता है। उसके बाद भी, जितने समय तक सैनिक यहां तैनात रहते हैं।
उन ऊंचाइयों पर सैनिकों को सूखे मेवे और चॉकलेट सहित विशेष राशन प्रदान किया जाता है। हालांकि, भूख की कमी और भीषण सर्दियों का मतलब है, कि चॉकलेट इतनी ज्यादा जम जाती है, कि उन्हें खाना भी मुश्किल हो जाता है। अपनी पोस्ट पर ट्रैकिंग करते समय, चार सैनिकों को एक साथ बांधा जाता है, ताकि वो एक दूसरे का सहारा बन सकें। ये रस्सियां, गहरी दरारों और अन्य खतरनाक इलाकों से गुजरते समय सैनिकों की जान बचाने के लिए होती हैं।
सियाचिन में कैसे उड़ान भरते हैं हेलीकॉप्टर?
चेतक/चीता (फ्रांसीसी मूल के ऑलौटे III हेलीकॉप्टर) ग्लेशियर में सैनिकों के लिए जीवन रेखा हैं। 1985- 2003 के बीच, सियाचिन ग्लेशियर एक सक्रिय युद्धक्षेत्र था, जिसमें पाकिस्तानी तोपखाने लगातार भारतीय चौकियों को निशाना बना रहे थे। यह, कठोर मौसम के साथ मिलकर, पायलटों के लिए उड़ान की स्थिति को कठिन बना देता है। लिहाजा, हेलीकॉप्टर दोपहर के बाद इस क्षेत्र में उड़ान नहीं भरते जब तक कि कोई आपात स्थिति न हो।
पायलट अक्सर माचिस के आकार के हेलीपैड पर उतरते हैं, जहां लैंडिंग के बाद महज कुछ इंच जगह बचती है। हेलिकॉप्टर अपनी उड़ान के किनारे पर उड़ते हैं, और पायलट अस्थायी हेलीपैड पर उतरते हैं। लोडिंग और अनलोडिंग जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी की जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में, हेलीकॉप्टरों ने निकासी के लिए प्राथमिकताएं निर्धारित करने के लिए एक कोड विकसित किया है। P-1 गंभीर रूप से घायल सैनिकों के लिए, P-II कम जरूरी मरीजों के लिए, P-III अधिकारियों को ऊपर और नीचे भेजने के लिए, और P-IV उन लोगों को निकालने के लिए है, जो ग्लेशियर से बच नहीं सकते थे। जब निकासी की बात आती है, तो जीवित लोगों को हमेशा मृतकों पर प्राथमिकता दी जाती है।
सियाचिन ग्लेशियर पर एक और किंवदंती यह है, कि कर्नल नरेंद्र 'बुल' कुमार की बर्फ-कुल्हाड़ी, जिन्होंने ट्रैकिंग के लिए भारतीय क्षेत्र में सियाचिन ग्लेशियर खोला था, वो ग्लेशियर पर एक अभियान के दौरान खो गई थी। और जब तक कुल्हाड़ी बरामद नहीं हो जाती, भारतीय सेना बर्फीली चोटियों की रक्षा करने के लिए बाध्य है।
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