Pakistan Election: पाकिस्तान की राजनीति की जड़ में है वंशवाद.. जानें दो परिवारों के पास ही कैसे रही है सत्ता?
Pakistan election 2024: पाकिस्तान में अगली राष्ट्रीय सरकार के लिए आज मतदान हो रहा है। पाकिस्तान के करीब 12 करोड़ 85 लाख मतदाता राष्ट्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों का चुनाव करने के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं।
लेकिन, क्या आप जानते हैं, कि भारत की तरह पाकिस्तान में भी परिवारवाद की राजनीति होती है और देश की सत्ता राजनीतिक राजवंशों के ही हाथों में डोलती रहती है। लाहौर से सिंध तक, कुछ प्रभावशाली परिवार पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य पर हावी रहते हैं।

पाकिस्तान में परिवारवाद
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान में राजनीतिक सत्ता अक्सर विशेष परिवारों के कुछ चुनिंदा लोगों के हाथों में केंद्रित रही है। अरब न्यूज के मुताबिक, पाकिस्तान के दो मुख्य वंशवादी परिवार पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ का शरीफ कबीला और भुट्टो परिवार हैं, जिन्होंने दशकों तक दक्षिणी सिंध प्रांत पर शासन किया है।
नवाज शरीफ और भुट्टो परिवार के वंशज बिलावल भुट्टो-जरदारी दोनों इन आम चुनावों में प्रधान मंत्री पद के लिए ताल ठोक रहे हैं।
1990 के दशक के दौरान, सैन्य शासन के अलावा, देश में राजनीतिक सत्ता, शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के बीच ही ट्रांसफर होती रही है। इन दोनों परिवारों के अलावा पहली बार सत्ता इमरान खान के हाथों में पहुंची थी, जब वो साल 2018 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि, 2022 में शरीफ परिवार और भुट्टो परिवार ने हाथ मिला लिए और इमरान खान को अविश्वास परिवार के जरिए सत्ता से बाहर कर दिया गया।
हालांकि, अरब न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा में फ्रेजर वैली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ. हसन जाविद के शोध के अनुसार, पंजाब में 2018 के चुनावों में इमरान खान के 80 प्रतिशत जीतने वाले उम्मीदवार वंशवादी परिवारों से थे।
इमरान खान, जो अब जेल में हैं और इन चुनावों को लड़ने से प्रतिबंधित हैं, उनको युवा मतदाताओं ने उन राजनीतिक राजवंशों या सैन्य प्रतिष्ठानों के विकल्प के रूप में देखा, जो पाकिस्तान के अधिकांश स्वतंत्र इतिहास में सत्ता में रहे हैं।

पाकिस्तान के राजवंशीय परिवार
नवाज शरीफ़, जिनके देश की सेना के आशीर्वाद से चौथी बार पाकिस्तान के प्रधान मंत्री बनने की पूरी उम्मीद है, वो पंजाब के एक धनी व्यापारिक परिवार से आते हैं। वह लाहौर और मनसेहरा से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके भाई पूर्व प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ लाहौर और कसूर से चुनाव लड़ रहे हैं।
नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज और शहबाज शरीफ के बेटे हमजा शाहबाज शरीफ को लाहौर से मैदान में उतारा गया है।
दिवंगत प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी सिंध और पंजाब से चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी पार्टी पीपीपी ने 2008 से सिंध पर तीन बार शासन किया है। इस बार, पीपीपी ने प्रांत में राष्ट्रीय और प्रांतीय विधानसभा चुनावों के लिए 191 उम्मीदवार खड़े किए हैं। अरब न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से अधिकांश उम्मीदवार सिंध के 12 प्रमुख राजनीतिक परिवारों से हैं।
पीपीपी के सह-अध्यक्ष आसिफ अली जरदारी भी चुनावी रेस में हैं, जबकि उनकी बहनों - शहीद बेनजीराबाद और फरयाल तालपुर को भी टिकट दिया गया है।
बीएनएन ब्रेकिंग के अनुसार, गफ्फार खान के परिवार का खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में दबदबा है, जिसमें उनके बेटे खान अब्दुल वली खान और पोते असफंदयार वली प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
मौलाना मुफ्ती महमूद का परिवार, अटक के खटर, बलूचिस्तान के मेंगल, बुगती और चौधरी पाकिस्तान में कुछ अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रीय खिलाड़ी हैं।
देश के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में दशकों से परिवारों या जनजातियों द्वारा शासन किया जाता रहा है। अरब न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, प्रांत से आम चुनाव लड़ने वाले 442 उम्मीदवारों में से अधिकांश आदिवासी और अच्छी तरह से स्थापित राजनीतिक पृष्ठभूमि से हैं।

वंशवाद की राजनीति क्यों पनपी?
विश्लेषकों का मानना है, कि पाकिस्तान में राजनीतिक दलों के भीतर लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमी के कारण वंशवादी राजनीति पनपती है।
पाकिस्तानी पत्रकार फ़ाज़िल जमीली के अनुसार, चुनावी राजनीति में केवल कुछ वंशवादियों के हावी होने के कारण, राजनीतिक दलों के जमीनी स्तर के समर्थकों के लिए ज्यादा जगह नहीं है जो जनता से "अधिक जुड़े हुए हैं और बेहतर सेवा कर सकते हैं"। जामिली ने अरब न्यूज़ को बताया, "परिणामस्वरूप, यह लोगों को अमीर या अभिजात वर्ग पर निर्भर बनाता है, जो लोगों की समस्याओं को उनके बीच के किसी व्यक्ति की तरह नहीं समझ सकते हैं।"
पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शाहजेब जिलानी ने अरब न्यूज़ को बताया, कि वंशवादी राजनीति दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में मौजूद है। उन्होंने कहा, कि "यह पाकिस्तान में भी सच है। सिंध में यह सबसे ज्यादा हावी है क्योंकि पिछले 15 वर्षों से प्रांत को एक ही परिवार (भुट्टो परिवार) की पार्टी चला रही है।"

पाकिस्तान की सेना की भूमिका भी बड़ी है। डॉ. जाविद ने अरब न्यूज से कहा, कि "पाकिस्तानी समाज से वंशवादी राजनीति को खत्म करने के लिए सैन्य प्रतिष्ठान का राजनीतिक हस्तक्षेप समाप्त होना चाहिए। न केवल बलूचिस्तान के आदिवासी समाज में, बल्कि सिंध और पंजाब प्रांतों में भी, जहां लोगों पर शासन करने वाले राजनीतिक राजवंश समुदाय और जातीय-आधारित राजनीति पर आधारित हैं।"
जिलानी के अनुसार, "हमें पिछले 75 वर्षों में लोकतंत्र के रूप में कार्य करने की अनुमति नहीं दी गई है। हमारे यहां तानाशाही थी, राजनीति में सेना का दखल है और इससे परिवारों को और अधिक गहराई तक स्थापित होने का मौका मिला है।"












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