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नेपाल में कैसे खत्‍म हुआ था राजा का शासन? दिल दहला देने वाले नरसंहार के बाद राजवंश का हो गया था अंत

Nepal Monarchy: नेपाल में एक बार फिर राजशाही की वापसी की मांग उठ रही है। हिंदू राष्‍ट्र रहे नेपाल में लोकतंत्र का उदय होते ही सेकुलर घोषित क‍र दिया गया था। वहीं एक बार फिर अब राजशाही समर्थक लोकतंत्र वयवस्‍था को खत्‍म करके शाही परिवार को सत्‍ता सौंपने की मांग कर रहे हैं। मांग की जा रही है कि फिर से नेपाल को हिंदू राष्‍ट्र घोषित किया जाए।

राजशाही की वापसी की मांग को लेकर लोग काठमांडु की सड़कों पर उतर आए और "राजा वापस आओ और देश बचाओ" के नारे लगाए। इसके बाद कुछ लोग अरेस्‍ट भी किए गए। आइए जानते हैं आखिर ऐसा क्‍या हुआ जिसके बाद नेपाल में राजा का शासन का अंत हो गया था?

Nepal Monarchy

नेपाल में 240 वर्षो तक रहा राजा का शासन

नेपाल एक ऐसा राष्ट्र है जहां पर 240 तक राजशाही रहा इसके बाद लोकतांत्रिक गणराज्य बना है। इस बदलाव में शाही परिवार का दिल दहला देने वाला नरसंहार और उसके बाद लोकतंत्र के लिए चुनौतियों सहित कई महत्वपूर्ण घटनाएं शामिल हैं।

नेपाल में शाह वंश का कब उदय था?

नेपाल में शाह वंश का शासन 1768 में पृथ्वी नारायण शाह के साथ शुरू हुआ, जिसने नेपाल को एकजुट किया और एक वंश की स्थापना की जो दो शताब्दियों से अधिक समय तक शासन किया। ब्रिटिशों के हाथों नेपाल को हुए नुकसान और आंतरिक सत्ता संघर्षों सहित चुनौतियों के बावजूद, राणाओं के अधीन नाममात्र की शक्ति के साथ शाहों ने अपना शासन बनाए रखा। 20वीं सदी में शाह सत्ता की बहाली और लोकतंत्र की शुरूआत हुई और राजा महेंद्र द्वारा 1960 में एक निरंकुश पंचायती प्रणाली के पक्ष में लोकतांत्रिक सरकार को भंग करने जैसी नाकामी भी मिली थी।

2001 में शाही परिवार में नरसंहार

नेपाल में 240 सालों तक चली राजशाही का पतन 1 जून, 2001 को शाही परिवार के नरसंहार के बाद हो गया था। एक ऐसी घटना जिसने देश को अराजकता में डुबो दिया और बड़े बदलावों के लिए मंच तैयार किया। क्राउन प्रिंस दीपेंद्र ने नशे की हालत में अपने परिवार के नौ सदस्यों की हत्या कर दी, जिसमें राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या भी शामिल थीं। सबको गोली मारने के बाद दीपेंद्र ने खुद भी गोली मार ली थी और 3 दिन बार उनकी भी मौत हो गई थी।

राजवंश का क्‍यों दीपेंद्र ने किया था खत्‍मा?

नेपाल का शाही परिवार का यह काला अध्याय, कथित तौर पर दीपेंद्र के जीवनसाथी की पसंद को लेकर एक व्यक्तिगत विवाद से उपजा, नेपाल के शाही शासन के अंत की शुरुआत थी।

2001 में राजपरिवार के नरसंहार के बाद नेपाल का ताज ज्ञानेंद्र शाह के हाथों में चला गया, जिनका शासन बढ़ती हुई सार्वजनिक अस्वीकृति और माओवादी विद्रोह के उदय से प्रभावित था।

2006 में नेपाल में लोकतंत्र का उदय

इस उथल-पुथल के इस दौर की परिणति 2006 में लोकतंत्र समर्थक जनक्रांति (जन आंदोलन-II) में हुई, जिसने राजा ज्ञानेंद्र को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। मई 2008 तक, राजतंत्र को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया और नेपाल को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया गया।

नेपाल में लोकतंत्र के उदय में भारत की भूमिका

नेपाल में जो कुछ हुआ उसमें भारत की भूमिका होने का भी दावा किया जाता रहा है। 1951 में राणाओं के खिलाफ राजा त्रिभुवन का समर्थन किया और 2008 में राजशाही के खात्मे में भूमिका निभाई। माओवादी नेता पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' के साथ भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के प्रभाव को अक्सर नेपाल को लोकतंत्र की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण माना जाता है, जिससे चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सके।

भारत और नेपाल के बीच संबंध

माओवादी विद्रोह के लिए भारतीय समर्थन के शुरुआती संदेह के बावजूद, माओवादियों को मुख्यधारा की राजनीति में फिर से शामिल करने में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण थी। हालांकि प्रचंड जैसे ही नेपाल के प्रधानमंत्री बने तो उन्‍होंने चीन की पहली विदेश यात्रा की, जो भारत के लिए झटका था और भारत के साथ संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया।

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