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स्पेस रेस में 'गुरू' रूस और सुपरपावर अमेरिका रह गए पीछे.. जानिए चीन कैसे बन गया अंतरिक्ष का सबसे बड़ा खिलाड़ी?

China US Russia Space Race: चीन के Chang'e 6 प्रोब ने दो जून को चंद्रमा के उस हिस्से में उतरने में कामयाबी हासिल कर ली, जो हिस्सा पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है और चीन अपने इस मिशन के जरिए चंद्रमा की मिट्टी को लाएगा, ताकि उसकी जांच की जा सके।

चीन के इस मिशन के बाद एक चीनी कॉमर्शियल प्रक्षेपण कंपनी ने 29 मई को सेरेस-1 ठोस रॉकेट के दूसरे समुद्री प्रक्षेपण के जरिए चार उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में भेजा। यह प्रक्षेपण 2024 में चीन का 25वां कक्षीय मिशन था। चीन के मुख्य अंतरिक्ष ठेकेदार ने इस वर्ष की शुरुआत में कहा था, कि देश 2024 में लगभग 100 प्रक्षेपणों की योजना बना रहा है, जिनमें करीब 30 कॉमर्शियल मिशन शामिल हैं।

china space mission

ऐसा कोई दिन नहीं है, जब चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम चर्चा में न हो। चीन अंतरिक्ष क्षेत्र में एक साथ कई मोर्चों पर तेजी से आगे बढ़ रहा है और ये मानने में कोई संकोच नहीं होनी चाहिए, कि कई मामलों में वो अमेरिका से भी आगे निकल रहा है। मई 2024 तक चीन के पास पहले से ही 600 से ज़्यादा ऑपरेशनल सैटेलाइट हैं। और चीन की सेना ने देश के स्पेस प्रोग्राम को आगे बढ़ाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

जनवरी 2024 तक, चीन ने 359 खुफिया सैटेलाइट का बेड़ा अंतरिक्ष में तैनात कर चुका है, जो 2018 के आंकड़ों से तीन गुना ज्यादा है और जिसका मकसद धरती की जासूसी करना है।

चीन की अंतरिक्ष प्रक्षेपण क्षमता

चीन का 'लॉन्ग मार्च' रॉकेट दुनिया के सबसे शक्तिशाली रॉकेटों में से हैं। लॉन्ग मार्च 5 (CZ-5) अधिकतम 25,000 किलोग्राम का पेलोड पृथ्वी की निचली कक्षा में और 14,000 किलोग्राम का पेलोड, जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट में ले जा सकता है।

आने वाले वर्षों में हजारों टन पेलोड लॉन्च करने के लिए, चीन 2035 तक अपने सभी रॉकेटों को पूरी तरह से फिर से इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है, ताकि लागत कम किया जा सके। वे सुपरहैवी-वेट रॉकेट पर भी काम कर रहे हैं, जो 150 टन पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) तक ले जाने में सक्षम हैं। वहीं, साल 2040 तक चीन की कोशिश फिर से इस्तेमाल करने लायक 80-टन LEO वैरिएंट रॉकेट का निर्माण करना है।

सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम

चीन के बेईदो सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम में 35 सैटेलाइट शामिल हैं और इसने संयुक्त राज्य अमेरिका के स्वामित्व वाले ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) के लिए वैकल्पिक वैश्विक नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के रूप में वैश्विक सेवाएं देनी शवुरू कर दी है।

ऐसा कहा जाता है कि बेईदो सैटेलाइट, एक मीटर के भीतर सटीकता के साथ पोजिशनिंग जानकारी प्रदान करने में सक्षम है, जबकि GPS की सटीकता तीन मीटर के भीतर है। चीन 5G ग्राउंड-आधारित इंटरनेट को चीन के बेईदो नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम द्वारा संचालित सैटेलाइट इंटरनेट के साथ एकीकृत करने पर काम कर रहा है।

चीन बना चुका है अपना स्पेस स्टेशन

चीन ने 2003 में पहली बार मनुष्यों को अंतरिक्ष में भेजा था और 2007 में एक मानवरहित एक्सप्लोरर भेजा था। वहीं, चीन ने अपना स्पेस स्टेशन भी तैयार कर लिया है, जो 60 टन वजनी है और इसका नाम 'तियांगोंग' है। इस स्पेस स्टेशन में 6 चालक दल के सदस्य रह सकते हैं।

वहीं, अप्रैल 2024 तक, बाईस चीनी नागरिक अंतरिक्ष में यात्रा कर चुके हैं। बीजिंग की व्यापक रणनीति का लक्ष्य 2030 के आसपास एक चीनी अंतरिक्ष यात्री को चांद पर चलते देखना है। वहीं, चीन की योजना चंद्रमा पर भी एक बेस बनाने की है। चीन के पास अपने चंद्रमा और मंगल लैंडर के लिए एक स्पष्ट समय सारिणी है।

इसके अलावा चीन, एडिशनल क्यूकियाओ और तियानडू सैटेलाइट्स के साथ एक सीआईएस-लूनर रिले आर्किटेक्चर भी बना रहा है। रूस और चीन ने 2035 तक चंद्रमा पर 'मानव रहित' एक साझा परमाणु रिएक्टर बनाने की योजना की घोषणा की है। चीन अंतरिक्ष से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए एक ऑर्बिटल सोलर पावर प्लांट की भी योजना बना रहा है।

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एंटी-सैटेलाइट क्षमता

चीन ने अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए सभी संधियों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं, लेकिन अमेरिका का कहना है, कि चीन का स्पेस मिशन काफी खतरनाक है।

अमेरिका ने ऐसा दावा इस आधार पर किया था, क्योंकि साल 2007 में चीन ने अपने एक पुराने और निष्क्रीय मौसम सैटेलाइट को नष्ट करने के लिए एंटी-सैटेलाइट हथियार (ASAT) का इस्तेमाल किया था और उसके बाद से चीन लगातार, 'ग्राउंड-बेस्ड मिडकोर्स मिसाइल इंटरसेप्शन तकनीक' कहे जाने वाले मिसाइल को बेहतर बनाने के लिए और भी कई परीक्षण किए हैं।

कुछ विश्लेषकों का मानना ​​है, कि चीनी सेना अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स को उड़ाने के लिए हथियारों का निर्माण कर चुकी है और ऐसी टेक्नोलॉजी का और विकास कर रही है। 2022 में चीनी सैटेलाइट को एक अन्य लंबे समय से मृत उपग्रह को पकड़ते हुए और कुछ दिनों बाद इसे 300 किमी दूर एक "कब्रिस्तान" कक्षा में फेंकते हुए देखा गया था, जहां वस्तुओं के अंतरिक्ष यान से टकराने की संभावना कम होती है।

ऐसी क्षमता का इस्तेनमाल, किसी भी विरोधी देश के उपग्रह को रास्ते से हटाने या निष्क्रिय करने के लिए किया जा सकता है। एंटी-सैटेलाइट न्यूक्लिर टेक्नोलॉजी, साइबर-इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (ईडब्ल्यू) के खतरों की संभावना को काफी ज्यादा बढ़ाता है। रूस भारी ऊर्जा तरंगों के साथ उपग्रहों को नष्ट करने के लिए परमाणु अंतरिक्ष हथियार भी विकसित कर रहा है, जो दुनिया के लिए चिंता की बात है।

स्पेस को हथियारों से लैस कर रहा है चीन

चीन पहले ही "फ्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम" (FOBS) का प्रदर्शन कर चुका है, जिसमें एक हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन एक चुने हुए जमीनी लक्ष्य पर हमला करता है। यानि. चीन स्पेस से धरती पर सैटेलाइट से हमला कर सकता है।

FOBS एक डेटरेंट स्ट्रैटजी का हिस्सा हो सकता है और कम समय में, किसी भी दिशा से, अंतरिक्ष से पृथ्वी पर कहीं भी लक्ष्य पर हमला करने में सक्षम हो सकता है। जब इसे परमाणु हथियार की हाइपरसोनिक डिलीवरी के साथ जोड़ा जाता है, तो यह बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा को और भी जटिल बना देगा। बैलिस्टिक मिसाइल से हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV) या मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता, और HGV एक हथियार होने के नाते, ये चीन को काफी खतरनाक बना देता है।

HGV वो टेक्नोलॉजी है, जिससे चीन सैटेलाइट के जरिए धरती पर चलने वाले किसी लक्ष्य पर हमला कर सकता है।

इसके अलावा, चीन ने रेंडेजवस और प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशन (RPO) में शानदार क्षमता दिखाई है। तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन को असेंबल करने से पहले रेंडेजवस क्षमता की जांच करने के लिए कई छोटे प्रयोग किए गए थे। RPO पूरी तरह से सैन्य इस्तेमाल के लिए है। चीन ने LEO (लोअर ऑर्बिट) और GEO (भूस्थिर कक्षा) दोनों में उपग्रह-से-उपग्रह RPO गतिविधियों का प्रदर्शन किया है।

कितना आगे निकल चुका है चीन का स्पेस प्रोग्राम

अब तक चीन, अंतरिक्ष में उन उपलब्धियों की नकल कर रहा था, जो अमेरिका और रूस पहले ही हासिल कर चुके थे। लेकिन, अब चीन ने नए मानक स्थापित करने शुरू कर दिए हैं। चीनी एयरोस्पेस उद्योग को पहले से ही समुद्र विज्ञान, सूचना नेटवर्क, जीवन विज्ञान और परमाणु प्रौद्योगिकी के साथ एक 'रणनीतिक उभरता हुआ उद्योग' करार दिया गया है।

चीन अंतरिक्ष पैमाने पर क्वांटम प्रयोगों (QUESS) में अग्रणी देशों में से एक है। और यह जून 2017 में लॉन्च किए गए 'हार्ड एक्स-रे मॉड्यूलेशन टेलीस्कोप-HXMT' का उपयोग करके डार्क मैटर पर रिसर्च कर रहा है।

अंतरिक्ष आधारित सौर ऊर्जा प्रणाली का परीक्षण, जो पृथ्वी पर ऊर्जा वापस भेज सकती है, वो भी विकसित कर रहा है। चीन अंतरिक्ष प्रक्षेपण और अंतरिक्ष सेवाओं को एक उभरता हुआ व्यवसाय बनाना चाहता है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग, चीन और अमेरिका के बीच व्यापार गतिरोध के प्रभावों को बेअसर करना चाहते हैं। अंतरिक्ष की रेस में, चीन चाहता है कि 2025 तक नागरिक अंतरिक्ष उद्योग के 80 प्रतिशत उपकरण घरेलू स्तर पर बनाए जाएं।

चीन की योजना, 2045 तक स्पेस सेक्टर में अपने गुरु रूस और सुपरपावर अमेरिका से काफी आगे निकल जाने की है।

लेकिन, तीनों बड़ी शक्तियां- अमेरिका, रूस और चीन - नई अंतरिक्ष संधियों को लागू करने और विकसित करने के बारे में ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं। पिछली बार अमेरिका-चीन अंतरिक्ष वार्ता 2017 में बीजिंग में हुई थी, और उसके बाद आगे कोई चर्चा नहीं हुई।

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क्या भारत के लिए खतरा बन सकता है चीन?

भारत ने भी स्पेस टेक्नोलॉजी के सभी पहलुओं और क्षेत्रों में महारत हासिल कर ली है, लेकिन चीनी खतरे को ध्यान में रखते हुए फिलहाल भारत की क्षमताएं काफी कम हैं। लेकिन, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करने की ज़रूरत नहीं है, उसे अपनी आर्थिक और सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए काम करना चाहिए।

चीन के पास पूरी तरह कार्यात्मक वैश्विक उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है, जबकि भारत की क्षेत्रीय प्रणाली, NavIC, अभी भी धीमी गति से प्रगति कर रही है।

हिमालय और उत्तरी हिंद महासागर तक चीन का अंतरिक्ष-आधारित ISR कवरेज बिना किसी रूकावट के जारी रहता है। लेकिन, स्ट्रैटजिक ऑपरेशन जरूरतों के लिए भारत को भी स्पेस कन्युनिकेश की रफ्तार को बढ़ावनी होगी और इसके लिए काफी संख्या में सैटेलाइट्स की जरूरत है और तब तक, हम विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहेंगे।

इसके अलावा, भारतीय सेना को ज्यादा से ज्यादा उपग्रहों की मांग करनी चाहिए और सरकार से अतिरिक्त आवश्यकताओं के लिए धन प्राप्त करना चाहिए। सुरक्षित उपग्रह-आधारित संचार एक और क्षेत्र हैं, जहां चीन बहुत आगे है। चीन साइबर और इलेक्ट्रॉनिक हमलों में भी बहुत सक्षम है और उसके पास कई ASAT क्षमताएं हैं। अंतरिक्ष अंतिम सीमा है। हालांकि, भारत भी अच्छी स्थिति में है, लेकिन उसे प्रमुख ऑपरेशनल क्षमताओं में ज्यादा निवेश करने की आवश्यकता है, नहीं तो भारत काफी पीछे रह जाएगा।

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