China tuition: चीन में ट्यूशन पढ़ाने पर प्रतिबंध, सरकार का फैसला बच्चों के लिए कैसे बना खतरनाक?
China tuition ban Fail: चीन की कम्युनिस्ट सरकार, अपनी सख्त शासन व्यवस्था के लिए जानी जाती है और सरकार ने अपनी 1 अरब 40 करोड़ की आबादी पर नजर रखने के लिए करोड़ों सीसीटीवी कैमरे भी लगवाए हैं, बावजूद इसके शिक्षा माफिया पर लगाम लगाने में शी जिनपिंग का प्रशासन फेल हो गया है।
चीन की सरकार ने छात्रों पर शैक्षणिक बोझ को कम करने और सामाजिक समानता को प्रोत्साहित करने के मकसद से दो साल पहले स्कूल के बाद निजी ट्यूशन पर प्रतिबंध लगा दिया था। जुलाई 2021 में चीन की सरकार ने फैसला लिया था, कि 16 साल के कम उम्र के छात्रों को छुट्टियों के दौरान या हर हफ्ते होने वाली छुट्टी के दौरान ट्यूशन नहीं पढ़ाया जा सकता है और ऐसा करना दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया, लेकिन इसका नतीजा ये निकला, कि चीन में कुकुरमुत्तों को तरह अवैध ट्यूशन क्लासेस चलने लगी हैं।

चीन में ट्यूशन पर प्रतिबंध फेल क्यों?
ट्यूशन माफिया पर लगाम लगाने के लिए चीन की सरकार ने सितंबर 2021 में निजी ट्यूटर्स को ऑनलाइन या अपंजीकृत स्थानों, जैसे आवासीय भवनों या होटलों में क्लासेस चलाने पर पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।
लेकिन, ऐसा लगता है, कि शी जिनपिंग का प्रशासन शिक्षा माफिया के आगे औंधे मुंह गिर गया है। जब से चीन ने निजी ट्यूशन क्षेत्र में कार्रवाई शुरू की है, माता-पिता के साथ-साथ ट्यूटर्स ने भी नियमों को दरकिनार करने का एक नया तरीका ढूंढ लिया है।
सीएनए के मुताबिक, ट्यूशन पर प्रतिबंध को चीन की सरकार ने 'शुआंग जियान' कार्यक्रम नाम दिया था, जिसका नाम होता है 'दोहरी कटौती', जिसका मकसद देश की कुख्यात प्रतिस्पर्धी शिक्षा प्रणाली के शिकार बच्चों पर दबाव कम करना था, लेकिन माता-पिता और ट्यूटर्स ने इसकी काट निकाल ली है।
ऑस्ट्रेलिया के एसबीएस न्यूज से बात करते हुए, प्रोफेसर एमेरिटस एंथनी वेल्च, जो सिडनी विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विशेषज्ञ हैं, ने बताया, कि चीनी समाज एक "टेस्ट कल्चर" के इर्द-गिर्द घूमता है, जहां "खराब स्कोर बच्चों के भविष्य को बर्बाद करने वाला माना जाता है।"
चीन की कॉलेज प्रवेश परीक्षा, जिसे झोंगकाओ के नाम से जाना जाता है, वहां प्रवेश के लिए काफी कठिन प्रतियोगिताओं से गुजरना पड़ता है। सीएनए की रिपोर्ट के मुताबिक, सीनियर हाई स्कूल प्रवेश परीक्षा या झोंगकाओ में प्राप्त ग्रेड यह निर्धारित करते हैं, कि छात्र शिक्षा जारी रख सकते हैं, व्यावसायिक स्कूल में शामिल हो सकते हैं या नहीं। कम स्कोर वाले छात्रों को एडमिशन नहीं मिलता है।
चीन के प्रोफेशनल कॉलेजों के साथ ये कलंक जुड़ा हुआ है, कि अच्छे नंबर वाले छात्रों को ही दाखिला मिलता है, लिहाजा माता पिता को टेंशन रहती है, कि उनके बच्चों को काफी अच्छे नंबर आए।

चीन का निजी शिक्षा क्षेत्र कैसा है?
एसबीएस न्यूज़ के मुताबिक, 1990 के दशक की शुरुआत में चीन में प्राइवेट टीचिंग को काफी महत्व दिया जाने लागे और ट्यूशन केन्द्रों पर छात्रों की भीड़ लगनी शुरू हो गई।
प्रतिबंध लगने से पहले, यानि जुलाई 2021 में चीन का प्राइवेट ट्यूशन इंडस्ट्री अनुमानित तौर पर 2 ट्रिलियन युआन, यानि करीब 310 अरब डॉलर का था।
ट्यूशन केन्द्रों ने बच्चों के सफल बनाने के नाम पर माता-पिता की चिंताओं से भयानक खिलवाड़ किया और सालों तक भारी मुनाफा कमाया। सीएनए की रिपोर्ट के अनुसार, होउ युक्सिन, जो निजी शिक्षा क्षेत्र से जुड़े थे, उन्होंने कहा, कि ट्यूशन केन्द्रों ने 'बच्चे पीछे छूट जाएंगे' का डर दिखाकर माता-पिता की भावनाओं से गंभीर खिलवाड़ किया और मोटा मुनाफा कमाया।
प्रतिबंध लगने के बाद लगा, कि शिक्षा माफिया पर लगाम लगा दिया गया है। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ।
प्रतिबंध लगने के 2 सालों के बाद, प्रतिबंध का कैसा असर हुआ है, इसकी पड़ताल में पता चला, कि इस सेक्टर के आगे चीन की सरकार का सख्त शासन मॉडल भी फेल साबित हुआ है।
प्रतिबंधों के बाद, ट्यूशन केंद्रों के लिए कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया गया, जबकि मौजूदा ट्यूशन कंपनियों को खुद को गैर-लाभकारी संस्थान घोषित करने या फिर लाइसेंस रद्द करने का दबाव बनाया गया।

अंडरग्राउंड चलने लगे ट्यूशन संस्थान
प्रतिबंध के बावजूद, कई ट्यूशन कंपनियों ने गुप्त रूप से ट्यूशन पढ़ाने का काम जारी रखा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब स्थिति ये हो गई है, कि अंडरग्राउंड ट्यूशन सेंटर्स, माता-पिता से और भी ज्यादा पैसा वसूलने लगे हैं।
सरकारी स्कूलों में जो शिक्षा व्यवस्था है, उससे माता-पिता असंतुष्ट रहते हैं, लिहाजा अब वो निजी ट्यूशंस पर और भी ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं।
अब स्थिति ये हो गई है, कि अमीर परिवार ही बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी ट्यूशन संस्थानों का खर्च उठा सकते हैं और उन्हीं के बच्चे अब परीक्षाओं में आगे पढ़ने लगे हैं और गरीब बच्चों को इससे भारी नुकसान होना शुरू हो गया है।
पहले निजी ट्यूशन संस्थानों में जो क्लासेस चलती थीं, उनमें भारी संख्या में छात्र रहते थे, लेकिन अब प्रतिबंधों के बाद क्लासेस में काफी कम छात्रों को रखा जाता है, ताकि प्रशासन को पता नहीं चले, लिहाजा कम छात्रों से ज्यादा फीस वसूला जाता है।
सीएनए ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, बीजिंग और शंघाई जैसे शहरों में प्रति घंटे एक छात्र की फीस 3 हजार युआन यानि 430 डॉलर यानि करीब 34 हजार भारतीय रुपया हो गया है। यानि, एक घंटे की ट्यूशन फीस करीब 34 हजार भारतीय रुपये हो चुका है। जाहिर है, गरीब मां-बाप इतना पैसा खर्च नहीं कर सकते हैं।
सिक्स्थ टोन के लेख के मुताबिक, जुलाई 2022 में बीजिंग में एक माता-पिता, जो अपनी बेटी के अंग्रेजी ट्यूशन सेंटर को प्रति वर्ष करीब 20,000 युआन का भुगतान करते थे, उन्हें अब निजी कक्षाओं के लिए दोगुना से तीगुना तक भुगतान करना होता है।
हालांकि, अब जब प्रतिबंध के 2 साल हो चुके हैं और इसका असर खराब ही हुआ है, तो स्थानीय प्रशासन पर सख्त कार्रवाई करने के लिए दबाव डाला जा रहा है और पिछले कुछ दिनों में 77 छापेमारियां की गईं हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है, कि स्थानीय प्रशासन की जेब में इतना पैसा डाला जाता है, कि उनके हाथ बंध गये हैं।












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