18 साल की अफगान लड़की खालिदा का दर्द, कैसे बनूंगी डॉक्टर ? सब कुछ तो जल गया

काबुल, 15 अगस्त: फिर तलिबान का शोषण और अत्याचार झेलना पड़ेगा। यह सोच कर अफगानी औरतों के शरीर झुरझुरी दौड़ रही है। दो दशक पुरानी दोजखभरी जिंदगी वे भूली नहीं हैं। जिन प्रांतों पर तलिबान कब्जा जमा रहा है वहां जुल्म की शुरुआत हो भी चुकी है। एक औरत को इस लिए गोलियों से भून दिया गया क्योंकि उसने चुस्त ड्रेस पहन रखी थी। अब लड़कियां अपनी मर्जी से न पढ़ पाएंगी, न पहन पाएंगी, न जी पाएंगी। मौजूदा लड़ाई के दरम्यान हाल ही में 18 साल की खालिदा ने अमेरिकी साप्ताहिक अखबार क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर को बताया था कि वह डॉक्टर बनना चाहती थी। लेकिन तालिबानियों ने उसके हाईस्कूल की इमारत को बम और रॉकेट लॉन्चरों से उड़ा दिया। अब उसका सपना पूरा नहीं हो सकता। तालिबानी आधुनिक स्कूलों को नेस्तनाबूद कर उसकी जगह धार्मिक पढ़ाई को बढ़ावा देना चाहते हैं। मेरी जैसी कई लड़कियां पढ़ लिख कर आगे बढ़न चाहती थीं लेकिन अब यह मुमकिन नहीं होगा। एक बार फिर हम लड़कियों को घरों में कैद कर सैकड़ों बंदिशें थोप दी जाएंगी। फिर वही घुटन। फिर वहीं अंधेरा। यह सही है कि तालिबान के उदय के पहले अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति बहुत बेहतर थी। वे पढ़ाई और सरकारी नौकरी के मामले में पुरुषों से आगे थीं। लेकिन तलिबानियों के आते ही उनका जीवन नर्क हो गया।

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    कभी अफगानिस्तान में था औरतों का जलवा

    कभी अफगानिस्तान में था औरतों का जलवा

    अफगानिस्तान में 1996 से लेकर 2001 तक तालिबान का शासन था। अमेरिका के विदेश विभाग ने 2001 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था- तालिबान्स वार अगेंस्ट वीमेन। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 1990 के दशक के शुरू में अफगानिसतान में सत्तर प्रतिशत महिलाएं स्कूल शिक्षक के रूप में कार्यरत थीं। कुल शिक्षकों में केवल 30 फीसदी ही पुरुष थे। कुल सरकारी कर्मचारियों में आधी महिलाएं थीं। तब काबुल में 40 फीसदी डॉक्टर महिलाएं हुआ करती थीं। यहां महिलाओं को 1920 में वोट देने का अधिकार मिल चुका था। 1960 में अफगानी महिलाओं को संवैधानिक स्तर पर बराबरी का दर्जा प्राप्त हो गया था। लेकिन तालिबान के शासन आते ही सब कुछ बदल गया। लड़कियों और महिलओ को घरों कैद कर दिया गया। उनकी पढ़ाई बंद हो गयी। महिला यूनिवर्सिटी को बंद कर दिया गया। सरकारी दफ्तरों में काम करने वाली सभी औरतों को निकाल दिया गया। सात साल की एक लड़की को सार्वजनिक रूप से केवल इस लिए बेंत से पिटाई की गयी क्यों कि उसने सफेद जूते पहन लिये थे। बच्चों को पतंग उड़ाने और गीत गाने पर रोक लगा दी गयी।

    15 साल का तालिबानी भी बेरहम और बर्बर

    15 साल का तालिबानी भी बेरहम और बर्बर

    इस रिपोर्ट में एक घटना का जिक्र है। एक महिला का छोटा बच्चा बहुत बीमार था। एक तंबू में उसकी जिंदगी कट रही थी। उसके बच्चे को रह रह कर बुखार आ जाता था। तालिबानियों के आने के पहले वह बड़े आराम से अस्पताल जा कर अपने बच्चे का इलाज करा लेती थी। लेकिन अब कई तरह के प्रतिबंध लग गये थे। उस औरत का कोई पुरुष रिश्तेदार नहीं था। अगर वह किसी दूसरे पुरुष के साथ अस्पताल जाती तो दोनों भयंकर दंड के भागी बनते। अगर वह अकेले जाती तो भी दंड के रूप में बेंत से पिटाई होती। उसके पास पूरा शरीर ढकने वाला बुरका भी नहीं थी। लेकिन उसे अपने बच्चे से बहुत प्यार था। बच्चे की जान की खातिर उसने अस्पताल जाने का जोखिम उठाया। उसने तंबू के कपड़े को ही बुरके की तरह अपने शरीर पर लपेट लिया। उसने बच्चे को गोद में उठाया और अस्पताल चल पड़ी। जब वह बाजार के करीब पहुंची तो उसे 14-15 साल के एक तालिबानी हथियारबंद गार्ड ने देख लिया। इस किशोर गार्ड ने महिला को रोका। लेकिन महिला ने यह सोचा कि वह इस बच्चे (गार्ड) की अनदेखी कर निकल जाएगी। लेकिन जैसे ही वह आगे बढ़ी उस छोटे से हथियाबंद लड़के ने फायरिंग शुरू कर दी। महिला अपने बच्चे को लिए जमीन पर गिर पड़ी। तालिबानी फरमान के मुताबिक इस महिला को अकेले बाहर नहीं निकलना चाहिए था। यह बीस साल पुरानी बात है।

    जब खालिदा के डॉक्टर बनने का टूट गया सपना

    जब खालिदा के डॉक्टर बनने का टूट गया सपना

    जुलाई-अगस्त 2021 में एक बार फिर वैसे ही हालात हैं। बमों के धमाके, गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच जिंदगी और मौत की जंग जारी है। अफगानिस्तान का उत्तरी इलाका। फरयाब प्रांत के गांवों में तालिबानी दाखिल हो चुके हैं। हाईस्कूल में पढ़ने वाली खालिदा रात को अपने घर में सोयी हुई है। आधी रात को उसकी नींद तब खुल जाती है जब वह जोर का एक धमाका सुनती है। वह अपने घर की छत से देखती है तो उसकी स्कूल की इमारत से आग की ऊंची ऊंची लपटें निकल रही हैं। यह देख कर वह रोने लगती है। उसके सामने ही उसके उसके अरमान जल रहे थे। वह पढ़ने लिखने में बहुत होशियार थी। डॉक्टर बनने के सपने बुन रही थी। शिक्षक भी उसे होनहार छात्रा मानते थे। इस स्कूल को नॉर्वे और अमेरिका ने मिल कर बनाया था। बहुत बड़ी लाइब्रेरी थी। साइंस की एक से बढ़ कर एक किताबें थीं। कम्प्यूटर लैब था। इतनी सहूलियतें देख कर खालिदा बहुत खुश रहती थी। वह डॉक्टर बनने के लिए मन लगा कर पढ़ाई कर रही थी। लेकिन तालिबानियों ने उसके सपने को जला कर राख कर दिया। जब बमों के धमाके से स्कूल में आग लगी तो आसपास के लोगों ने उसे बुझाने की कोशिश की। लेकिन तालिबानी सैनिकों ने उन पर गोलियां चलानी शुरू कर दी। कुछ लोग मारे भी गये। तालिबानी आधुनिक स्कूलों के खिलाफ थे। सुबह जब वह स्कूल के पास गयी तो वहां केवल राख और मलबा था। खालिदा यह सब देख कर फिर रोने लगी। उसने सुबकते हुए कहा, क्या कोई ऐसा नहीं है जो हमें इस अंधेरे से बाहर निकाल सके ?

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