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भारत ने क्या चीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया है?

कीर्ति दुबे

बीबीसी संवाददाता

भारत-ताइवान
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भारत-ताइवान

भारत के साथ अपने आर्थिक रिश्ते बढ़ाते हुए ताइवान ने मुंबई में अपना नया आर्थिक कार्यालय खोलने का एलान किया है.

ताइवान का भारत में ये तीसरा कार्यालय है, दिल्ली और चेन्नई में पहले से ही ताइवान के ऐसे कार्यालय मौजूद है.

ताइवान के विदेश मंत्रालय ने इसे लेकर जारी बयान में कहा है कि मुंबई में 'ताइपेई इकॉनमिक एंड कल्चर सेंटर' (टीइसीसी) खोला जाएगा.

इसे ताइवान के कूटनीतिक क़दम के रूप में देखा जा रहा है.

ताइवान और भारत के बीच राजनयिक संबंध नहीं है क्योंकि भारत चीन की 'वन चाइना पॉलिसी’ मानता है. इसलिए ताइवान ने भारत में व्यापार करने के लिए ताइपेई इकॉनमिक एंड कल्चर सेंटर खोला है, दूतावास ना होने की सूरत में ये सेंटर ही ताइवान के दूतावास की तरह काम करते हैं.

ताइवान को चीन अपना हिस्सा मानता है. ताइवान को दुनिया का कोई भी देश स्वतंत्र देश के तौर पर देखने की कोशिश करता है तो चीन उसे बर्दाश्त नहीं करता है.

कहा जाता है कि अब तक दिल्ली में ताइवान का दफ़्तर दूतावास की तरह काम करता रहा है और चेन्नई का दफ़्तर वाणिज्य दूतावास की तरह काम करता रहा है.

ताइवान के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को जारी अपने बयान में कहा, “हाल के सालों में चीन गणराज्य (ताइवान) और भारत के बीच आर्थिक मोर्चे, व्यापार, विज्ञान-तकनीक, सप्लाई चेन, शिक्षा संस्कृति और पारंपरिक औषधि सहित कई क्षेत्रों में सहयोग काफ़ी बढ़ा है.”

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ताइवान ने मुंबई को क्यों चुना?

मुंबई में सेंटर खोलने की वजह को बताते हुए ताइवान ने कहा है, “साल 2022 में भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन कर उभरा है. इस साल भारत सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन गया है. दुनिया भर के देशों के लिए भारत निवेश का बड़ा ठिकाना बन चुका है. मुंबई भारत का सबसे बड़ा शहर है और देश की वित्तीय राज़धानी भी है, यहाँ बड़ा बंदरगाह भी है. अमेरिका, जापान, ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों ने अपना वाणिज्य दूतावास मुंबई में बनाया है.”

कूटनीतिक रिश्ते ना होने के बावजूद ताइवान ने दिल्ली में 1995 में पहला 'ताइपेई इकॉनमिक एंड कल्चर सेंटर’ खोला और ताइवान में 'इंडिया ताइपेई असोसिएशन’ की शुरुआत हुई. साल 2012 में दूसरा सेंटर चेन्नई में खोला गया और इसके बाद दक्षिण भारत में ताइवान का निवेश बढ़ा.

चेन्नई में ट्रेड दफ़्तर खोलने के बाद से ही मुंबई में भी दफ़्तर खोलने को लेकर बातचीत चल रही थी.

बयान में कहा गया है कि ये दफ़्तर व्यापार को बढ़ावा देने के साथ साथ ताइवान के लिए वीज़ा देने और भारत में रह रहे ताइवान के लोगों या ताइवान जा रहे भारतीय लोगों की भी मदद करने का काम करेगा.

मोदी-जिनपिंग
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मोदी-जिनपिंग

भारत-ताइवान के बीच बढ़ते व्यापार का चीन पर असर

भारत-चीन के बीच साल 2020 से पहले जो रिश्ते थे और आज जो हालात हैं, उनमें ज़मीन-आसान का अंतर आ चुका है.

साल 2018 और साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक मुलाक़ात वुहान और महाबलीपुरम में हुई थी.

इन बैठक में दोनों नेताओं के बीच खुल कर बातचीत हुई और इसे लेकर दोनों देशों ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया था.

लेकिन साल 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई झड़प से रिश्तों में आ रही गर्मजोशी पर विराम लग गया.

भारत और चीन के बीच संंबंधों में अब भी तनाव है और सरहद पर दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने हैं. ऐसे वक़्त में भारत में ताइवान की बढ़ती मौजूदगी और भारत का इस मौजूदगी को स्वीकार करना काफ़ी मायने रखता है.

भारत और ताइवान के बीच बढ़ते सहयोग को चीन कैसे देख रहा है?

दिल्ली स्थित स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीन के मामलों के विशेषज्ञ डॉ फ़ैसल अहमद कहते हैं, “ ताइवान के संदर्भ में भारत चीन की 'वन चाइना पॉलिसी’ को मानता है. ऐसे में अगर यहाँ ताइवान व्यापार बढ़ाता है तो इससे चीन को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. चीन ख़ुद भी ताइवान के साथ व्यापार करता है, ऐसे में उसे ताइवान के किसी देश से व्यापार सहयोग बढ़ाने से परहेज़ क्यों होगा.''

''ताइवान ऐसे ही ट्रेड ऑफ़िस दुनिया के कई देशों में खोल चुका है और ये उन देशों में ताइवान के दूतावास की तरह काम करते हैं. आज अगर किसी को ताइवान जाना है तो ये इकॉनमिक एंड कल्चर सेंटर ही वीज़ा जारी करता है. ताइवान आर्थिक रूप से स्वतंत्र देश है और वो अपनी आर्थिक क्षमता को मज़बूत करने के लिए ऐसे क़दम उठाता रहा है. ऐसे में एक और ट्रेड ऑफ़िस खुलने से कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला है.''

अहमद कहते हैं कि सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच जो विवाद है उस पर चीन और भारत सैन्य स्तर पर बातचीत कर रहे हैं. कई दौर की बातचीत दोनों देशों के बीच हो चुकी है.

भारत ने अब तक चीन को लेकर ना तो बहुत बदलाव अपनी नीतियों में किया है और ना ही आगे करने वाला है. चीन को लेकर भारत धीमी और सधी रणनीति अपनाता है और वो ऐसा ही कर रहा है.

इस साल अप्रैल में कार्नेगी इंडिया में लिखे गए एक लेख में भारत के पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने भारत-ताइवान के रिश्तों को लेकर लिखा था, “ ताइवान स्ट्रेट को लेकर भारत अपनी नीतियों में काफ़ी सतर्क रहता है. ताइवान में किसी भी तरह का संघर्ष, या गंभीर तनाव भारत के व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा ख़तरा पैदा कर सकता है.”

डॉ. अहमद भी इसी बात को दोहराते हैं और कहते हैं कि "भारत व्यापार के मामले में चीन पर बहुत निर्भर है ऐसे में वो ऐसा कोई क़दम नहीं उठाएगा, जिससे उसे बड़ा नुकसान हो जाए. ताइवान का ये एलान भी कोई नया क़दम नहीं है."

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ताइवान की नई साउथबाउंड नीति में भारत की जगह

साल 2016 में ताइवान की साई इंग वेन सरकार नई साउथबाउंड पॉलिसी लेकर आई.

इसका उद्देश्य ताइवान का दक्षिण एशियाई देशों, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों के साथ साझेदारी बढ़ाना और आर्थिक रूप से ख़ुद को मज़बूत करना है.

दरअसल, ताइवान चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) को ख़ारिज़ करता है और अपनी अर्थव्यवस्था को अपनी शर्तों पर विकसित करने के लिए उसने अपनी नीति बनाई.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के एक लेख में कहा गया है, “ताइवान की नई साउथबाउंड नीति का मक़सद दक्षिण पूर्व एशिया के बजाय दक्षिण एशिया और विशेष रूप से भारत के साथ ताइवान के संबंधों को विकसित करना है. ऐसा माना जाता है कि आसियान देशों के साथ ताइवान का आर्थिक और व्यापारिक आदान-प्रदान उस स्तर तक पहुँचने वाला है कि अब उसमें और अधिक बढ़ोतरी की गुंजाइश नहीं बची है. इसलिए, अब ताइवान की विदेश और आर्थिक नीति का रुख़ भारत की ओर होगा.”

“ताइवान की नई साउथबाउंड नीति के प्रमुख समर्थकों में से एक और न्यू साउथबाउंड पॉलिसी ऑफिस के पूर्व निदेशक और ताइवान फॉरेन ट्रेड असोसिएशन के अध्यक्ष जेम्स सी.एफ. हुआंग का दावा है कि- भारतीय बाज़ार में वह सब कुछ है, जो अगले 20 सालों में ताइवान के उद्योगों के विकास के लिए ज़रूरी है.”

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भारत और ताइवान के बीच कितना व्यापार

ताइवान की कंपनी फॉक्सकॉन एपल की सबसे बड़ी सप्लायर है. इसकी एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चेन्नई में है. कर्नाटक में कंपनी एक और ऐसी ही यूनिट खोलने की योजना बना रही है और उम्मीद है कि अगले साल अप्रैल में यह खुल जाएगी.

भारत और ताइवान के बीच साल 2021 तक के आंकड़ों के मुताबिक़ लगभग 7 अरब डॉलर का व्यापार है.

ये व्यापार इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनों के उपकरणों के क्षेत्र में सबसे ज़्यादा है.

यह आंकड़ा दोनों देशों के कुल विदेशी व्यापार का छोटा सा हिस्सा है, ये ताइवान के कुल विदेशी व्यापार का मात्र 0.9 फ़ीसदी है और भारत का 0.8 फ़ीसदी है. ऐसे में दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ने की काफ़ी गुंजाइश है.

ताइवान भारत में निवेश करने वाले कुल 116 देशों में से 32वें नंबर पर है.

ताइवान की सबसे बड़ी ताक़त है, उसका सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के सामान और मशीनरी जो उसे तकनीक की दुनिया में काफ़ी महत्वपूर्व व्यापार साझेदार बनाता है. ख़ास कर सेमीकंडक्टर जो किसी भी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का 'मस्तिष्क' कहलाता है.

दुनियाभर में तीन खरब डॉलर का इलेक्ट्रॉनिक्स का बाज़ार है और इसमें 500 से 600 अरब डॉलर का बाज़ार सेमीकंडक्टर का है. सेमीकंडक्टर के कुल वैश्विक बाज़ार के 65 फ़ीसदी हिस्से का उत्पादन अकेले ताइवान करता है.

भारत अगर तकनीक की दुनिया में लंबी छलांग लगाना चाहता है तो इसके लिए ताइवान के साथ व्यापार बढ़ाना बेहतर साबित हो सकता है.

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चीन और ताइवान के बीच विवाद क्या है?

चीन जब भी किसी देश के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करता है तो उसकी सबसे अहम शर्त होती है 'वन चाइना पॉलिसी' यानी जो देश चीन के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करेंगे वो ताइवान को एक अलग देश के रूप में मान्यता नहीं दे सकते बल्कि उसे चीन का हिस्सा मानेंगे.

चीन का कहना है कि ताइवान उसका हिस्सा है और चीन की एक ही सरकार है जो उसकी 'मेनलैंड' में है.

जिन 13 देशों के ताइवान के साथ राजनयिक संबंध हैं, वो हैं - बेलीज़, ग्वाटेमाला, पराग्वे, हेती, सेंट किट्स एंड नेवीज़, सेंट लूसिया, सेंट विन्सेंट एंड द ग्रेनडाइन्स, मार्शल आइलैंड्स, नाउरू, पलाउ, तुवालु, एस्वातिनी और वेटिकन सिटी.

ताइवान ख़ुद को एक स्वतंत्र देश मानता है, जिसका अपना संविधान और अपने चुने हुए नेताओं की सरकार है.

ताइवान एक द्वीप है जो चीन के दक्षिण-पूर्वी तट से लगभग 100 मील दूर है.

ये ''फ़र्स्ट आइलैंड चेन'' या ''पहली द्वीप शृंखला' नाम से कहे जाने वाले उन टापुओं में गिना जाता है, जिसमें अमेरिका के क़रीबी ऐसे क्षेत्र शामिल हैं जो अमेरिकी विदेश नीति के लिए अहम माने जाते हैं.

अमेरिका की विदेश नीति के लिहाज़ से ये सभी द्वीप काफ़ी अहम हैं.

चीन अगर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लेता है तो पश्चिम के कई जानकारों की राय में गुआम और हवाई द्वीपों पर मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने को भी ख़तरा हो सकता है.

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