रूस से लेकर फ्रांस तक, बड़े देशों की बांग्लादेश में अचानक दिलचस्पी क्यों बढ़ गई है?
भारत में हुए जी20 सम्मेलन में शरीक होने के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों रविवार को बांग्लादेश पहुंचे थे। यहां पर उनका भव्य स्वागत किया गया। द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 33 वर्षों में किसी फ्रांसीसी राष्ट्रपति की यह पहली बांग्लादेश यात्रा थी।
प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ढाका एयरपोर्ट पर मैक्रों का स्वागत किया। इस दौरान मैक्रों को थल सेना, नौसेना और वायु सेना की एक संयुक्त टुकड़ी ने द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया। मैक्रों बांग्लादेश का दौरा करने वाले दूसरे फ्रांसीसी राष्ट्रपति हैं।

मैक्रों की इस यात्रा और जी-20 सम्मेलन से ठीक पहले रूसी विदेश मंत्री भी बांग्लादेश दौरे पर थे। रूसी विदेशी मंत्री की ये यात्रा इसलिए खास थी क्योंकि सर्गेई लावरोव पांच दशक पहले 1971 में देश की आजादी के बाद बांग्लादेश की यात्रा करने वाले पहले वरिष्ठ रूसी अधिकारी हैं।
इस बीच सोशल मीडिया पर ऋषि सुनक की भी एक फोटो खूब वायरल हो रही है जिसमें वे बांग्लादेश की समकक्ष शेख हसीना के सामने घुटने पर बैठकर उनसे बात करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसमें सुनक की शालीलना की खूब प्रशंसा हो रही है वहीं, कुछ लोग इसे बांग्लादेश के बढ़ते प्रभाव के रूप में भी देख रहे हैं।
अब अचानक सवाल उठता है कि अचानक रूस लेकर फ्रांस की दिलचस्पी बांग्लादेश में क्यों बढ़ी है? विश्लेषक इसे क्षेत्र में बांग्लादेश के बढ़ते भू-राजनीतिक दबदबे के संकेतक, आर्थिक अप्रत्याशित लाभ के अवसर और जनवरी 2024 के आम चुनावों से पहले प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण बढ़ावा के रूप में देखते हैं।
लावरोव की इस यात्रा को रूस की भूराजनीतिक पहुंच का भी हिस्सा कहा जा सकता है क्योंकि वह यूक्रेन युद्ध के बाद आए अलगाव को दूर करने के लिए गठबंधन बनाने में जुटा हुआ है। बांग्लादेश न सिर्फ रूस के लिए एक महत्वपूर्ण भूराजनीतिक सहयोगी बन गया है, बल्कि उसकी गुटनिरपेक्ष स्थिति तुर्की और अमेरिका जैसे अन्य देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कारक है।
आपको बता दें कि बांग्लादेश को अमेरिकी खेमे का माना जाता रहा है। हालांकि उसकी दोस्ती चीन से भी रही है। हालांकि अमेरिका के साथ बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव के कई बिंदु उभरे हैं। मानवाधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की स्थिति को लेकर अमेरिका ने बांग्लादेश सरकार की आलोचना की है। इससे दोनों पक्षों में तनाव बढ़ा है। इसका फायदा अब चीन और रूस उठाना चाहते हैं।
2008 से सत्ता में मौजूद हसीना और उनकी सत्तारूढ़ अवामी लीग पार्टी लगातार चौथी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है। हालांकि विपक्ष उन पर दमनात्मक रणनीति का आरोप लगा रहा है। विपक्ष ने आशंका जताई है कि चुनाव निष्पक्ष या पारदर्शी नहीं होंगे। हालांकि सरकार इन आरोपों से इनकार करती रही है।
इस मुद्दे में अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां शामिल हो गई हैं, अमेरिका और उसके सहयोगियों ने हसीना की सरकार पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के साथ-साथ देश में बढ़ती मानवाधिकार चिंताओं को संबोधित करने के लिए दबाव डाला है। दूसरी ओर, रूस, बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में पश्चिम के "हस्तक्षेप" की आलोचना करते हुए मौजूदा सरकार का समर्थन कर रही है।
रूस का ये समर्थन शेख हसीना सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह बांग्लादेश के प्रति रूस की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। रूस बांग्लादेश के विकास और रक्षा का हिस्सा बनना चाहता है। रूस और बांग्लादेश के बीच निकटता में राजनीति के अलावा एक अलग अर्थशास्त्र भी है।
रूस और फ्रांस दोनों बांग्लादेशी उत्पादों के लिए नए बाजारों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें रेडीमेड परिधान भी शामिल हैं, जो इसकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। फ्रांस के साथ दिक्कत ये है कि वह लगातार पूर्व अफ्रीकी उपनिवेशों में अपनी स्थिति खोता जा रहा है। ऐसे में फ्रांस व्यापार के लिए एक नए बाजार की तलाश कर रहा है।
आपको बता दें कि बांग्लादेश ने हाल ही में रूस को कपड़ों का निर्यात शुरू किया था, हालांकि मॉस्को पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यह बाधित हो गया था। इसके अलावा रूस पहले से ही बांग्लादेश को 12.65 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ, रूपपुर में अपना पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने में मदद कर रहा है। रूस इसकी कुल लागत का 90% तक ऋण के रूप में वित्तपोषण कर रहा है।












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