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Fighter Jets: सर्जिकल स्ट्राइक से बॉर्डर पार ऑपरेशन तक, इजराइली वायुसेना से क्या सीख सकती है इंडियन एयरफोर्स?

Fighter Jets: इजराइल ने हाल ही में अपने 'ऑपरेशन मेनी वेज' का खुलासा किया है, जिसमें उसने बताया है, कि कैसे उसने सिर्फ 3 घंटों के अंदर सिर्फ 120 सैनिकों की मदद से सीरिया में एक अंडरग्राउंड मिसाइल फैसिलिटी का पता लगाकर उसे ध्वस्त कर दिया।

इजराइल ने इस मिशन को 8 सितंबर 2024 को किया था। इस अंडरग्राउंड 'डीप लेयर' मिसाइल फैसिलिटी का निर्माण ईरान ने 2017 के अंत में करवाया था, जो इजराइल के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द बन गया था। इससे पहले भी, इजराइली एयरफोर्स (Israel Air Force) ने कई प्रसिद्ध हवाई हमले किए, जैसे कि युगांडा में एंटेबे आतंकवाद विरोधी मिशन (1976) और इराक के ओसिरक परमाणु रिएक्टर (1981) के खिलाफ ऑपरेशन ओपेरा।

Fighter Jets

हाल ही में, अप्रैल 2024 में सीरिया में ईरान के वाणिज्य दूतावास पर एक इजराइली हवाई हमले (Israel Surgical Strike) में दो ईरानी जनरलों और पांच अन्य अधिकारियों की मौत हो गई। हमास प्रमुख इस्माइल हानिया और उनके बॉडीगार्ड को भी इजराइल ने ईरान में घुसकर मारा था। इजराइल के ऐसे ऑपरेशंस की भरमार है, जिसे उसने ठोस खुफिया जानकारियों के आधार पर अंजाम दिया है। इजराइली ऑपरेशंस की सबसे खास बात ये है, कि उनके ज्यादातर ऑपरेशंस कामयाब होते हैं और दुश्मनों को सोचने का मौका तक नहीं मिल पाता है। लिहाजा, भारत को इन इजराइली ऑपरेशंस से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

इजराइल से क्या सीख सकती है भारतीय वायुसेना? (Israel Air Force and Indian Air Force)

'डीप लेयर' फैसिलिटी पश्चिमी सीरिया के मस्याफ क्षेत्र में बनाई गई थी, जो सीरियाई एयर डिफेंस का गढ़ है। यह साइट ईरान के मिसाइल उत्पादन कार्यक्रम की एक प्रमुख परियोजना थी और इसका उद्देश्य, लेबनान में हिज्बुल्लाह और सीरिया में असद शासन को सटीक मिसाइलों की आपूर्ति करना था।

अंडरग्राउंड सुविधा का निर्माण इसलिए किया गया था, क्योंकि दक्षिणी सीरिया के जमराया में एक उपरी जमीनी रॉकेट इंजन निर्माण स्थल पर पहले हुए इजरायली हवाई हमले ने इसे नष्ट कर दिया था। 2021 तक, पहाड़ में 70 से 130 मीटर की गहराई में दबी यह भूमिगत सुविधा चालू हो गई थी, जिसमें मिसाइल उत्पादन क्षमताएं पूर्ण पैमाने पर होने के करीब थीं।

इसे घोड़े की नाल के आकार का बनाया गया था, जिसमें तीन मुख्य प्रवेश द्वार थे:- एक कच्चे माल के लिए, दूसरा तैयार मिसाइलों के लिए, और तीसरा रसद और कार्यालय तक पहुंच के लिए। इजराइल ने अनुमान लगाया, कि इस सुविधा का वार्षिक उत्पादन 300 किलोमीटर से ज्यादा रेंज की 100 से 300 मिसाइलों के उत्पादन बीच हो सकता है।

यह जगह जानबूझकर इजराइली सीमा से 200 किमी उत्तर में और सीरिया के पश्चिमी तट से 45 किमी दूर चुना गया था, ताकि हिज्बुल्लाह के लिए जमीनी हथियारों के काफिले पर संभावित इजराइली हमलों से बचा जा सके। इजराइल इस सुविधा पर बारीकी से नजर रख रहा था और लगातार हवाई हमले की योजनाएं तैयार की जा रही थीं।

इजराइल का Operation Many Ways क्या था? (What was Israel's Operation Many Ways?)

अक्टूबर 2023 में हमास ने जब दक्षिणी इजराइल पर अचानक हमला किया था, उसके बाद इस मिशन को जल्द अंजाम देने की योजना तैयार की गई और मिशन के लिए लंबी दूरी की तक मार करने के लिए प्रसिद्ध शालदाग यूनिट और लड़ाकू खोज और बचाव में विशेषज्ञता रखने वाली यूनिट 669 को चुना गया और उन्हें काफी सख्त ट्रेनिंग की गई।

ऑपरेशन की शुरुआत 100 कमांडो और 20 मेडिक द्वारा चार CH-53 "यासुर" भारी हेलीकॉप्टरों में सवार होकर हुई, जिन्हें AH-64 अटैक हेलीकॉप्टर और 21 लड़ाकू जेट विमानों ने एस्कॉर्ट किया। अन्य प्लेटफॉर्म में पांच ड्रोन और 14 टोही विमान थे। सीरियाई रडार की पहचान से बचने के लिए ये फॉर्मेशन भूमध्य सागर के ऊपर से उड़े।

सीरिया में घुसने के बाद, हेलीकॉप्टरों ने नैप-ऑफ-द-अर्थ (NOE) ऑपरेशन किए, जो देश के सबसे घने वायु रक्षा क्षेत्रों से बचने के लिए असाधारण रूप से कम उड़ान भरते थे। विमानों ने अन्य सीरियाई लक्ष्यों पर डायवर्सनरी हमले किए, जिससे मस्याफ क्षेत्र से ध्यान हट गया।

इसके बाद इजराइली हेलीकॉप्टर, इस सुविधा के प्रवेश द्वार के पास उतरे और फिर वहां सैनिकों को तैनात किया गया। मेडिक हेलीकॉप्टरों में सवार रहे, जो हताहतों को निकालने या उनका इलाज करने के लिए तैयार थे। कमांडो ने निगरानी के लिए एक ड्रोन भी तैयार कर दिया था।

कमांडो ने उस पूरे जगह को सुरक्षित किया और फिर भारी सुरक्षा वाली सुविधा में सेंध लगाई। अंदर जाने के बाद, टीम ने उत्पादन लाइन और इसकी सहायता सुविधाओं के साथ लगभग 660 पाउंड विस्फोटक लगाए। इसके बाद टीम बाहर निकली और विस्फोटकों को दूर से ही विस्फोट कर दिया, जिससे उत्पादन स्थल पूरी तरह से तबाह हो गया।

ये मिशन 3 घंटे से भी कम समय में पूरा हो गया और सैनिक उसी हेलीकॉप्टर से वापस लौट आए। उन्होंने बताया, कि ऑपरेशन के दौरान लगभग 30 सीरियाई गार्ड और सैनिक मारे गए। सीरियाई मीडिया ने 14 लोगों की मौत और 43 के घायल होने की बात स्वीकार की थी।

भारत ने कैसे दिया था बालाकोट स्ट्राइक को अंजाम? (How did India carry out the Balakot strike?)

26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट के पास जाबा टॉप पर जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर पर सुबह-सुबह हवाई हमला किया था। बालाकोट में एक प्रशिक्षण शिविर था, जिसमें विस्फोटकों और तोपखाने पर बुनियादी और एडवांस आतंकवादी प्रशिक्षण दिया जाता था।

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद यह पहला मौका था, जब हमलावर युद्धक विमानों ने नियंत्रण रेखा पार की थी। यह हमला जैश-ए-मोहम्मद की तरफ से भारतीय सीआरपीएफ के काफिले पर किए गए आतंकी हमले के बाद किया गया था, जिसमें 40 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे।

ऑपरेशन में SPICE 2000 सटीक-गाइडेड युद्ध सामग्री और अन्य हथियार ले जाने वाले बारह मिराज 2000 जेट शामिल थे।

उन्हें चार सुखोई Su-30MKI, नेत्र और फाल्कन एयरबोर्न अर्ली वार्निंग और कंट्रोल एयरक्राफ्ट, एक IAI हेरॉन UAV और दो इल्युशिन Il-78 एरियल रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट से समर्थन मिल रहा था। राजस्थान सेक्टर में कुछ ऐसे नकली मिशन शुरू किए गये थे, जो बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद के मुख्यालय पर हमला करने का दिखावा कर रहे थे। इस हमले में जाबा टॉप पर लगभग 300 आतंकवादी मारे गये।

सबसे बड़ी बात यह थी, कि कई एयरबेस पर विमान तैयार करने में बहुत बड़ी संख्या में कर्मियों के शामिल होने के बावजूद बहुत उच्च स्तर की गोपनीयता बनाए रखी गई थी। हमले का समय सुबह-सुबह तय किया गया था, जिसे "ग्रेवयार्ड शिफ्ट" भी कहा जाता है, जिसका मकसद सभी रडार नियंत्रकों और वायु रक्षा दल को उनके बायो-क्लॉक के निचले स्तर पर पकड़ना था।

इजराइली ऑपरेशंस से क्या सीख सकता है भारत?

यूरेशियन टाइम्स में रिटायर्ड एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने लिखा है, कि इजराइल को अपने आस-पास के अरब देशों से अपने अस्तित्व पर खतरा है, जो फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन करते हैं। इस प्रकार, इजराइल के लिए यह करो या मरो वाली स्थिति होती है। उनकी मानसिकता और सशस्त्र बलों की तैयारियां, विनाश के बुनियादी डर पर आधारित हैं।

राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की मानसिकता देश की रक्षा के लिए अच्छी तरह से तैयार है और दुनिया की परवाह किए बगैर वो जोखिम लेने के लिए तैयार रहते हैं। इजराइल और अमेरिका में उसके प्रवासियों ने अमेरिकी सरकार का समर्थन पाने के लिए कड़ी मेहनत की है। यह समझना चाहिए, कि इजरायल अकेले ऐसा नहीं कर सकता। हालांक, देखने में ऐसा लगता है, कि इजराइल अकेले लड़ रहा है, लेकिन इसकी जीवन रेखा संयुक्त राज्य अमेरिका है।

किसी भी सैन्य अभियान की सफलता, सटीक खुफिया जानकारी पर निर्भर करती है। इजराइली इंस्टीट्यूट फॉर इंटेलिजेंस एंड स्पेशल ऑपरेशंस, जिसे मोसाद के नाम से जाना जाता है, वो एक विश्वविख्यात खुफिया एजेंसी है। इसने सभी इजराइली सैन्य अभियानों की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

इजराइल का मानना है, कि "जितना ज्यादा पसीना और शांति के समय बहाते हैं, उतना ही कम आप युद्ध के समय खून बहाते हैं।" युद्ध की आशंका को देखते हुए, इजराइल ने हथियारों का विशाल भंडार बना रखा है और उसने अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित कर रखा है।

मिशन की तैयारी सबसे महत्वपूर्ण है। सभी सफल ऑपरेशनों में कई स्तर की तैयारियां शामिल होती हैं, जिसमें मिशन रिहर्सल और पूर्ण पैमाने के मॉडल और लक्ष्यों पर डमी स्ट्राइक किए जाते हैं।

शहर में होने वाले नजदीकी युद्ध के मामले में दुनिया को इजराइल से बहुत कुछ सीखना है, जैसा कि गाजा और दक्षिण लेबनान में हुआ है। इजराइल जैविक मारक क्षमता और तेज मुठभेड़ों की गंभीरता का अभ्यास करता है और जब युद्ध नहीं होता है, उस वक्त भी इजराइल में लगातार ऐसे ट्रेनिंग चलते रहते हैं। अनिल चोपड़ा के मुताबिक, इजराइल वही मानता है जो क्लॉजविट्ज ने स्ट्रैटजी के छात्रों को सिखाया था, कि "युद्ध अपने आप में एक लक्ष्य नहीं है, युद्ध एक लक्ष्य तक पहुंचने का साधन है, जियो-पॉलिटिकल मकसदों को हासिल करने के लिए संगठित हिंसा का प्रयोग है।"

लिहाजा, भारत को भी हमेशा ऐसे ऑपरेशंस की तैयारियां करते रहनी चाहिए, ताकि मौका आने पर कम से कम खून बहाकर दुश्मनों के खेमे में ज्यादा से ज्यादा विनाश लाया जा सके।

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