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तालिबान 'राज' में अल्पसंख्यकों का बुरा हाल! फिर 55 अफगान सिख भारत पहुंचे, सुनाई आपबीती

अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद से वहां अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है। लोग तालिबान के डर से देश छोड़कर भाग रहे हैं।

काबुल/नई दिल्ली, 26 सितंबर : अफगानिस्तान में 2021 में तालिबानी शासन आने के बाद से वहां कथित तौर पर अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले बढ़े हैं। काबुल में अल्पसंख्यक सिख समुदाय तालिबानी शासन में खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। इसलिए अभी तक कई सारे लोग अफगानिस्तान छोड़कर भारत में रह रहे हैं। रविवार को 55 अफगान सिख विशेष उड़ान से दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे। (worst situation of Sikh and Hindu minority in Afghanistan )

अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं

अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं

अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद से वहां अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है। लोग तालिबान के डर से देश छोड़कर भाग रहे हैं। काबुल में सिखों के गुरुद्वारे में आतंकी हमले हो रहे हैं। इस पर तालिबान शासन मौन है। लोगों को मारा जा रहा है, उन्हें गायब किया जा रहा है। महिलाओं के अधिकारों के बारे में तो वहां क्या स्थिति है इसे सारी दुनिया जानती ही है।

 55 अफगान सिख नई दिल्ली पहुंचे

55 अफगान सिख नई दिल्ली पहुंचे

अफगानिस्तान में तालिबान राज में अल्पसंख्यक समुदायों के बिगड़ते हालात के मद्देनजर भारत सरकार के प्रयासों के तहत काबुल से 55 अफगान सिख नई दिल्ली पहुंचे। उन्हें काबुल से दिल्ली विशेष विमान की सहायता से लाया गया। जब लोग भारत पहुंचे तो उनका खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बता दें कि, पिछले साल तालिबान ने अफगानिस्तान में अशरफ गनी के नेतृत्व वाली सरकार को उखाड़ फेंका और सत्ता को हथिया लिया।

तालिबान ने चार महीने तक जेल में रखा

तालिबान ने चार महीने तक जेल में रखा

समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए, बलजीत सिंह ने अफगानिस्तान के हालात के बारे में बात की और कहा कि उन्हें तालिबान ने चार महीने तक जेल में रखा था। उन्होंने कहा, "अफगानिस्तान में स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मुझे चार महीने की कैद हुई थी। तालिबान ने हमें धोखा दिया है, उन्होंने जेल में हमारे बाल काट दिए। मैं भारत लौटने के लिए आभारी और खुश हूं।" एक अन्य शरणार्थी ने तत्काल ई-वीजा प्रदान करने और उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए भारत सरकार को धन्यवाद दिया।

तालिबान राज में मानवाधिकार का उल्लंघन

तालिबान राज में मानवाधिकार का उल्लंघन

सुखबीर सिंह खालसा ने कहा, हम भारत सरकार को धन्यवाद देना चाहते हैं कि उसने हमें तत्काल वीजा दिया और हमें भारत पहुंचने में मदद की। हम में से कई के परिवार अभी भी काबुल में हैं। उन्होंने बताया कि, अफगानिस्तान में लगभग 30-35 लोग अभी भी फंसे हुए हैं। बता दें कि, 14 जुलाई को, सबसे बड़ी निजी अफगान एयरलाइन, काम एयर से एक शिशु सहित कुल 21 अफगान सिखों को काबुल से नई दिल्ली लाया गया था।

पहले 700 हिंदू और सिख अफगानिस्तान में रहते थे, संख्या हुई कम

पहले 700 हिंदू और सिख अफगानिस्तान में रहते थे, संख्या हुई कम

तालिबान के नेतृत्व वाले राष्ट्र में संकटग्रस्त अल्पसंख्यकों को निकालने के सरकार के प्रयासों के तहत, रविवार को दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरने वाली एक विशेष उड़ान में 55 अफगान सिख पहुंचे। एएनआई ने कहा कि इन अफगान अल्पसंख्यकों को निकालने के लिए भारतीय विश्व मंच और केंद्र के समन्वय में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति, अमृतसर ने विशेष उड़ान काबुल भेजा था। 2020 में लगभग 700 हिंदुओं और सिखों के अफगानिस्तान में होने की सूचना मिली थी, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या में 15 अगस्त, 2021 को तालिबान के सत्ता में आते ही उनकी बर्बरता को देखते हुए अफगानिस्तान छोड़ दिया। तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद से सिखों पर लगातार हमले हो रहे हैं।

अल्पसंख्यक डर से काबुल छोड़कर भाग रहे हैं

अल्पसंख्यक डर से काबुल छोड़कर भाग रहे हैं

18 जून को, इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) ने काबुल में करते परवान गुरुद्वारे पर हमला किया था, जिसमें लगभग 50 लोगों के मारे जाने की खबर मिली थी। पिछले साल अक्टूबर में काबुल के कार्त-ए-परवान जिले के एक गुरुद्वारे में 15 से 20 आतंकियों ने घुसकर गार्डों को बांध दिया था।

क्या कहती है UNHRC की रिपोर्ट

क्या कहती है UNHRC की रिपोर्ट

इससे पहले UNHRC की रिपोर्ट में बताया गया था कि, अफगानिस्तान में तालिबान शासन के डर की वजह 27 लाख से अधिक नागरिक दुसरे देशों में जाकर रिफ्यूजी बन गए हैं। अफगानिस्तान दुनिया के तीसरे बड़े शरणार्थियों की लिस्ट में शामिल हो गया है।

अफगानिस्तान की स्थिति खराब हुई

अफगानिस्तान की स्थिति खराब हुई

विशेष रूप से, पिछले अगस्त में तालिबान के अधिग्रहण के बाद शरण लेने के लिए पड़ोसी देशों में जाने वाले कई अफगान शरणार्थियों को अत्याचारों का सामना करना पड़ा क्योंकि कईयों के पास कानूनी दस्तावेज या वीजा नहीं थे। पिछले साल अगस्त में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से, अफगानिस्तान की स्थिति केवल खराब ही नहीं हुई है बल्कि गंभीर मानवाधिकारों का उल्लंघन बेरोकटोक जारी है।

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