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पाकिस्तान में चुनाव प्रचार थमा, किसका दावा सबसे मज़बूत

By Bbc Hindi
चुनाव प्रचार
Getty Images
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2018 आम चुनाव का प्रचार दो महीने चलने के बाद सोमवार शाम को ख़त्म हो रहा है. इस चुनाव प्रचार को देखने वालों के मुताबिक़ इसमें ताक़तवर रंग अविश्वसनीयता और विभाजन का रहा है.

वैसे तो अधिकतर मौक़े पर उम्मीदवार चुनाव से कई महीने पहले ही अपने क्षेत्र में चुनाव की तैयारी के सिलसिले में दिखाई देना शुरू हो जाते हैं लेकिन चुनाव प्रचार कार्यवाहक सरकार के बनने के बाद शुरू होता है.

इस बार चुनाव प्रचार कुछ छोटा और कुछ फीका रहा. इसकी वजह राजनीतिक और ग़ैर-राजनीतिक दोनों थी.

ग़ैर-राजनीतिक वजहों में रमज़ान और फिर ईद का चुनावों से चंद महीने पहले आना था. साथ ही चुनाव प्रचार पर चरमपंथी हमले भी किए जा सकते हैं. इसके अलावा राजनीतिक वजहों की सूची बहुत लंबी है.

इस चुनाव प्रचार को क़रीब से देखने वालों का कहना है कि इन चुनावों पर ग़ैर-राजनीतिक शक्तियों की छाप होने की धारणा ने कई मतदाताओं में एक तरह की मायूसी पैदा की है.

पत्रकार और जियो न्यूज़ के कार्यक्रम 'नया पाकिस्तान' के एंकर तलअत हुसैन चुनाव प्रचार के बारे में कार्यक्रम करने के लिए देश के चारों प्रातों में गए. उनका कहना है कि सामान्य तौर पर मतदाताओं को अपने वोट की ताक़त पर ज़्यादा यक़ीन नहीं रहा है.

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चुनावों में दख़ल का सच?

तलअत हुसैन के मुताबिक़, "चाहे आप शहरी इलाक़ों में हों या उप-नगरों में, इस्माइल ख़ान में हों या टंडो अल्लाह यार में. आपको मतदाताओं की ज़बान से वह किस्से सुनाई देते हैं जो इस्लामाबाद में हो रहे हैं. चाहे वह जीप के निशान आवंटित किए जाने हों. चाहे वह सिंध में ग्रेड डेमोक्रेटिक क्रिकेट अलायंस के बनने की प्रक्रिया हो या फिर चाहे उम्मीदवारों के वोट का इधर-उधर होना हो. इस वजह से बहुत से लोगों को इस बात का एहसास है कि वह वोट डालेंगे तो सही लेकिन उन्हें मालूम है कि शायद परिणाम ऐसे न हों जैसे वोट के ज़रिए होने चाहिए."

शाह ज़ेब जिलानी दुनिया न्यूज़ के लिए चुनाव के लिए ख़ास रिपोर्ट की तैयारी के सिलसिले में बलूचिस्तान और पंजाब के दूरदराज़ इलाक़ों में चुनावी सरगर्मियों की रिपोर्टिंग करते रहे हैं.

इस चुनावी मुहिम के दौरान मतदाताओं की भावनाओं के बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा, "इस बार जिस तरह के माहौल में चुनाव प्रचार चला इसमें एक बहुत बड़ी धारणा यह थी कि कुछ पार्टियों को दबाया जा रहा है, कुछ को उभारा जा रहा है, उससे मुझे लोगों में मायूसी नज़र आई. मैं क्वेटा गया, चमन गया, झंग और कराची गया लेकिन अधिकतर जगह पर वह गहमागहमी नज़र नहीं आई."

नदीम मलिक समा टीवी में एक प्रोग्राम के मेज़बान हैं और हाल ही में उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों, ख़ासतौर पर पंजाब में चुनावी प्रचार पर विशेष कार्यक्रम किए हैं. उनका कहना है कि इस बार चुनावी उम्मीद की बुनियाद में उम्मीद नहीं दिखाई दी.

उन्होंने कहा, "लोगों में इसको लेकर बहुत अधिक उम्मीद नहीं दिखाई दी कि यह चुनाव देश को संकट से बाहर निकाल पाएगा या नहीं. जब मैंने लोगों से सवाल किए कि उन्हें इन चुनावों से क्या उम्मीद हैं तो उलटा उन्होंने मुझसे सवाल किया कि क्या इन चुनावों के परिणाम के बाद बनने वाली सरकार चल पाएगी?"



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बलूचिस्तान की चुनावी मुहिम

चुनावी प्रकिया एक ख़ुशी और उम्मीद लेकर आता है जिसके अपने रंग होते हैं. पाकिस्तान में विभिन्न इलाक़ों की संस्कृति और राजनीतिक प्रतिबद्धता के लिहाज़ से चुनावी प्रकिया के अपने रंग हुआ करते हैं.

तलअत हुसैन के अनुसार, इस बार उन्हें पूरे देश ही में वह जज़्बा और चुनावी रंग नज़र नहीं आया.

बलूचिस्तान के इलाक़े मस्तुंग में चुनावी प्रक्रिया पर हमले के बाद से इस राज्य में चुनावी रंग जम नहीं सका. वैसे भी इस राज्य में चुनावी प्रक्रिया बाक़ी पाकिस्तान की तुलना में बहुत अलग और फीकी रहती है.

तलअत हुसैन के मुताबिक़, इस बार तो रही सही कसर भी पूरी हो गई. वह कहते हैं, "अगर आप चुनाव प्रक्रिया के लिहाज़ से देखें तो वहां पर आप को कोई गहमागहमी नहीं नज़र आएगी, कोई झंडे नहीं नज़र आएंगे, कोई जलसे नज़र नहीं आएंगे. ज़ाहिर है इस सब का संबंध मस्तुंग हमले से भी है लेकिन असली बात यह है जब से संजरानी मॉडल सामने आया है बलूचिस्तान ने अपना चुनाव छोड़ दिया है."

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ख़ैबर पख़्तूनख़्वा का अभियान

ख़ेबर पख़्तूनख़्वा में हमलों और धमकियों के बावजूद आवामी नेशनल पार्टी और अन्य पार्टियों ने अपने प्रचार अभियान चलाए और ख़ूब चलाए.

इस राज्य के विभिन्न इलाक़ों से कार्यक्रम करने के बाद तलअत हुसैन का कहना है कि राज्य में चलने वाली चुनावी प्रक्रिया में बहुत जान थी.

वह कहते हैं, "वहां पर तमाम राजनीतिक पार्टियों को उम्मीद है कि उनके पास मौक़ा है. आवामी नेशनल पार्टी हमलों के बावजूद बहुत तेज़ी से प्रचार करते नज़र आती है, इसी तरह एमएमए भी सामने आई."

पंजाब ने ख़ूब रंग जमाया

पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के सह-अध्यक्ष ने 2013 के चुनाव के मुक़ाबले में इस बार डटकर अपनी पार्टी की मुहिम चलाई और समीक्षकों के अनुमान की तुलना में उन्हें पंजाब में भी जनता की तरफ़ से पहले से अधिक सराहना मिली.

हालांकि, पंजाब में असली रंग मुस्लिम लीग (एन) और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने ही जमाया. नदीम मलिक के अनुसार, दो चार क्षेत्रों को छोड़कर पूरे पंजाब में यही लग रहा है कि मुक़ाबला मुस्लिम लीग (एन) और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के बीच है.

उनका कहना है, "बाज़ारों में चले जाएं या गली मोहल्लों में भी आप को शेर और बिल्ली के निशान और नारे ही मिलेंगे, पीपल्स पार्टी या अन्य पार्टियों के हिमायत बेहद कम दिखाई देते हैं. इन्हीं दो पार्टियों ने पंजाबी संस्कृति के मुताबिक़, राज्य में ढोल, चुनावी गीतों, जलसे, जुलूसों ने ख़ूब रंग जमाया हुआ है."

तलअत हुसैन कहते हैं, "पंजाब के इन इलाक़ों में जहां उम्मीदवारों ने चुनाव से चंद रोज़ पहले राजनीतिक वफ़ादारी ग्रुप में की शक्ल में बदली है, जैसे कि दक्षिण पंजाब के इलाक़े डेरा ग़ाज़ी ख़ान वग़ैराह तो वहां पर भी आपको वह गहमागहमी नज़र नहीं आती. लेकिन मध्य पंजाब में आप को ख़ूब जोशो ख़रोश दिखाई देता है."



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सिंध का मिला जुला रुझान

शाह ज़ेब जिलानी के अनुसार, ख़ासतौर पर तहरीक-ए-इंसाफ़ के समर्थक ये समझ रहे हैं कि उनकी पार्टी की हुकूमत बन रही है इसलिए उनमें ख़ासा जोश और जज़्बा पाया जा रहा है जबकि वह पारंपरिक पार्टियां जो पहले भी सत्ता में रही हैं वहां पह जोशो ख़रोश की कमी देखने में आई है.

उन्होंने कहा, "अगर आप मुस्लिम लीग (एन) की बात करें या पीपल्स पार्टी की तो उनके लोगों से बात करके ऐसा लगताहै कि उनके लिए चुनाव एक बहुत मुश्किल प्रकिया की तरह है. उनके आगे रुकावटें काफ़ी हैं जिन्हें पार पाने में उन्हें मुश्किल हो रही है."

क्या ये चुनाव राजनीतिक संकट हल कर पाएंगे?

ये सवाल भी मैंने उन तीनों पत्रकारों से पूछा जो अपनी ज़िंदगी में कई चुनाव देख चुके हैं और कई राजनीतिक दलों और नेताओं से मिलते रहे हैं.

तलअत हुसैन का कहना था कि उन्हें केंद्र या राज्य में कहीं भी कोई मज़बूत सरकार बनती दिखाई नहीं दे रही है बल्कि चुनाव के बाद राजनीतिक अस्थिरता होती अधिक दिखाई दे रही है.

वह कहते हैं, "आगे के 48 घंटों में सूरते हाल बदल सकती है लेकिन अभी तक की तस्वीर यह ही कि केंद्र में कोई पार्टी बहुमत लाती नहीं दिख रही है. पंजाब में पीएमएल (एन) अभी भी इस स्थिति में है कि प्रांत में सरकार बना ले. सिंध में एक गठबंधन सरकार बनती दिखाई दे रही है और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में भी तहरीक-ए-इंसाफ़ को अपनी सरकार बनाने में मुश्किल हो सकती है. ब्लूचिस्तान का मामला आपके सामने है जहां संजरानी मॉडल चल रहा है."

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नदीम मलिक का ख़याल था कि मतदान वाले दिन मुस्लिम लीग नवाज़ या तहरीक-ए-इंसाफ़ में से जो पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगा वह बहुमत ले आएगी.

उन्होंने ये भी कहा, "देश को संकट से वही सरकार निकाल सकती है जो मज़बूत हो यानी पूर्ण बहुमत रखती हो. अगर ऐसी सरकार बन गई जिसे साधारण बहुमत हासिल हुई तो वह अपना राजनीतिक एजेंडा लेकर आएगी और समस्याएं कम हो जाएंगी. लेकिन अगर ऐसी सरकार आई जिसे बने रहने के लिए निर्दलीय सदस्यों पर भरोसा करना पड़े तो ये सूरतेहाल देश के हक़ में नहीं जाएगी."

शाहज़ेब जिलानी का कहना था कि ऐसी सरकार जिस के बारे में कहा जा रहा है कि वह न्यायपालिका और सुरक्षा संस्थानों की बेसाखियों के सहारे आएगा, इसे अपनी ताक़त साबित करनी होगी और उन्हें शक है कि वह ज़्यादा लंबा अर्से तक चल पाएगी.

उन्होंने कहा, "एक तरह के लोग समझ रहे हैं कि एक ख़ास शख़्सियत को चुनाव जितवाने की कोशिश की जा रही है. जीप वाले भी उनके हवाले किए जा रहे हैं, बाक़ी आज़ाद भी उनके हवाले किए जाएंगे और उनकी सरकार बना जाएगी और देश तरक़्क़ी के रास्ते पर चल पड़ेगा. लेकिन आप ज़रा कल्पना कीजिए कि पीपल्स पार्टी और मुस्लिम लीग नवाज़ विपक्ष में बैठते हैं तो ये दोनों पुरानी पार्टियां हैं उनका विपक्ष में काम कैसे चलेगा, ये देखना होगा."

"दूसरी राय ये है कि एक कमज़ोर सरकार, मिश्रित सरकार बनेगी. मेरी राय में उन हालात में कमज़ोर सरकार राजनीतिक तौर पर ज़्यादा स्थिर होगी. अगर आप वास्तव में जनता के वोट की ताक़त से सत्ता में आते हैं तो आप ख़ुद भी अपने आप को मज़बूत महसूस करेंगे. आप कह सकेंगे कि मैं किसी की बैसाखियों पर सत्ता में नहीं आया."


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English summary
Election campaign in Pakistan whose claim is the strongest

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