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चीन के खिलाफ भारत का साथ चाहता है सिंगापुर, Indo-Pacific में ड्रैगन की गर्दन कैसे मरोड़ सकते हैं दोनों दोस्त?

India-Singapore Tie: भारत और सिंगापुर ऐतिहासिक संबंध साझा करते हैं और दोनों ही देश, एक दूसरे के स्ट्रैटजिक पार्टनर भी हैं। खासकर सिंगापुर को हमेशा से चीनी आक्रामकता का डर सताता रहा है और चीन को काउंटर करने के लिए सिंगापुर एशियाई महाशक्ति भारत की तरफ देखता है।

सिंगापुर ने साल 1965 में आजादी हासिल की थी और उसके बाद से ही उसे चीन समर्थित कम्युनिस्ट आंदोलनों के साथ-साथ मलेशिया और इंडोनेशिया के संभावित वर्चस्व से भी खतरों का सामना करना पड़ा है। इन जोखिमों का मुकाबला करने के लिए, सिंगापुर ने भारत के साथ घनिष्ठ रणनीतिक साझेदारी की मांग की, इसे चीनी प्रभाव को काउंटर करने और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक प्रमुख भागीदार के रूप में देखा गया।

india-singapore relations

चीन को काउंटर करने के लिए सिंगापुर अहम

सिंगापुर एक ऐसा देश है, जिसका राजनीतिक कद उसके आकार से काफी ज्यादा है, और इसने 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान भारत का खुलकर समर्थन किया था और कश्मीर संघर्ष पर भी इसने लगातार भारत को अपना समर्थन देना जारी रखा है। इसके साथ ही, सिंगापुर ने लगातार भारत में हुए आतंकवाद की आलोचना की है और आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ भारत के साथ मिलकर काम किया है।

सिंगापुर का रणनीतिक स्थान, इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का मुकाबला करने में एक प्रमुख भागीदार बनाता है। दोनों देश यह सुनिश्चित करने के लिए उत्सुक हैं, कि इंडो-पैसिफिक खुला, स्वतंत्र और समावेशी बना रहे। पीएम मोदी की इस यात्रा से इन सहयोगों को गहरा करने की उम्मीद है, जिससे भारत-सिंगापुर संबंधों के एक नए युग की शुरुआत होगी।

भारत भी आसियान देशों के साथ मिलकर चीन को दबाव में लाना चाहता है और इसीलिए प्रधानमंत्री का ब्रुनई और सिंगापुर का दौरा एक साथ प्लान किया गया है।

भारतीय प्रधानमंत्री की ये यात्राएं, सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों के बारे में नहीं हैं, बल्कि ये आसियान के भीतर भारत की स्थिति को मजबूत करने के बारे में हैं, एक ऐसा क्षेत्र जो वैश्विक भूराजनीति में तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। आसियान के साथ भारत के संबंध बढ़ रहे हैं, खास तौर पर व्यापार और रक्षा के क्षेत्रों में। भारत आसियान का सातवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जिसका द्विपक्षीय व्यापार 110 बिलियन डॉलर को पार कर गया है।

इसके अलावा, संयुक्त अभ्यास और रक्षा बिक्री को लेकर भी भारत का आसियान देशों के साथ रक्षा संबंध गहरे हो रहे हैं, खास तौर पर वियतनाम और फिलीपींस जैसे देशों के साथ। हाल ही में, भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया के क्षेत्रीय हथियार बाजार में प्रवेश किया है। इस साल अप्रैल में, भारत ने 375 मिलियन डॉलर के सौदे के तहत ब्रह्मोस मिसाइलों का पहला बैच फिलीपींस को दिया है। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात सौदा है। इस समझौते के तहत, भारत फिलीपीन मरीन कॉर्प्स को इन क्रूज़ मिसाइलों की तीन बैटरियां सप्लाई करेगा।

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सिंगापुर में कैसे फंसी है ड्रैगन की गर्दन

दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) को जोड़ने वाले मलक्का स्ट्रेट, जिसे चीन के लिए चोक प्वाइंट माना जाता है, वो सिंगापुर से ही होकर गुजरता है। सिंगापुर, मलक्का स्ट्रेट के एक छोर पर बैठा हुआ है और कहा जाता है, कि जिस दिन भारत ने मलक्का स्ट्रेट को बंद कर दिया, चीन का व्यापार घुटने के बल बैठ जाएगा।

मलक्का स्ट्रेट, पश्चिम में सुमात्रा के इंडोनेशियाई द्वीप और पूर्व में प्रायद्वीपीय (पश्चिम) मलेशिया और धूर दक्षिणी थाईलैंड के बीच स्थित है। इसके अलावा, ये सिंगापुर स्ट्रेट के आगे है और ये दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण शिपिंग लेन है।

हिंद महासागर में आने वाली चीनी पनडुब्बियों को संकीर्ण मलक्का जलडमरूमध्य में सतह पर आने के लिए मजबूर होना पड़ता है। और यह देखते हुए भारत ने अंडमान-निकोबार में भी कई सिक्योरिटी प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं। भारत ने साल 2001 मेंअंडमान और निकोबार कमान (ANC) की भी स्थापना की थी और मलक्का में चीन को काउंटर करने में सिंगापुर काफी अहम भूमिका निभा सकता है।

मलक्का जलडमरूमध्य, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच मुख्य शिपिंग चैनल है , जो भारत , थाईलैंड , इंडोनेशिया , मलेशिया , फिलीपींस , सिंगापुर , वियतनाम , चीन , जापान , ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसी प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ जोड़ता है। हर साल मलक्का स्ट्रेट से एक लाख से ज्यादा गुजरते हैं, जिसकी वजह से ये दुनिया का सबसे व्यस्त शिपिंग लेन बन जाता है और इसीलिए चीन इससे काफी डरता है, क्योंकि चीन जितना तेल खरीदता है, उसका 80 प्रतिशत हिस्सा मलक्का स्ट्रेट से ही गुजरता है। यानि, अगर भारत मलक्का स्ट्रेट को बंद कर दे, तो चीन के ग्रोथ इंजन का पहिया ही रूक जाएगा।

इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी का सिंगापुर दौरा काफी अहम हो जाता है, क्योंकि भारत और सिंगापुर मलक्का स्ट्रेट को किसी आपातकालीन स्थिति में बंद करके चीनी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकते हैं।

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