हताशा के साथ हर रोज हजारों अफगान सीमा कर रहे पार

काबुल, 09 दिसंबर। हर दिन कई बसें पश्चिमी अफगान शहर हेरात से सैकड़ों लोगों को ईरान-अफगानिस्तान सीमा तक ले जाती हैं. वहां वे अपने तस्करों से मिलते हैं और फिर कई दिनों तक पैदल यात्रा करते हैं. कई बार वे ट्रकों में फंसे लोगों के साथ यात्रा करते हैं और कभी-कभी वे चोरों और सीमा प्रहरियों से बचते हुए अंधेरे में एक पर्वत श्रृंखला पर चलते हैं.
ईरान पहुंचने पर वे नौकरी पाने की कोशिश करते हैं और कुछ यूरोप जाने की योजना बनाते हैं. ईरान तक का सफर बहुत कठिन होता है, उनके पास खाने के लिए कुछ ही रोटी और पीने का पानी होता है. वे ज्यादा देर तक पैदल चल सकें इसके लिए वे भारी बैग नहीं साथ रखते.
मर जाएंगे लेकिन देश छोड़ देंगे
ईरानी सीमा पर जाने वाली बस में सवार 20 वर्षीय हारून ने कहा कि वह अपने दोस्त फाउद के साथ यूरोप जाना चाहते हैं. वे कहते हैं, "हमारे पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. भले ही हमें मरना पड़े, हम इसे स्वीकार करते हैं."
अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से देश गंभीर आर्थिक संकट में है. अफगान सरकार को चलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग रुकी पड़ी है. अमेरिका ने अफगान सरकार की विदेशी संपत्तियों को फ्रीज कर दिया है. वहीं तालिबान को दुनिया शक की नजर से देखती है. देश में अंतरराष्ट्रीय सहायता और सूखे की वजह से कई लोगों के सामने रोटी तक हासिल करने में दिक्कत हो रही है. लोगों के पास रोजगार नहीं है और अधिकांश आबादी भूख से मर रही है.
ऐसे में देश छोड़कर जाने वालों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. नॉर्वेजियन रिफ्यूजी काउंसिल के अनुसार पिछले तीन महीनों में तीन लाख अफगान देश छोड़कर भाग गए हैं और हर दिन 4,000 से 5,000 के बीच लोग अफगानिस्तान छोड़ रहे हैं. हालांकि बहुत से लोग यूरोप पहुंचना चाहते हैं, लेकिन यूरोप में पहुंचने वाले अफगान शरणार्थियों की संख्या बहुत सीमित है. अधिकांश ईरान में एक नया जीवन शुरू करना चाहते हैं.
ईरान अब लौटा रहा है अफगान शरणार्थी
ईरान में पहले से ही 30 लाख अफगान शरणार्थी हैं. ईरान अब हर हफ्ते 20,000 से 30,000 अफगानों को वापस भेज रहा है. प्रवासन के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन के मुताबिक ईरान ने अकेले इस वर्ष 11 लाख अफगानों को लौटा दिया है. यह पिछले साल के निर्वासन की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक है.
हेरात में एक महिला मानव तस्कर ने बताया कि वह एक अफगान नागरिक को ईरान ले जाने के बदले 400 डॉलर लेती है. लेकिन उसे अग्रिम में केवल 16 डॉलर चाहिए. बाकी पैसा शरणार्थियों द्वारा नौकरी मिलने पर भेज दिया जाता है. यात्रा के दौरान मानव तस्कर तालिबान, ईरानी और पाकिस्तानी गार्डों को रिश्वत भी देते हैं ताकि वे उन्हें रोकें नहीं.
हेरात अफगानिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा शहर है. यह शहर ईरानी सीमा से सिर्फ एक घंटे की दूरी पर है. लेकिन प्रशासन द्वारा कड़ी निगरानी रखी जा रही है. अधिकांश नागरिक तीन सौ मील दक्षिण में निमरोज की यात्रा करते हैं, जहां वे पाकिस्तान में प्रवेश करते हैं और वहां से ईरान में दाखिल होने का प्रयास करते हैं.
हेरात के रहने वाले रजा रेजाई अपने 17 वर्षीय बेटे के साथ यात्रा कर चुके हैं. वह कहते हैं, "यह एक थकाऊ यात्रा है. सबसे कठिन रास्ता ईरान-पाकिस्तान सीमा पार करना है. यहां प्रवासियों को पहले बेहद कठिन पर्वत श्रृंखला पर चढ़ना पड़ता है और फिर उतरना पड़ता है."
रजा कहते हैं, ''बहुत अंधेरा होता है कि लेकिन हम टॉर्च का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. ऐसा सुरक्षा कारणों से करना होता है.'' रजा ईरान पहुंचे लेकिन शिराज में कुछ दिन काम करने के बाद पुलिस ने उन्हें पकड़कर वापस अफगानिस्तान भेज दिया. रजा एक बार फिर ईरान जाना चाहते हैं. उनके पिता का हाल ही में निधन हो गया. अब चालीस दिन के शोक के बाद वे फिर कोशिश करेंगे. वह कहते हैं, ''मैं और क्या कर सकता हूं? यहां कुछ नहीं है."
एए/वीके (एपी)
Source: DW
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