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Defence Deal: इंडियन नेवी खरीद रही लेटेस्ट पनडुब्बियां, पाकिस्तान को किस बात का डर?

Defence Deal: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत के सामने अपनी डिफेंस कैपेबिलटीज को बढ़ाने की बड़ी चुनौती आ चुकी है। भारत सरकार और भारत की तीनों सेनाओं को समझ आ चुका है कि भारत की मजबूत स्थिति ही भारत के मजबूत भविष्य की नींव हो सकती है। जिस तरह के पड़ोसी भारत को विरासत में मिले हैं, उसमें भारत और इजरायल की स्थिति बहुत अलग नहीं है। इसीलिए भारत अब तक की सबसे बड़ी डिफेंस डीलों में से एक को लॉक करने जा रहा है।

इंडियन नेवी अपनी डिफेंस कैपेसिटी को बढ़ा रही है। इसके लिए दो बड़ी सबमरीन डील्स यानी कि पनडुब्बी खरीदने की डील हो सकती है। इस डील का बजट एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बताया जा रहा है। अगर सबकुछ ठीक रहता है तो जून 2026 में ये डील पक्की हो सकती है।

Defence Deal

किसके बीच हुई डील?

दरअसल फ्रांस के नेवल ग्रुप और मुंबई स्थित मझगांव डॉक लिमिटेड यानी कि MDL मिलकर इन पनडुब्बियों को बनाएगा। इसके अलावा एक दूसरी डील जिसमें जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम, TKMS, और MDL, 6 डीजल-इलेक्ट्रिक स्टेल्थ सबमरीन्स को बनाएगा। ये दोनों डीलें भारत की अंडरवॉटर वॉर कैपेसिटी को करीब 20 फीसदी और ज्यादा मजबूत कर देगा। अब दोनों डीलों को समझ लेते हैं।

पहली डील में क्या क्या?

पहली डील तीन स्कॉर्पियन सबमरीन्स की है जिसके लिए रक्षा मंत्रालय ने 36 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का प्लान किया है। इस डील को प्रोजेक्ट-75 का विस्तार बताया जा रहा है। कुछ तकनीकी कारणों से इसमें देरी हुई है लेकिन जल्द यह फाइनल हो जाएगी। इस डील में MDL और फ्रांस का नेवल ग्रुप साथ में सबमरीन्स को बनाएंगे।

इससे पहले भी प्रोजेक्ट 75 में भारत और फ्रांस के नेवल ग्रुप ने 6 स्कॉरपियन (कलवारी क्लास) सबमरीन्स का सफलतापूर्वक निर्माण किया था। जिनमें आईएनएस कलवारी, खंडेरी, करंज, वेला, वागीर और वागशीर शामिल हैं। अंतिम पनडुब्बी, आईएनएस वागशीर को जनवरी 2025 में कमीशन किया गया था।

सबमरीन्स की क्या खासियत?

1500 टन वजन और 75 मीटर लंबाई वाली ये डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन्स एक बार अगर पानी में जाएंगी तो 21 दिनों तक बिना बाहर आए लड़ सकती हैं। इनमें एयर इंडिपेडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगा होगा और ये सबमरीन टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइलों और माइंस से लैस होंगी, जिससे इनकी मारक क्षमता बढ़ेगी। ये नई पनडुब्बियां भारतीय नौसेना की पुरानी रूसी किलो क्लास पनडुब्बियों की जगह लेंगी और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती समुद्री दादागीरी के खिलाफ भारत को मजबूत स्थिति में उतारेंगी

दूसरी डील में क्या खरीद रही इंडियन नेवी?

दूसरी डील है छह डीजल-इलेक्ट्रिक स्टेल्थ पनडुब्बियां जिसके लिए रक्षा मंत्रालय तकरीबन ₹65 से ₹70,000 करोड़ खर्च करने वाला है। और ये भी प्रोजेक्ट 75 का हिस्सा है, यूं तो इस प्रोजेक्ट को 2021 में मंजूरी मिल गई थी पर इसमें भी मामला देरी से ही चला। इसमें तकनीकी कारण कम और भारत का सफल मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट ज्यादा था। और यही कारण है कि ये 'मेक इन इंडिया' का सबसे बड़ा डिफेंस प्रोजेक्ट माना जा रहा है।

कौन बनाएगा ये सबमरीन्स?

इन पनडुब्बियों का निर्माण MDL और जर्मनी की TKMS के सहयोग से होगा। TKMS ने इस टेंडर में अपनी जगह बनाई, जबकि लार्सन एंड टर्बो (L&T) और स्पेन की नवनटिया जैसी कंपनियां कॉम्पटीशन में बाजी नहीं मार सकीं। TKMS का प्रपोजल टाइप 214 का एक कस्टमाइज्ड वर्जन है।, AIP सिस्टम से लैस और स्टेल्थ फीचर्स वाली सबमरीन्स को डिवेलप करेगा।

क्या खास होगा पनडुब्बियों में?

3000 टन वजनी इन पनडुब्बियों में अत्याधुनिक स्टेल्थ डिजाइन, AIP सिस्टम के कारण लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता, टॉप लेवल सेंसर और टॉरपीडो, क्रूज मिसाइलें जैसे घातक हथियार होंगे। ये नई पनडुब्बियां नौसेना की पुरानी शिशुमार और सिंधुघोष क्लास पनडुब्बियों का स्थान लेंगी।

चीन-पाकिस्तान के पास कितनी पनडुब्बियां?

वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास 17 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं, जिनकी संख्या 2030 तक घटकर 8 होने की आशंका है। इन छह नई पनडुब्बियों से चीन की 65 से अधिक पनडुब्बियों के मुकाबले हिंद महासागर में भारत की स्थिति मजबूत होगी। ये पनडुब्बियों में 45-60% तक भारत निर्मित होंगी, जो 'आत्मनिर्भर भारत' को और मजबूत करेंगी। अगले 6 से 9 महीने में डील साइन हो सकती है और अगले 7 सात में पहली पनडुब्बी भारत को मिल जाएगी, फिर हर साल डिलीवरी होती रहेगी, जब तक सौदा पूरा नहीं हो जाता।

भारत के पास वर्तमान में 17 सबमरीन्स हैं, जिनमें से 3 न्यूक्लियर पावर से लैस हैं। जबकि हमारे कोर कॉम्प्टीटर चीन के पास 65 के करीब हैं लेकिन आधा दर्जन ऐसी हैं जो न्यूक्लियर हथियारों से लैस हैं। जबकि पाकिस्तान बताता तो है कि उसके पास आठ हैं लेकिन असल में उसकी सिर्फ दो ही सबमरीन ऐसी हैं जो काम करने की स्थिति में हैं। लेकिन उसी चीनी मदद का भरोसा हमेशा बना रहता है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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