ताइवान को हथियाने के लिए चीन का ऑपरेशन शुरू, अमेरिकी गलतियों का खामियाजा भुगतेगी दुनिया?
सवाल ये हैं, कि नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा से क्या बदल गया है और क्यों बदल गया है? और उसका जवाब डिप्लोमेटिक डिटेल्स से समझा जा सकता है। चीन के साथ अमेरिका के राजनयिक संबंध 1972 के शंघाई कम्युनिक से शुरू हुआ था...
बीजिंग/ताइपे, अगस्त 09: चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ईस्टर्न थिएटर कमांड ने सोमवार (8 अगस्त) को एक बयान में कहा कि, ताइवान के आसपास के समुद्र और हवाई क्षेत्र में संयुक्त अभ्यास जारी है। हालांकि, बयान में ये नहीं कहा गया, कि ये युद्धाभ्यास किन-किन जगहों पर चलेगा और कब खत्म होगा। 4-7 अगस्त के बीच जिन क्षेत्रों में युद्धाभ्यास किए गये, वो क्षेत्र युद्धाभ्यास में शामिल होंगे या नहीं, इसका भी जिक्र बयान में नहीं किया गया है। लेकिन, पीएलए ने आधिकारिक तौर पर युद्धाभ्यास की समाप्ति की घोषणा नहीं की। वहीं, ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि, अब ताइवान को एकीकरण करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। आइये समझने की कोशिश करते हैं, कि ताइवान को चीन में मिलाने की ये प्रक्रिया क्या है, क्या शी जिनपिंग इसमें कामयाब होंगे और आखिर शी जिनपिंग ने इस काम को अंजाम तक पहुंचाने की क्या भूमिका बनाई है? और सबसे अहम सवाल ये, कि आखिर कैसे ताइवान को अमेरिका ने धरती का नासूर कैसे बना दिया?

ताइवान पर कब्जे का काउंटडाउन शुरू
चीन ने अमेरिका समेत पूरी दुनिया को अपने युद्धाभ्यास के बारे में सस्पेंस में रखा है और एक तरह से अपने बयान से दुनिया को धोखा देने की कोशिश की है। वहीं, ताइवान ने भी युद्धाभ्यास शुरू कर दिया है और ताइवान के युद्धपोत ताइवान स्ट्रेट में चीन के वॉरशिप्स के साथ आंख-मिचौली का खेल खेलने में व्यस्त थे। वहीं, व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रवक्ता जॉन किर्बी ने शिकायत की है, कि 'अपनी उत्तेजक बयानबाजी को कम करके और आक्रामक युद्धाभ्यास को खत्म करने चीन इस टेंशन को खत्म कर सकता है।' लेकिन, अमेरिकी विदेशई मंत्री, एंथनी ब्लिंकन ने कहा कि, ताइवान पर चीन की कार्रवाइयां बल के उपयोग की तरफ हैं, और शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता देने से एक कदम आगे दिखाती हैं। वहीं, जापानी रक्षा मंत्रालय का यह बयान कि, ताइवान की राजधानी के ऊपर से चार मिसाइलों ने उड़ान भरी हैं, वो अभूतपूर्व है, और नौ में से पांच मिसाइल उसके विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) में गिरे हैं, उसने इस तनाव को और बढ़ा दिया है। (ताइवान की राष्ट्रपति)

क्या अमेरिका ने भड़काया है तनाव?
पत्रकार टॉम फ्रीडमैन ने अपने न्यूयॉर्क टाइम्स कॉलम में अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा को 'लापरवाह कदम' बताया है और उन्होंने लिखा है, कि नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा ने चीन की शी जिनपिंग प्रशासन को ताइवान को लेकर अपरिवर्तनीय निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया है और चीनी जहाजों ने अब रूबिकॉन को पार करना शुरू कर दिया है और नैन्सी पेलोसी ने व्यवस्थित रूप से मुख्य भूमि के साथ ताइवान के पुनर्मिलन के लिए बाध्य कर दिया है। उन्होंने लिखा है कि, पेलोसी की कार्रवाई बहुत जानबूझकर उत्तेजक थी और व्हाइट हाउस और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रयासों के लिए बहुत ही परेशान करने वाला है। उन्होंने लिखा है कि, नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा और वॉशिंगटन की प्रतिक्रिया ने अब शी जिनपिंग के सामने साफ कर दिया है, कि बाइडेन प्रशासन हो या फिर अमेरिका के बनने वाले अगले राष्ट्रपति, वो आखिरकार चीन के 'वन चीन नीति' का त्याग कर देंगे। 5 अगस्त को चीन ने जो लाइव-फायर ड्रिल शुरू किया है, वो सिर्फ युद्धाभ्यास नहीं है, बल्कि वो असल युद्ध ही है और अब यह बीजिंग पर निर्भर करता है, कि वो इस नाकाबंदी को कब तक खत्म करता है।

क्या ताइवान को फौरन घुटनों पर ला देगा चीन?
एशिया टाइम्स में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने ताइवान के खिलाफ अपनी नौसेना के साथ साथ वायुसेना को उतारकर दो तरह से जो आक्रमण का अभ्यास किया है, असल में बीजिंग की वो असली नीति है ही नहीं। रिपोर्ट में कहा गया है, कि चीन की नौसेना के पास ही इतनी क्षमता है, कि वो ताइवान को चारों तरफ से घेर सकता है और ताइवान की पूरी तरह से नाकाबंदी कर सकता है, जिसकी वजह से कुछ ही हफ्तों में ताइवान की अर्थव्यवस्था बंद हो जाएगी और ताइवान को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। ताइवान के बीजिंग समर्थक चीन टाइम्स के 3 अगस्त संस्करण ने उल्लेख किया, कि पीएलए अभ्यास तीन दिवसीय नाकाबंदी के बराबर है। वहीं, ताइवान के अर्थशास्त्र मंत्रालय की रिपोर्ट है कि, द्वीप में प्राकृतिक गैस की 11 दिन की आपूर्ति और 146 दिनों के तेल की आपूर्ति है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, आक्रमण के अलावा ही अगर चीन सिर्फ इस द्वीप देश की पूरी तरह से नाकाबंदी कर दे, तो ताइवान नरम हो जाएगा और अगर चीन ताइवान पर आक्रमण करता है, तो चीन वही करेगा, जो वो वर्तमान में चल रहे युद्धाभ्यास में कर रहा है। मिन्नी चांग ने अलीबाबा के स्वामित्व वाली साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में इसका सार प्रस्तुत किया है।

ताइवान को चीन की आखिरी चेतावनी
साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट में छपी रिपोर्ट में कनाडा स्थित कांवा एशियन डिफेंस के प्रधान संपादक आंद्रेई चांग ने कहा कि,'ये वक्त अलग है और अगर बीजिंग ताइवान स्ट्रेट में अपनी रणनीति बदल रहा है और विशालकाय पैमाने पर युद्धाभ्यास करते हुए बेहतर योजना दिखा रहा है, तो फिर ये ताइवान के लिए गंभीर चेतावनी है। एडवांस वार्निंग को दोहराने, युद्धाभ्यास की औपचारिक घोषणा और पीएलए के विशिष्ट अभियान, दुनिया को यह दिखाने के लिए है, कि चीन ना सिर्फ किसी भी वक्त ताइवान के साथ भीषण युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार है, बल्कि चीन सभी जोखिमों को भी कंट्रोल करने की हैसियत में है'। पिछली बार जब पीएलए ने ताइवान के ऊपर से मिसाइल दागी थी, उस वक्त चीन के सभी युद्धपोत मिडिल लाइन, जो चीन और ताइवान को बांटने वाली औपचारिक सीमा रेखा है, उसके भीतर थीं और जब कुछ युद्धपोत ताइपे और काऊशुंग के पास पानी से टकराए तो कोई भी मिसाइल द्वीप के ऊपर से नहीं उड़ी।

चीन की मिसाइल नाकाबंदी योजना
ताइपे स्थित सैन्य विशेषज्ञ ची ले-यी ने कहा कि, 1995-1996 के चीन के परीक्षणों ने ताइवान के उत्तर और दक्षिण को अपने हवाई और समुद्री मार्गों को अवरुद्ध करने के लिए कवर किया था और चीन की सेना की "मिसाइल नाकाबंदी रणनीति" उसे कवर करने के लिए थी। हालांकि, इस बार, पीएलए पूर्वी ताइवान और दक्षिण-पश्चिम बाशी चैनल को अपने मिसाइल रेंज कवरेज के तहत लाने के लिए आगे बढ़ रहा है।" ची ने कहा कि, "यह एक स्पष्ट कदम है जिसका उद्देश्य यह दिखाना है कि वे अचानक की स्थिति में अमेरिका और जापान से ताइवान की मदद के लिए आने वाले जहाजों और विमानों को कैसे ताइवान स्टेट में आने से पहले ही रोक देंगे'। एंड्रयू सैल्मन ने एशिया टाइम्स में लिखा है कि, नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा ने एक क्षेत्रीय रणनीतिक स्थिति को पीछे छोड़ दिया है, जो मौलिक रूप से बदल गई है। ताइवान से लौटते वक्त वह 4 अगस्त को जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा से मिलीं। यह असामान्य नहीं है। इसके विपरीत नैन्सी पेलोसी को "दक्षिण कोरिया में जो रिसेप्शन हुआ, उससे बेहतर समझा जा सकता है।'

दक्षिण कोरिया ने नहीं दिया पेलोसी को भाव?
नैन्सी पेलोसी जब दक्षिण कोरिया गईं, तो राष्ट्रपति यूं सुक-योल, जो इस हफ्ते छुट्टी पर थे, वो उनसे नहीं मिले, जबकि वो घर पर भी उनसे मुलाकात कर सकते थे। हालांकि, उन्होंने करीब 40 मिनट कर नैन्सी पेलोसी से फोन पर बात कीं। वहीं, दक्षिण कोरिया की विदेश मंत्री पार्क जिन भी उनसे नहीं मिलीं, क्योंकि वह आसियान की यात्रा पर थीं। दक्षिण कोरियाई चीन के साथ सीमा साझा करते हैं और उसकी चिंताओं को समझते हैं।

पेलोसी ने चीन की 'लाल रेखा' क्यों पार किया?
सवाल ये हैं, कि नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा से क्या बदल गया है और क्यों बदल गया है? और उसका जवाब डिप्लोमेटिक डिटेल्स से समझा जा सकता है। चीन के साथ अमेरिका के राजनयिक संबंध 1972 के शंघाई कम्युनिक से शुरू हुआ था, जिसमें कहा गया है, कि ''चीनी पक्ष ने अपनी स्थिति की पुष्टि की थी, कि ताइवान का सवाल चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंधों के सामान्यीकरण में बाधा डालने वाला महत्वपूर्ण प्रश्न है। ताइवान चीन का एक प्रांत है और ताइवान की "मुक्ति'' चीन का आंतरिक मामला है, जिसमें किसी अन्य देश को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, और सभी अमेरिकी बलों और सैन्य प्रतिष्ठानों को ताइवान से वापस ले लिया जाना चाहिए''। वहीं, अमेरिकी पक्ष ने उस वक्त कहा था, कि ''संयुक्त राज्य अमेरिका स्वीकार करता है कि ताइवान जलडमरूमध्य के दोनों ओर के क्षेत्र चीनी हैं और एक चीन है और ताइवान चीन का एक हिस्सा है। संयुक्त राज्य सरकार उस स्थिति को चुनौती नहीं देती है''। यानि, अमेरिका की स्वीकारोक्ति, खुद चीनियों के ताइवान सवाल पर शांतिपूर्ण समाधान में अपनी रुचि की पुष्टि करता है।

तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने क्या कहा था?
एशिया टाइम्स के साथ एक ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा के दौरान, साल 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन प्रतिनिधिमंडल में शामिल एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी, जिन्होंने राष्ट्रपति के साथ चीन की यात्रा की थी, उन्होंने कहा कि,'नैन्सी पेलोसी यात्रा" शंघाई विज्ञप्ति की भावना का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करती है।" यह प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष की संवैधानिक स्थिति से उपजा है। उन्होंने कहा कि, मान लीजिए कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति को ताइवान का दौरा करना है, तो फिर यह, एक राष्ट्रपति की यात्रा, शंघाई कम्युनिक के उल्लंघन में एक संप्रभु ताइवान की वास्तविक मान्यता का गठन करेगी, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष उन देशों की यात्रा नहीं करते हैं, जिन्हें उन्होंने मान्यता नहीं दे रखी है और ताइवान को अभी तक अमेरिका ने मान्यता नहीं दी हुई है।

क्या होंगे चीन के अगले कदम?
तो फिर चीन की सरकार के ताइवान को लेकर अगले कदम क्या हो सकते हैं? एक्सपर्ट्स का कहना है कि, बीजिंग को अभी भी ताइवान के एकीकरण को लेकर जल्दी नहीं है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन के तहत एक रक्षा विभाग के एक अधिकारी एलब्रिज कोल्बी कहते हैं, कि ताइवान अब आक्रमण के काफी नजदीक है। उन्होंने 13 जुलाई को ट्वीट करते हुए कहा कि, बीजिंग "ताइवान के लोगों को 'राजनीतिक युद्ध' का ऑप्शन नहीं देने वाला है और ताइवान देख सकता है, कि हांगकांग का क्या हुआ। वहीं, ताइवान की युवा पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी की तुलना में और भी ज्यादा चीन विरोधी हो चुकी है और चीन इस बात को जानता है, कि ताइवान एकीकरण से दूर जा रहा है। इसलिए सैन्य बल बीजिंग के लिए सबसे अच्छा विकल्प होने की संभावना है। और, जैसा कि यूक्रेन दिखाता है, यदि आप सैन्य बल का उपयोग करने जा रहे हैं, तो इसे निर्णायक रूप से उपयोग करें।" हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है, कि यह पूरी तरह से गलत सोच है। एकीकरण को प्रभावित करने के लिए चीन को भौगोलिक, जनसांख्यिकी, सैन्य या आर्थिक रूप से अधिक विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। पूर्वी एशिया में ही (और विश्व स्तर पर) आर्थिक विकास का प्राकृतिक क्रम इसका सबसे शक्तिशाली हथियार है। समय चीन के पक्ष में है। सैन्य बल का इस्तेमाल आखिरी ऑप्शन है और बिना लड़े शत्रु को वश में करना ही चीन की सर्वोच्च रणनीति है।
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